शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2022

चंपारण से ही महात्मा गांधी का देश की राजनीति में हुआ था उदय....

 राजकुमार शुक्ल के प्रयासों का ही नतीजा था कि गांधीजी साल 1917 में चंपारण आए। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में आजमाए सत्याग्रह और अहिंसा के अपने अस्‍त्र का भारत में पहला प्रयोग चंपारण में ही किया। इस आंदोलन ने 135 सालों से शोषित चंपारण के किसानों को मुक्त किया। यह गांधी का देश की राजनीति में धमाकेदार उदय हुआ। 

गांधी के महात्‍मा तक के सफर का पहला स्‍टेशन था बिहार का चंपारण

 यह बात उस समय की है, जब मोहनदास करमचंद गांधी  दक्षिण अफ्रीका से भारत आए थे। दक्षिण अफ्रीका में किए गए उनके आंदाेलन की गूंज तो थी, लेकिन भारत में अभी वे महात्‍मा  या बापू नहीं थे। उनकी मोहनदास करमचंद गांधी से महात्‍मा गांधी व बापू तक का सफर अप्रैल 1917 में शुरू हुआ, जिसका पहला स्‍टेशन बिहार का चंपारण  था। इस यात्रा की शुरुआत चंपारण के एक किसान राजकुमार शुक्‍ल ने कराई, जिसका निमित्‍त नील किसानों पर अंग्रेजों के अत्‍याचार का तीनकठिया कानून बना। साल 1915 में गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे। पराधीन भारत में उनकी दिलचस्पी देख उनके राजनीतिक गुरु गोपालकृष्ण गोखले ने उन्हें भारत भ्रमण की सलाह दी। गोखले ने गांधी में भविष्‍य का बड़ा नेता देख लिया था। वे समझते थे कि भारत को लेकर गांधी के किताबी में जमीनी समझ भी जरूरी है।साल 1916 के गांधी कांग्रेस के अधिवेशन के लिए लखनऊ पहुंचे थे। वहां चंपारण के किसान राजकुमार शुक्ल भी पहुंचे थे। राजकुमार शुक्‍ल ने गांधी को चंपारण के किसानों के दुख-दर्द से अवगत कराते हुए वहां चलने का आग्रह किया। उन्‍होंने बताया कि चंपारण के किसानों पर तीनकठिया कानून के माध्‍यम से अंग्रेज किस तरह जुल्‍म कर रहे थे। अपनी आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ के 'नील के दाग' वाले अध्याय में गांधी लिखते हैं कि लखनऊ के कांग्रेस अधिवेशन के पहले तक वे चंपारण का नाम तक नहीं जानते थे। वहां नील की खेती और इस कारण वहां के हजारों किसानों के कष्ट की भी कोई जानकारी नहीं थी। गांधी लिखते हैं कि राजकुमार शुक्ल नाम के चंपारण के एक किसान ने वहां उनका पीछा पकड़ा और वकील बाबू (उस वक्‍त बिहार के नामी वकील और जयप्रकाश नारायण के ससुर ब्रजकिशोर प्रसाद) के बारे में कहते कि वे सब हाल बता देंगे। साथ हीं चंपारण आने का निमंत्रण देते।नेपाल सीमा से सटे बिहार के चंपारण में उस वक्‍त अंग्रेजों ने हर बीघे में तीन कट्ठे जमीन पर अंग्रेजों के लिए नील की अनिवार्य खेती का 'तिनकठिया कानून' लागू कर रखा था। बंगाल के अलावा यहीं नील की खेती होती थी। इसके बदले किसानों को कुछ नहीं मिलता था। इतना ही नहीं, किसानों पर कई दर्जन अलग-अलग कर भी लगाए गए थे। चंपारण के समृद्ध किसान राजकुमार शुक्ल इस शोषण के खिलाफ उठ खड़े हुए। इसके लिए अंग्रेजों ने उन्‍हें कई तरह से प्रताडि़त किया। वे चाहते थे कि गांधी जी यहां आकर अंग्रेजों के अत्‍याचार के खिलाफ ने लोगों को एकजुट करें।राजकुमार शुक्ल के प्रयासों का ही नतीजा था कि गांधीजी साल 1917 में चंपारण आए। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में आजमाए सत्याग्रह और अहिंसा के अपने अस्‍त्र का भारत में पहला प्रयोग चंपारण में ही किया। इस आंदोलन ने 135 सालों से शोषित चंपारण के किसानों को मुक्त किया। यह गांधी का देश की राजनीति में धमाकेदार उदय हुआ। इसके साथ देश को एक नया नेता मिला तो नई तरह की अहिंसक राजनीति भी मिली। जैसे गंगा का उद्गम गंगोत्री से हुआ है, ठीक वैसे हीं गांधी से बापू और महात्मा बनने के सफर का पहला स्टेशन ही चंपारण है। अब कुछ बात राजकुमार शुक्ल की भी। 23 अगस्त 1875 को बिहार के पश्चिमी चंपारण में जन्‍में राजकुमार शुक्‍ल चंपारण के एक बड़े किसान थे। अधिक पढ़े-लिखे नहीं होने तथा सामाजिक लोगों में भी बहुत उठ-बैठ नहीं रहने के बावजूद किसानों के शोषण के खिलाफ आवाज उठाई। गांधी को देश की राजनीति में स्‍थापित करने वाले चंपारण अत्‍याग्रह के आयोजन में उनका अहम योगदान रहा, लेकिन इतिहास ने उनके साथ न्‍याय नहीं किया। वे केवल आजादी के सिपाहियों की लिस्ट में एक नाम भर बनकर रह गए हैं। भारत की स्‍वतंत्रता के पहले हीं 20 मई 1929 को मोतिहारी में उनकी मृत्यु हो गई। बाद में भारत सरकार ने उनपर दो स्मारक डाक टिकट भी प्रकाशित किए।


मंगलवार, 18 अक्टूबर 2022

भारत में सबसे ज्यादा किले कौन से राज्य में है?

भारत के लगभग प्रत्येक राज्य में क़िले मौजूद हैं। इन किलों में कुछ बड़े ही भव्य है जो आज भी आकर्षण का केंद्र है और भारत में पर्यटन के मुख्य केंद्रों में गिना जाता है। आंकड़ो के अनुसार भारत के अधिकांश राज्यों में मौजूद सभी छोटे-बड़े किले को मिलाकर कुल 571 किले मौजूद हैं। राजस्थान और महाराष्ट्र दो ऐसे राज्य हैं, जहां सबसे अधिक किले हैं। आज हम ऐसे ही भारत के कुछ आलीशान और एतिहासिक किलों के बारे में बताने जा रहे हैं, जो देश की शान हैं। इसमें पहला है, राजस्थान के जोधपुर शहर में स्थित मेहरानगढ़ किला। यह 500 साल से भी ज्यादा पुराना और काफी बड़ा है।

शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2022

इस किले के लिए हुआ था भीषण युद्ध, बही थी खून की नदियां

 राजस्थान भौगोलिक कारणों से सदैव राजाओं के लिए केंद्र बिंदु रहा है। यहां की वादियों में आलौकिक शक्तियां तो हैं ही। मिट्टी में खजाने और कई रहस्य छुपे हुए हैं। यहां के किले और महल भी अपनी दास्तां बयां करने में पीछे नहीं है। हम बात कर रहे हैं चित्तौड़ किले की। इतिहासकारों के अनुसार सातवीं शताब्दी में मौर्य वंशीय राजा चित्रांगद ने अपने नाम पर चित्रकूट किला बनवाया था। प्राचीन सिक्कों पर एक तरफ चित्रकूट नाम अंकित मिलता है। इससे पता चलता है कि इस किले का नाम चित्रकूट था जो बाद में चित्तौड़ के नाम से जाना जाने लगा।

वास्तव में इस दुर्ग का निर्माण अभी भी विस्मय व रोमांच से भरा पड़ा है। इस किले के बारे में कई किवंदतियां हैं। कहा जाता है कि पांडवों के दूसरे भाई भीम ने इसे करीब 5000 वर्ष पूर्व बनवाया था। एक बार भीम जब संपति की खोज में निकला तो उसे रास्ते में एक योगी निर्भयनाथ व एक यति कुकड़ेश्वर से भेंट हुई। भीम ने योगी से पारस पत्थर मांगा, जिसे योगी इस शर्त पर देने को राजी हुआ कि वह इस पहाड़ी स्थान पर रातों-रात एक दुर्ग निर्माण करवा दें। अगर ऐसा होता है तो वह उसे पारस पत्थर दे देगा।

...आखिर क्यों इस गांव में मां के नाम से जाने जाते हैं बच्चे

हम जिस देश में रहते हैं वहां की संस्कृति और समाज सेक्स जैसे विषय पर खुलकर बात नहीं करती हैं। और जो इंसान इस पर खुलकर बोलता है उसे ही बेशर्म की संज्ञा दे दी जाती है। खासकर हमारे देश में माता-पिता भी इस बारे में बच्चों से कभी कोई बात करना पसंद नहीं करते हैं और न चाहते हैं कि इस तरह की बातें उनके बच्चे उनसे इस विषय पर कुछ पूछे। भारत ही नहीं विश्व के कई देश शादी से पहले शारीरिक संबंधों को सही नहीं मानते हैं। लेकिन आपको सुनकर हैरत होगी कि भारत में भी एक ऐसा राज्य है जहां के बच्चे मां के नाम से जाने जाते हैं। राजस्‍थान के जैसलमेर में "नगर वधुओं" एक ऐसा गांव है। यहां की युवतियां शादी से पहले ही कई लोगों से शारीरिक संबंध बनाती है। ऐसी सूरत में बच्चे को अपने पिता का नाम पता नहीं होता है। सुनने में भले ही ये अजीब लग रहा है, लेकिन यहां की ये परंपरा है। यहां शादियों का चलन नहीं है। वहीं विश्व में एक ऐसा भी देश है जहां पर लड़की का पिता ही उससे कहता है कि वो जाकर लड़कों से मिले और अच्छा लगे तो उसके साथ रिलेशन बना लें। यह प्रथा कंबोडिया के आदिवासी समुदाय का है।

 एक ऐसा गांव जहां पिता बनाता है बेटी से संबंध

पिता ही तैयार करता है बेटी के लिए झोपड़ी: शादी से पहले युवतियां पिता के कहने पर शारीरिक संबंध बनाती है। कंबोडिया के आदिवासी समुदाय में यह एक प्रथा है। प्रथा के मुताबिक जैसे ही किसी युवती को मासिक धर्म आना शुरू हो जाता है तो उसे जवान मान लिया जाता है। इसके बाद पिता अपनी बेटी के लिए एक झोपड़ी तैयार करता है। इसे लव हट कहा जाता है। जिसमें लड़की आदिवासी समुदाय के लड़कों से मिलती है और अच्छा लगने पर संबंध बना लेती है। इसके बाद भी लड़की को लड़का सही नहीं लगता है तो वह उससे शादी नहीं करती है। लड़की फिर से झोपड़ी में दूसरे लड़के को बुलाती है। यह सिलसिला तब तक चलता है जब तक कि लड़की को सही लड़का न मिल जाए। इसके बाद ही उसकी शादी उस लड़के से कर दी जाती है। इस तरह से एक बाप अपनी ही बेटी को कहता है कि वो एक से ज्यादा लड़कों के साथ रिलेशन बनाए। 


गर्भधारण होने पर भी लड़कियां नहीं करती है शादी:

लड़कियां रिलेशन बनाने से पहले किसी तरह का गर्भनिरोधक वस्तु का इस्तेमाल नहीं करती है। ऐसे में अगर कोई लड़की गर्भवती हो जाती है और उसे वह पंसद नहीं करती है तो वह उससे शादी नहीं करती है। गर्भधारण के बावजूद लड़की जिसे पसंद करती है उससे शादी करके बच्चे को पिता के नाम से जोड़ देती है। इस गांव सिर्फ महिलाएं और बच्चे हैं:नगर बंधुओं का एक ऐसा गांवजहां बसती हैं सिर्फ महिलाएं और उनके मासूम बच्चे। ऐसे बच्चे जो अपने बाप के नाम से नहीं बल्कि अपनी मां के नाम से जाने जाते हैं, स्कूल में भी इनके नाम के आगे मां का नाम ही लिखा हुआ है। यह गांव है राजस्थान के बाड़मेर जिले का सांवरड़ा गांव। इस गांव में साटिया जाति के करीब 70 परिवार निवास करते हैं। गांव में 132 नगर बधुएं और लगभग 45 बच्चे हैं जो गांव के प्राथमिक स्कूल में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। गांव की महिलाएं अपना और अपने बच्चों का पेट पालने के लिए शारीरिक संबंध बनाती है

 इस गांव में सदियों से शादी का चलन नहीं है: 

इस गांव में शादी की कोई खास परंपरा नहीं है। यहां बिना शादी के ही युवतियां शारीरिक संबंध बनती हैं। यही कारण है कि गांव के बच्चे अपनी मां के नाम से जाने जाते हैं। एक एनजीओ की मदद से चार साल पहले गांव में पहली बारात आई थी तब यह निर्णय लिया गया कि बहुओं को दूसरे से शारीरिक संबंध नहीं बनाने दिया जाएगा। यह संबंध पहले समाज में थी भी जायज:युवतियों का शादी नहीं करना और एक से अधिक कई से शारीरिक संबंध बनाना समाज में जायज था। लेकिन बदलते दौर ने इस परंपरा को वेश्यावृत्ति में बदल दिया। इस वजह से यहां की युवतियों को घृणा की दृष्टि से देखा जाता है। इतना ही नहीं युवतियों को अपने इस धंधे की कमाई का कुछ भाग टैक्स के रूप में भी अदा करना पड़ता था। 

कैसे शुरू हुई ये परंपरा: 

यह परंपरा 2500 साल पहले की है। जब भारत पर मौर्य वंश का राज था। तब युवतियां शादी से पूर्व ही शारीरिक संबंध बनाती थी। वे एक से अधिक लड़कों से इस तरह के संबंध रखती थी। ऐसा करना उनकी परंपरा में था। पुरुष इसके एवज में खूब धन-दौलत देते थे। ऐसा कहा जा सकता है कि युवतियों से देहव्यापार कराया जाता था। नगर के लोगों के द्वारा प्राप्त धन से इन युवतियों का कोषालय हमेशा भरा रहता था। इनकी इस कमाई का कुछ भाग राजकोष में कर के रूप में जमा कराया जाता था जिसका उपयोग राजा द्वारा अपने राज्य की भलाई में किया जाता था।

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भानगढ़ का खंडहर बताते हैं गुलजार था कभी यहां...


भानगढ़ नगर में प्रवेश करते ही सबसे पहले बाजार पड़ता है। वह बाजार जो उस जमाने में गुलजार रहा करता होगा। आज वीरान और खंडहर में तब्दील है। बाजार में बनी दुकानों की दीवारों से छत कुछ इस तरह गिरी कि लगता ही नहीं इनके ऊपर कभी कुछ था भी। देखकर अहसास होता है मानों किसी ने तलवार से इन्हें इकसार काट दिया है या इन्हें बनाया ही इस तरह गया है। कहते हैं नगर में बने नर्तकी महल से रात को घुंघुरुओं की आवाजें आती हैं। वैसे आपको बता दें कि जाने-माने वास्तुविद् ने जब यहां का परीक्षण किया तो बताया कि इस जगह बड़ी मात्रा में चमगादर और कक्रोच हैं जिसकी वजह से रात में ऐसी ध्वनि सुनाई देती हैं जैसे घुंघुरु बज रहे हों यानी उन्होंने रूहानी ताकतों की बजाय वास्तु और इन नकारात्मकता बढ़ाने वाली चीजों को यहां डर की वजह बताया।यह तो हुआ भानगढ़ का उपलब्ध इतिहास। अब बात करते हैं कि क्या वाकई यहां पर भूत हैं? क्या सचमुच यहां आत्माएं भटकती हैं? इन सवालों के साथ सुपरनैचरल पावर्स पर काम करने वाले और पैरानॉर्मल इंवेस्टिगेटर इस जगह जा चुके हैं। इनमें से कई लोगों ने यहां पर नेगेटिव एनर्जी की प्रेजेंस को स्वीकारा है। कई इंवेस्टिगेटर्स के कैमरे में कुछ अजीब तस्वीरें कैद भी हुई हैं, लेकिन किसी ने यह नहीं कहा कि ये कोई भूत है। उनका कहना है कि जब तक रिसर्च पूरी नहीं हो जाती वह ऐसा कुछ नहीं कह सकते।अगर भूत नहीं है तो फिर यह नेगेटिव एनर्जी क्या हो सकती है? इस पर कुछ पैरानॉर्मल इंवेस्टिगेटर्स का जवाब होता है कि ऐसी एनर्जी जो लंबे समय से एक ही जगह पर अटकी हुई हो, जिसका किसी कारण फ्लो नहीं हो पा रहा हो, नेगेटिव एनर्जी कहलाती है। साइंस कभी यह नहीं कहती कि भूत हैं, लेकिन वह भूतों के अस्तित्व को नकारती भी नहीं है। पैरानॉर्मल ऐक्टिविस्ट का कहना है कि साइंस के इस रवैये के पीछे कारण यह है कि साइंस के पास भूतों के न होने के सबूत भूतों के होने के सबूत से ज्यादा हैं। ऐसे में खास बात यह है कि साइंस के पास भी इस बात के सबूत हैं कि भूत होते हैं। भले ही ये अभी कम हैं। इस स्टोरी में हम किसी भी तरह के अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं दे रहे हैं, बस उपलब्ध तथ्यों के आधार पर बात कर रहे हैं।

बुधवार, 13 मई 2020

कहते हैं रात के समय इस महल में नाचती हैं नर्तकी की रूह

राजस्थान के अलवर जिले में स्थित भानगढ़ का किला एशिया की सबसे डरावनी जगहों में से एक माना गया है। सरकारी आदेश है कि यहां शाम 6 बजे के बाद किसी को भी रुकने न दिया जाए। इसलिए यहां सैलानियों को 5:30 होते ही किले से बाहर निकालना शुरू कर दिया जाता है। ताकि भूल से भी कोई इसके अंदर न रह जाए...

तांत्रिक की बुरी नियत से बर्बाद हो गया समृद्ध नगर

भानगढ़ एक प्राचीन नगर है। मान्यता है कि एक तांत्रिक की बुरी नियत इस नगर के विनाश का कारण बनी। इतिहास के अनुसार, भानगढ़ का निर्माण आमेर के राजा भगवंत दास ने 1573 ई. में अपने छोटे बेटे माधो सिंह के लिए कराया। बाद में इनकी 3 पीढ़ियों ने इस नगर पर राज किया।

अभिमंत्रित तेल ने बिगाड़ दिया सब खेल

कहा जाता है कि भानगढ़ की राजकुमारी रत्नावती अत्यंत सुंदर थी। इस राज्य में एक सिंघिया नाम का तांत्रिक राजकुमारी पर मोहित हो गया। वह रत्नावती से विवाह करना चाहता था लेकिन यह संभव नहीं था। ऐसे में उसने नगर के हाट से राजकुमारी के लिए तेल खरीदने आई दासी को अभिमंत्रित किया हुआ तेल दे दिया। ताकि तेल के प्रभाव से राजकुमारी सम्मोहन में उसकी तरफ खिंची चली आए। लेकिन जाते वक्त दासी के हाथ से वह शीशी छूटकर एक शिला पर गिर गई। तेल गिरने से वह शिला चटककर तांत्रिक की तरफ खींचने लगी और शिला के नीचे दबकर उस तांत्रिक की मौत हो गई।

भटकती हैं नगरवासियों की आत्मा

लेकिन मौत से पहले ही उस तांत्रिक ने अपनी तंत्रविद्या के प्रभाव से नगर को ध्वस्त करने की जमीन तैयार कर दी। उसने नगर को विनाश का शाप दे दिया। कहा जाता है कि तांत्रिक की मौत के बाद राजकुमारी सहित भानगढ़ के किसी निवासी ने अगला सूरज नहीं देखा। पूरा नगर एक रात में ही विरान हो गया। यह सब कैसे हुआ इस बारे में कई तरह की बातें लोग बताते हैं। माना जाता है कि इस तरह अकाल मृत्यु के कारण आज भी वहां के निवासियों की आत्माएं यहां भटकती हैं।



शुक्रवार, 28 जून 2019

श्री ओम बन्ना मंदिर में भगवान की नहीं बल्कि बुलेट की होती है पूजा

जयपुर। यहां चमत्कारों पर विश्वास किया जाता रहा है, उन्हें पूजा जाता है। इतिहास में कई ऐसी कहानियां दर्ज हैं जो इस वैज्ञानिक युग में भी चमत्कारों पर विश्वास दिला जाती हैं। ऐसी ही एक कहानी है बुलेट मंदिर की।
अपनी मन्नतें लेकर भक्तों को मंदिरों में भगवान के दर्शन के लिए जाते को सभी ने देखा है लेकिन क्या कभी किसी ऐसे मंदिर के बारे में सुना है जहां भगवान नहीं बुलेट की पूजा होती हो। पाली-जोधपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित है ये दुनिया का सबसे अनोखा और एक मात्र बुलेट मंदिर। मान्यता है कि यहां मनोकामना मांगने से पूरी होती है। जी हां, एक ऐसी जगह है। राजस्थान के पाली जिले में. जहां के श्री ओम बन्ना मंदिर में भगवान की किसी मूर्ति नहीं बल्कि एक बुलेट मोटर साइकिल की पूजा होती है। ठाकुर ओम सिंह राठौड़ का जन्म पाली के चोटिला गांव में 5 मार्च 1965 में ठाकुर जोग सिंह राठौड़ के घर पर हुआ था। राजस्थान में राजपूतों को बन्ना सा बोलने का रिवाज है, इसलिए ओम सिंह राठौड़ को भी ओम बन्ना कहा जाता था।  जितना दिलचस्प इस मंदिर का नाम है, उतनी ही दिलचस्प इसके पीछे की कहानी भी है। ओम बन्ना अपने पिता की इकलौती संतान थे और पूरे परिवार के लाडले थे। बचपन से ही उन्हें बड़े प्यार से पाला गया। जो भी उनकी इच्छा होती उन्हें वह चीज दिला दी जाती। उन्हें बाइक चलाने का बड़ा शौक था इसलिए जैसे ही ओम बन्ना थोड़े बड़े हुए उन्होंने रॉयल एनफील्ड मोटरसाइकिल खरीद ली।कहा जाता है कि हमेशा की तरह ओम बन्ना अपनी बाइक पर सवार हो कर अपनी पत्नी के गांव गए थे। उनकी पत्नी गर्भवती थी इसलिए वह अपने घर आई हुई थीं। ओम बन्ना पत्नी से मिलने के बाद घर वापस लौट रहे थे। ओम बन्ना अपनी तेज रफ़्तार बाइक का मजा ले ही रहे थे कि तभी सामने एक मोड़ आ गया। उन्होंने कोशिश की अपनी बाइक संभालने की मगर वह कुछ न कर सके। अगले ही पल उनकी बाइक ज़मीन पर पड़ी थी और ओम बन्ना उससे थोड़ी दूरी पर गिरे हुए थे। ओम बन्ना की उस समय ही मौत हो गई थी।
अगली सुबह पुलिस घटनास्थल पहुंची. सीधा-सीधा समझ आ रहा था कि यह एक्सीडेंट का केस है। उन्होंने ओम बन्ना की लाश उनके घर पहुंचाई और बाइक को अपने साथ पुलिस स्टेशन ले गए। सब को लगा कि यह ओपन एंड शट केस है इसलिए किसी ने भी इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया और ओम बन्ना की बाइक पुलिस स्टेशन के बाहर रख दी गई। अगले दिन जैसे ही पुलिस वाले स्टेशन में वापस आए उन्होंने देखा कि ओम बन्ना की बाइक वहां पर है ही नहीं। कुछ देर बाद ही पुलिस को सूचना मिली कि एक 'RNJ 7773' नंबर की बाइक चोटिला गांव के पास जोधपुर पाली हाईवे पर लावारिस हालत में खड़ी हुई है।
उस रात बाइक पुलिस स्टेशन में ही रही मगर अगले दिन फिर पिछली वाली घटना घटी। अगले जैसे ही पुलिस वाले स्टेशन में आए उन्होंने देखा कि ओम बन्ना की बाइक फिर से गायब है। फिर थोड़ी देर बाद उन्हें खबर मिली कि ओम बन्ना की बाइक उनके दुर्घटनास्थल पर फिर से देखी गई है। उन्हें लगा कि शायद कोई उनके साथ मजाक कर रहा है। इस बार पुलिस वालों ने सोच लिया कि चोर को कोई मौका नहीं देना है बाइक चुराने का। इसलिए उन्होंने बाइक का सारा पेट्रोल निकाल दिया। इतना ही नहीं उन्होंने बाइक को चेन से भी बांध दिया ताकि कोई उसे लेकर न जा सके। पुलिस की कोशिशों के बाद भी अगले दिन जैसे ही वह पहुंचे उन्होंने देखा कि फिर से बाइक गायब है। इसके बाद कई बार उन्होंने बाइक को जब्त किया और हर बार वह फिर से दुर्घटनास्थल पर ही वापस मिलती थी। इस बात की खबर जैसे ही आस पास के गांव के लोगों को लगी उन्होंने इसे चमत्कार का नाम दे दिया। उनक मानना था कि इसमें ओम बन्ना की आत्मा बसती है। जब इस बात की खबर ओम बन्ना के पिता और उनके गांव वालों को लगी तो उन्होंने कहा कि इस सिलसिले को ख़त्म करने के लिए उन्हें दुर्घटनास्थल पर ओम बन्ना का एक स्मारक बनाना पड़ेगा। इसके बाद गांव वालों ने उस दुर्घटनास्थल के पास ओम बन्ना के नाम से एक स्मारक बना दिया और उनकी बाइक को वहां पर रख दिया।उस दिन के बाद से वह बाइक वहां से कहीं नहीं गई। लोगों ने इसे चमत्कार मान लिया। तब से वह एक स्मारक नहीं बल्कि एक मंदिर बन गया। इस मंदिर की खासियत यह है कि यहां पर किसी भगवान् की मूर्ती नहीं बल्कि ओम बन्ना के बाइक की पूजा होती है। उस दिन के बाद से आज तक यह मंदिर वैसे का वैसा ही है। आज भी लोग इसकी पूजा करने आते हैं। ओम बन्ना के इस मंदिर में उनकी रॉयल एनफील्ड बाइक रखी हुई है और पास में उनका एक चबूतरा बना हुआ है। इस मंदिर पर शराब की बोतलें प्रसाद के रूप में चढ़ाई जाती हैं। ऐसा कहा जाता है कि यहां पर निकलने वाले हर व्यक्ति को यहां पर शराब रखकर शीश झुकाना जरूरी होता है। कहते हैं कि अगर ऐसा किसी ने नहीं किया तो उसके साथ दुर्घटना होने की गुंजाइश होती है। हालांकि इन बातों को कोई पक्का सबूत तो नहीं है कि यह सच है भी कि नहीं। फिर भी कई लोगों का मानना है कि यह सच है, तो कई इसे अन्धविश्वास की संज्ञा भी देते हैं। ओम बन्ना और उनके मंदिर की यह कहानी वाकई में बहुत दिलचस्प है। जो भी इसके बारे में सुनता है वह आश्चर्यचकित हो जाता है।