बुधवार, 26 अप्रैल 2017

क्या आप जानते हैं कि एक लाख वर्ष पुरानी है राजस्थान की सभ्यता

पुरातत्वों और इतिहासकारों के अनुसार राजस्थान का इतिहास पूर्व पाषणकाल में ही शुरू हुआ, बनास नदी के किनारे और अरावली पहाड़ के गर्भ में बसा था यह क्षेत्र

जयपुर। राजस्थान। यहां की सभ्यता और संस्कृति काफी पुरानी ही नहीं बल्कि एक लाख वर्ष पहले इसका आगाज भी हो गया था। पुरातत्ववेताओं के अनुसार राजस्थान सभ्यता की शुरुआत पूर्व पाषणकाल में ही हो गई थी। आज से करीब एक लाख पहले मानव नदी किनारे या फिर पहाड़ की कदराहों में निवास करता था। इतिहासकारों के अनुसार ये मुख्य तय बनास नदी के किनारे या फिर अरावली के उस पार की नदियों के किनारे निवास करते थे। हालांकि भोजन उनके लिए बड़ी समस्या थी। ऐसे में वे एक जगह स्थिर नहीं रह पाते थे। वे पत्थर के औजारों की मदद से शिकार करते थे। इसका प्रमाण इन औजारों के कुछ नमूने बैराठ, रैध और भानगढ़ के आसपास पाए गए हैं।

क्या आदिकाल से ऐसा ही था राजस्थान: राजस्थान का इतिहास किसी रहस्य से कम नहीं है। पुरातत्ववेताओं और इतिहासकारों के अनुसार राजस्थान का उत्तर-पश्चिमी में मरुस्थल नहीं था जैसा आज है। इनका मनना है कि यहां अतिप्राचीनकाल में सरस्वती और दृशद्वती जैसी विशाल नदियां बहा करती थीं। ऐसे भी साक्ष्य मिले है। जो इतिहास के पन्नों पर एक पहचान रखती है। या फिर जिसकी सभ्यता आज भी किसी विकसित शहर से तुल्ला की जाती है। हड़प्पा और रंगमहल जैसी संस्कृतियां इन नदी घाटियों में फली-फूलीं हैं। यहां की गई खुदाइयों से खासकर कालीबंग के पास, पांच हजार साल पुरानी एक विकसित नगर सभ्यता का पता चला है। हड़प्पा और रंगमहल संस्कृतियां सैकडों किलोमीटर दक्षिण तक राजस्थान के एक बहुत बड़े इलाके में फैली हुई थीं।

गणराज्यों में बंटा हुआ था ईसा पूर्व चौथी सदी में: इस बात के प्रमाण मौजूद हैं कि ईसा पूर्व चौथी सदी और उसके पहले यह क्षेत्र कई छोटे-छोटे गणराज्यों में बंटा हुआ था। इनमें से दो गणराज्य मालवा और सिवि इतने शक्तिशाली थे कि उन्होंने सिकंदर जैसे महान शासक को पंजाब से सिंध की ओर लौटने के लिए बाध्य कर दिया था। उस समय उतरी बीकानेर पर एक गणराज्यीय योद्धा कबीले यौधेयत का अधिकार था। यह वही ब्रह्मावर्त है जिसकी महती चर्चा मनु ने की है। इसका उल्लेख महाभारत में भी मिलता है। महाभारत में उल्लेखित है मत्स्य पूर्वी राजस्थान और जयपुर के एक बड़े हिस्से पर शासन करते थे। जयपुर से 80 किमी उत्तर में बैराठ, जो तब विराटनगर कहलाता था, उनकी राजधानी थी। इस क्षेत्र की प्राचीनता का पता अशोक के दो शिलालेखों और चौथी पांचवी सदी के बौद्ध मठ के भनावशेषों से भी चलता है।

काफी समृद्ध इलका था राजस्थान
: भरतपुर, धौलपुर और करौली उस समय सूरसेन जनपद के अंश थे जिसकी राजधानी मथुरा थी। भरतपुर के नोह नामक स्थान में अनेक उतर-मौर्यकालीन मूर्तियां और बर्तन खुदाई में मिले हैं। शिलालेखों से ज्ञात होता है कि कुषाणकाल तथा कुषाणोतर तृतीय सदी में उतरी एवं मध्यवर्ती राजस्थान काफी समृद्ध इलाका था। राजस्थान के प्राचीन गणराज्यों ने अपने को पुनस्र्थापित किया और वे मालवा गणराज्य के हिस्से बन गए। मालवा गणराज्य हूणों के आक्रमण के पहले काफी स्वायत् और समृद्ध था। अंततघ् छठी सदी में तोरामण के नेतृतव में हूणों ने इस क्षेत्र में काफी लूट-पाट मचाई और मालवा पर अधिकार जमा लिया। लेकिन फिर यशोधर्मन ने हूणों को परास्त कर दिया और दक्षिण पूर्वी राजस्थान में गुप्तवंश का प्रभाव फिर कायम हो गया। सातवीं सदी में पुराने गणराज्य धीरे-धीरे अपने को स्वतंत्र राज्यों के रूप में स्थापित करने लगे। इनमें से मौर्यों के समय में चितौड़ गुबिलाओं के द्वारा मेवाड़ और गुर्जरों के अधीन पश्चिमी राजस्थान का गुर्जरात्र प्रमुख राज्य थे।

शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016

गोवर्धन पर्वत है शापित, दिनोंदिन घट रही ऊंचाई

जयपुर। कहते हैं जहां सत्य है वहीं ईश्वर है। ऐसा नहीं है कि ईश्वर से गलती नहीं होती है। वे भी कभी आवेश में आकर ऐसे कार्य करते हैं जिससे मानव जिंदगी एक अधर में लटक जाती है। आखिरकार आस्था से भरे मानव को ईश्वर के शरण में एक बार फिर जाना पड़ता है। गलती को सुधराने के लिए ईश्वर एक अनोखा ही रास्ता निकालते हैं। ऐसा ही कुछ रहस्यमय है गोवर्धन पर्वत की कहानी। कई पौराणिक मिथक है। कहा जाता है गोवर्धन पर्वत शापित है। यह पर्वत कभी विशाल हुआ करता था लेकिन पुलस्त्य ऋषि के शाप के कारण यह पर्वत अपनी विशलता खो चुका था।  नंद यानी भगवान कृष्ण ने भारी बारिश से लोगों को बचाने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपने कनिष्ठ अंगुली पर उठा लिया था।

गोवर्धन पर्वत को गिरिराज पर्वत भी कहा जाता है। पांच हजार साल पहले यह गोवर्धन पर्वत 30 हजार मीटर ऊंचा हुआ करता था। अब शायद 30 मीटर ही रह गया है। पुलस्त्य ऋषि के शाप के कारण यह पर्वत एक मुट्ठी प्रतिदिन कम होता जा रहा है। इसी पर्वत को भगवान कृष्ण ने अपनी बाये हाथ के कनिष्ठ अंगुली पर उठा लिया था। श्रीगोवर्धन पर्वत मथुरा से 22 किमी की दूरी पर स्थित है।

पौराणिक मान्यता अनुसार श्रीगिरिराजजी को पुलस्त्य ऋषि द्रौणाचल पर्वत से ब्रज में लाए थे। दूसरी मान्यता यह भी है कि जब रामसेतुबंध का कार्य चल रहा था तो हनुमानजी इस पर्वत को उतराखंड से ला रहे थे, लेकिन तभी देववाणी हुई की सेतुबंध का कार्य पूर्ण हो गया है, तो यह सुनकर हनुमानजी इस पर्वत को ब्रज में स्थापित कर दक्षिण की ओर पुन: लौट गए।

क्यों उठाया गोवर्धन पर्वत : इस पर्वत को भगवान कृष्ण ने अपनी चींटी अंगुली से उठा लिया था। कारण यह था कि मथुरा, गोकुल, वृंदावन आदि के लोगों को वह अति जलवृष्टि से बचाना चाहते थे। नगरवासियों ने इस पर्वत के नीचे इकठ्ठा होकर अपनी जान बचाई। अति जलवृष्टि इंद्र ने कराई थी। लोग इंद्र से डरते थे और डर के मारे सभी इंद्र की पूजा करते थे, तो कृष्ण ने कहा था कि आप डरना छोड़ दे...मैं हूं ना।

परिक्रमा का महत्व: सभी हिंदूजनों के लिए इस पर्वत की परिक्रमा का महत्व है। वल्लभ सम्प्रदाय के वैष्णवमार्गी लोग तो इसकी परिक्रमा अवश्य ही करते हैं क्योंकि वल्लभ संप्रदाय में भगवान कृष्ण के उस स्वरूप की आराधना की जाती है जिसमें उन्होंने बाएं हाथ से गोवर्धन पर्वत उठा रखा है और उनका दायां हाथ कमर पर है। इस पर्वत की परिक्रमा के लिए समूचे विश्व से कृष्णभक्त, वैष्णवजन और वल्लभ संप्रदाय के लोग आते हैं। यह पूरी परिक्रमा 7 कोस अर्थात लगभग 21 किलोमीटर है।

परिक्रमा मार्ग में पडऩे वाले प्रमुख स्थल आन्यौर, जातिपुरा, मुखार्विद मंदिर, राधाकुंड, कुसुम सरोवर, मानसी गंगा, गोविन्द कुंड, पूंछरी का लौठा, दानघाटी इत्यादि हैं। गोवर्धन में सुरभि गाय, ऐरावत हाथी तथा एक शिला पर भगवान कृष्ण के चरण चिह्न हैं।

परिक्रमा की शुरुआत वैष्णवजन जातिपुरा से और सामान्यजन मानसी गंगा से करते हैं और पुन: वहीं पहुंच जाते हैं। पूंछरी का लौठा में दर्शन करना आवश्यक माना गया है, क्योंकि यहां आने से इस बात की पुष्टि मानी जाती है कि आप यहां परिक्रमा करने आए हैं। यह अर्जी लगाने जैसा है। पूंछरी का लौठा क्षेत्र राजस्थान में आता है।

वैष्णवजन मानते हैं कि गिरिराज पर्वत के ऊपर गोविंदजी का मंदिर है। कहते हैं कि भगवान कृष्ण यहां शयन करते हैं। उक्त मंदिर में उनका शयनकक्ष है। यहीं मंदिर में स्थित गुफा है जिसके बारे में कहा जाता है कि यह राजस्थान स्थित श्रीनाथद्वारा तक जाती है।

गोवर्धन की परिक्रमा का पौराणिक महत्व है। प्रत्येक माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी से पूर्णिमा तक लाखों भक्त यहां की सप्तकोसी परिक्रमा करते हैं। प्रतिवर्ष गुरु पूर्णिमा पर यहां की परिक्रमा लगाने का विशेष महत्व है। श्रीगिरिराज पर्वत की तलहटी समस्त गौड़ीय सम्प्रदाय, अष्टछाप कवि एवं अनेक वैष्णव रसिक संतों की साधाना स्थली रही है।

अब बात करते हैं पर्वत की स्थिति की। क्या सचमुच ही पिछले पांच हजार वर्ष से यह स्वत: ही रोज एक मुठ्ठी खत्म हो रहा है या कि शहरीकरण और मौसम की मार ने इसे लगभग खत्म कर दिया। आज यह कछुए की पीठ जैसा भर रह गया है।

हालांकि स्थानीय सरकार ने इसके चारों और तारबंदी कर रखी है फिर भी 21 किलोमीटर के अंडाकार इस पर्वत को देखने पर ऐसा लगता है कि मानो बड़े-बड़े पत्‍थरों के बीच भूरी मिट्टी और कुछ घास जबरन भर दी गई हो। छोटी-मोटी झाडिय़ां भी दिखाई देती है।

पर्वत को चारों तरफ से गोवर्धन शहर और कुछ गांवों ने घेर रखा है। गौर से देखने पर पता चलता है कि पूरा शहर ही पर्वत पर बसा है, जिसमें दो हिस्से छूट गए है उसे ही गिर्राज (गिरिराज) पर्वत कहा जाता है। इसके पहले हिस्से में जातिपुरा, मुखार्विद मंदिर, पूंछरी का लौठा प्रमुख स्थान है तो दूसरे हिस्से में राधाकुंड, गोविंद कुंड और मानसी गंगा प्रमुख स्थान है।

बीच में शहर की मुख्य सड़क है उस सड़क पर एक भव्य मंदिर हैं, उस मंदिर में पर्वत की सिल्ला के दर्शन करने के बाद मंदिर के सामने के रास्ते से यात्रा प्रारंभ होती है और पुन: उसी मंदिर के पास आकर उसके पास पीछे के रास्ते से जाकर मानसी गंगा पर यात्रा समाप्त होती है।

मानसी गंगा के थोड़ा आगे चलो तो फिर से शहर की वही मुख्य सड़क दिखाई देती है। कुछ समझ में नहीं आता कि गोवर्धन के दोनों और सड़क है या कि सड़क के दोनों और गोवर्धन? ऐसा लगता है कि सड़क, आबादी और शासन की लापरवाही ने खत्म कर दिया है गोवर्धन पर्वत को।

गुरुवार, 29 दिसंबर 2016

इस पहाड़ी के गर्भ में छुपे हैं आयुर्वेद के कई रहस्य


जयपुर। संसार में ऐसी बहुत सी जगहें हैं जो अद्‌भूत हैं। और कुछ ऐसी भी जगह हैं जो कई हजारों साल रहस्यपूर्ण बनी हुई हैं। हम अक्सर रहस्यपूर्ण जगह के बारे में बातें करते ही रोमांचित हो जाते हैं। हमारे दिलो-दिमाग में एक नहीं कई तरह के प्रश्न पैदा होने लगते हैं। आज एक खूबसूरत पहाड़ी के बारे में बताने जा रहा है। प्रकृति की गोद में फैला यह पर्वत कोई और नहीं अरवली है। इतिहासकारों की मानें तो अरावली पर्वत शृंखला के पास एक ज्वालामुखी है। लेकिन इस ज्वालामुखी में हजारों साल से कोई विस्फोट नहीं हुआ है। इस ज्वालामुखी को धोसी पहाड़ी के नाम से भी जाना जाता है। कहा जाता है कि इस धोसी पहाड़ी से कई आयुर्वेद के रहस्य जुड़े हुए हैं। आयुर्वेद की सबसे महान खोज च्यवनप्राश को माना जाता है पर शायद ही कोई यह जानता होगा कि च्यवनप्राश जैसी आयुर्वेदिक दवा धोसी पहाड़ी की देन है।
धोसी पहाड़ी एक चमत्कारी पहाड़ी है, आखिर क्यूं कहा जाता इसे चमत्कारी
पहाड़ी में कई आयुर्वेद तत्व: धोसी पहाड़ी जो कहने को तो ज्वालामुखी है पर वास्तविक रुप में अपने भीतर कई आयुर्वेदिक गुणों को समेटे हुए है, जैसे उनमें से एक है च्यवनप्राश. आयुर्वेद की सबसे महान खोज च्यवनप्राश को माना जाता है पर शायद ही कोई यह जानता होगा कि च्यवनप्राश जैसी आयुर्वेदिक दवा धोसी पहाड़ी की देन है. धोसी पहाड़ी हरियाणा और राजस्थान की सीमा पर स्थित है. धोसी पहाड़ी के बारे में वहां के लोगों का कहना है कि धोसी पहाड़ी एक चमत्कारी पहाड़ी है और साथ ही वहां के लोगों का यह भी कहना है कि धोसी पहाड़ी के रहस्य को ना कोई जान पाया है ना जान पाएगा. विशेषज्ञ भी अगर धोसी पहाड़ी का रहस्य और धोसी पहाड़ी के आयुर्वेदिक गुणों के बारे में पता लगाने की कोशिश करें तो सिर्फ उनके हाथ असफलता ही लगेगी.
यह एक रहस्यपूर्ण पहाडी है: धोसी पहाड़ी रहस्यपूर्ण तो है ही पर साथ में धोसी पहाड़ी की बातें अजीबो-गरीब हैं. धोसी पहाड़ी के नीचे एक गांव पड़ता है जिस गांव का नाम धुंसरा गांव है. धुंसरा गांव के लोगों का कहना है कि धोसी पहाड़ी के उपर कई ऋषियों ने तपस्या की है जिस कारण धोसी पहाड़ी में आयुर्वेद के महान तत्व स्थापित हो चुके हैं. लगभग 5100 वर्ष पूर्व पांडव भी अपने अज्ञातवास के दौरान यहां आए थे. आज भी पहाड़ी के एक तरफ ठोस लावा देखा जा सकता है, जो कि लाखों वर्ष पुराना है.
ब्रह्राव्रत रिसर्च फाउंडेशन, जो वैदिक काल के लिखे वेदों की रिसर्च करता है, की रिसर्च यह कहती है कि धोसी पहाड़ी पर बैठकर ही महान वेदों की रचना की गई है. धोसी पहाड़ी ऐसी चमत्कारी पहाड़ी है कि जो भी महान व्यक्ति इस पहाड़ी पर बैठकर जो भी वेद लिखता है यह धोसी पहाड़ी व्यक्ति और वेद के महान तत्व अपने अंदर स्थापित कर लेती है. 46 दुर्लभ जड़ी-बूटियों को मिलाकर पहली बार यहीं च्यवनप्राश का फार्मूला तैयार किया गया था. 'कायाकल्प' के निर्माण के प्रमाण भी यहीं मिलते हैं.
'कायाकल्प' एक ऐसी औषधि थी, जिसे अच्छी त्वचा और स्वास्थ्य के लिए तैयार किया गया था और इस कायाकल्प का निर्माण भी धोसी पहाड़ी पर ही किया गया था. हैरानी वाली बात यह है कि हेमचंद्र विक्रमादित्य राजा को भी धोसी पहाड़ी की महानता का अहसास हो गया था जिस कारण धोसी पहाड़ी के आयुर्वेद तत्वों को सुरक्षित रखने के लिए धोसी पहाड़ी के ऊपर एक किले का निर्माण किया गया. धोसी पहाड़ी का रहस्य आज भी कायम है कि आखिरकार इसमें ऐसा क्या है जो महान वेदों, महान व्यक्तियों, ऋषियों के महान गुण अपने अंदर स्थापित कर लेती है और साथ में यह भी कि जब यह पहाड़ी ज्वालामुखी है तो कभी भी इसमें कोई विस्फोट क्यों नहीं हुआ है.

शनिवार, 24 दिसंबर 2016

बादशाह अकबर भी नतमस्तक हो गए थे आराध्य गोविंददेव जी के सामने


 मुगल सल्तनत ने देव मंदिरों को गिराने का जारी किया था शाही फरमान 
जयपुर। सुबह पो फटने के पहले से लेकर रात्रि के द्वितीय प्रहर में पट बंद होने तक हजारों कृतज्ञ श्रद्धालुओं की भीड़, चारों ओर राधे राधे की अनुगूंज और हर प्रहर में गूंजती घंटे घडिय़ालों की मधुर धुन। वृंदावन जैसी धूम मचाने वाला यह अनुपम दृश्य जयपुर में सैकड़ों बरसों से जीवंत होता आ रहा है। जी हां हम बात कर रहे हैं नगर वासियों के आराध्य गोविंददेवजी की।

संभवत कुछ ही लोगों को यह जानकारी होगी कि गोविंददेवजी की शृंगारिक मूर्ति को भगवान श्रीकृष्ण के प्रपौत्र ब्रजनाभ ने बनाया था। और जब उन्हें जयपुर लाया गया तो गोविंददेव जी सबसे पहले आमेर की घाटी के नीचे विराजे और यहां लगभग एक वर्ष तक रहे।
श्रीकृष्ण के प्रपौत्र मूर्तिकार थे, उन्होंने कृष्ण को नहीं देखा था
इतिहासकार और गोविंद के अनन्य भक्त बताते हैं कि श्रीकृष्ण के प्रपौत्र ब्रजनाभ एक अच्छे मूर्तिकार भी थे। उनकी इच्छा थी कि भगवान श्रीकृष्ण की असली मूरत हमेशा भक्तों के नयनों में बसी रहे। बस इसी विचार को लेकर वे उनका विग्रह बनाने में जुट गए। उन्होंने कभी कृष्ण को नहीं देखा था लेकिन उनकी दादी ने कृष्ण को देखा था, इसलिए सबसे पहले ब्रजनाभ ने जो विग्रह तैयार किया उसे उन्होंने दादी को ले जाकर दिखाया। विग्रह देखकर वे बोलीं कि भगवान के पांव और चरण तो बिलकुल उन जैसे बन गए पर अन्य अवयव कृष्ण से नहीं मिलते। यह विग्रह मदनमोहन के नाम से जाना गया, जो अब करौली में विराजित है। इसके बाद ब्रजनाभ ने दूसरी मूर्ति बनाई जिसमें भगवान का वक्षस्थल और बाहु सही बने। इसे गोपीनाथ का स्वरूप कहा गया। उन्होंने जब तीसरी मूर्ति बनाई तो उसे देखकर ब्रजनाभ की दादी कह उठीं, अहा भगवान का अरविंद नयनों वाला मुखारविंद ठीक ऐसा ही था। यह विग्रह गोविंददेवजी कहलाया।
एक साल तक आमेर की घाटी में विराजे थे गोविंददेव जी
ब्रजभूमि से पधारे गोविंद देव1669 में जब मुगल सल्तनत ने शाही फरमान जारी कर ब्रजभूमि के देव मंदिरों को गिराने का हुक्म दिया तो इस दौरान वहां की सभी प्रधान मूर्तियां सुरक्षा के लिए अन्यत्र ले जाई गईं। माधव गौड़ या गौडिय़ा संप्रदाय के गोविंद देव, गोपीनाथ और मदनमोहन ये तीनों स्वरूप जयपुर आए। इसमें गोविंद देव पहले आमेर की घाटी के नीचे विराजे और जयपुर बनने पर जय निवास की इस बारहदरी में विराजे।

सवाई जयसिंह को सपने में मिली प्रेरणा यह विख्यात मंदिर उस बारहदरी में है जो सूरज महल के नाम से जयनिवास बाग में चंद्रमहल और बादल महल के मध्य बनी थी। किंवदंती है कि सवाई जयसिंह जब यह शहर बसा रहे थे तो सबसे पहले वे इसी बारहदरी में रहने लगे थे। एक बार रात में उन्हें स्वप्न आया कि यह स्थान तो भगवान का है इसलिए इसे छोड़ देना चाहिए। अगले ही दिन जयसिंह चंद्रमहल में रहने लगे और इस स्थान पर आमेर की घाटी के नीचे विराजे गोविंददेवजी पधराए गए।

गौडिय़ा पद्धति से होती है पूजा अर्चना गोविंददेवजी की सेवा पूजा गौडिय़ा वैष्णवों की पद्धति से की जाती है। यहां हर रोज सात झांकियां होती हैं और प्रत्येक झांकी के समय गाए जाने वाले भजन और कीर्तन निर्धारित हैं। कहा जाता है कि गोविंददेवजी की झांकी में दोनों ओर जो दो सखियां खड़ी हैं इनमें एक राधा ठकुरानी की सेवा के लिए सवाई जयसिंह ने चढ़ाई थी। इसके बाद जयपुर के महाराजा प्रतापसिंह की एक सेविका भगवान की पान सेवा किया करती थी। जब उसकी मृत्यु हो गई तो प्रतापसिंह ने उसकी प्रतिमा बनाकर दूसरी सखी चढ़ाई, जिससे इस झांकी की शोभा और सुंदरता में और वृद्धि हो गई।

योद्धा और विद्वान दोनों रहे नतमस्तक गोविंददेव के इस विग्रह के सामने राजा मानसिंह जैसे वीर योद्धा का सिर झुका और अकबर जैसे विद्वान बादशाह ने भी इसका सम्मान किया। माधव गौड़ वैष्णव संप्रदाय की इस सर्वोच्च और शिरोमणि मूर्ति को जयपुर वाले तो अपना इष्ट देव मानते ही हैं, चैतन्य के हजारों अनुयायी बंगाल, बिहार, मणिपुर, असम और देश के विभिन्न भागों से दर्शन के लिए आते हैं। बंगाल के चैतन्य महाप्रभु ने चार सदियों पहले भक्ति भाव और कीर्तन का जो रास्ता सांसारिक लोगों को बताया था, उसका जादू गोविंददेवजी के मंदिर में प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। मंगला आरती से लेकर शयन आरती तक,यहां हर रोज लाखों सिर अपने प्रिय नटवर नागर की मोहिनी मूरत के आगे नत मस्तक रहते हैं। जयपुर इसी विभूति के कारण भक्तों के लिए वृंदावन बना हुआ है।

ऐसे पहुंचे गोविंददेवजी जयपुर के जयनिवास बाग जयपुर नगर के इतिहास में एके राय ने गोविंददेवजी की वृंदावन से जयपुर की यात्रा का क्रम इस प्रकार निर्धारित किया है-
1590 से 1667-1670 के बीच वृंदावन के गोविंददेव मंदिर में स्थापित रहे।
1670 से 1714 तक कामा या वृंदावन में ही विग्रह को छिपा कर रखा गया।
1714 से 1715 आमेर के निकट वृंदावन में रहे जिसे अब कनक वृंदावन के नाम से जाना जाता है।
1715 से निरंतर जयनिवास बाग में स्थित
सोर्स पुस्तक- राज दरबार और रनिवास, इंडियन आर्किटे्रक्चर ब्राउन और वृंदावन से प्रकाशित ब्रज के इतिहास का दूसरा भाग अरविंद नयनों वाले विग्रह गोविंद

शनिवार, 18 अप्रैल 2015

चीन के बाद ये है विश्व की दूसरी सबसे बड़ी दीवार, एक साथ दस घोड़े दौड़ सकते

जयपुर। दुनिया में सबसे लंबी दीवार का खिताब चीन के पास है लेकिन बहुत कम लोग ही शायद इस बात से वाकिफ हों कि दुनिया की दूसरी सबसे लंबी दीवार राजस्थान में स्थित है। यह दीवार राजस्थान के अभेद्य माने जाने वाले कुंभलगढ़ किले की सुरक्षा के लिए बनाई गई थी। कुंभलगढ़ किले का निर्माण राजा कुंभा ने करवाया था। यह किला राजस्थान के उन 6 किलों में से एक है जो वर्ल्ड हेरिटेज की सूची में शामिल हैं। इस किले के चारो तरफ बनी इस दीवार को भेदने की कोशिश महान राजा अकबर ने भी किया, लेकिन भेद न सके। इस दीवार की मोटाई इतनी है कि उस पर 10 घोड़े एक साथ दौड़ सकते हैं।
कैसे बनी ये 36 किलोमीटर लंबी दीवार
किले के दीवार की निर्माण से जुड़ी कहानी बहुत ही दिलचस्प है। 1443 में इसका निर्माण शुरू किया गया। दरअसल, इस दीवार का काम इसलिए करवाया जा रहा था ताकि विरोधियों से सुरक्षा हो सके। लेकिन किले के निर्माण में दीवार का बनना बंद होने का नाम ही नहीं ले रही थी। ऐसा माना जाता है कि अंतत: वहां की देवी के आह्वान पर एक संत की बलि दी गई फिर जाकर इस दीवार का निर्माण कार्य पूरा हो पाया।
इस किले के लिए चढ़ाई गई संत की बलि
देवी कुछ और ही चाहती हैं। राजा इस बात पर चिंतित हो गए और एक संत को बुलाया और पूरी कहानी सुनाकर इसका हल पूछा। संत ने बताया कि देवी इस काम को तभी आगे बढ़ने देंगी जब स्वेच्छा से कोई मानव बलि के लिए खुद को प्रस्तुत करे। राजा इस बात से चिंतित होकर सोचने लगे कि आखिर कौन इसके लिए आगे आएगा। तभी संत ने कहा कि वह खुद बलिदान के लिए तैयार है और इसके लिए राजा से आज्ञा मांगी।
जहां गिरा संत का सिर वहां बना मुख्य द्वार
संत ने कहा कि उसे पहाड़ी पर चलने दिया जाए और जहां वो रुके वहीं उनकी बलि चढ़ा दी जाए और वहां एक देवी का मंदिर बनाया जाए। ठीक ऐसा ही हुआ और वह कुछ किलोमीटर तक चलने के बाद रुक गया और उसका सिर धड़ से अलग कर दिया गया। जहां पर उसका सिर गिरा वहां मुख्य द्वार है और जहां पर उसका शरीर गिरा वहां दूसरा मुख्य द्वार है। यह किला चारो तरफ से अरावली की पहाड़ियों की मजबूत ढाल द्वारा सुरक्षित है।
चीन के बाद सबसे लंबी दीवार
इसका निर्माण पंद्रहवी सदी में राणा कुंभा ने करवाया था। पर्यटक किले के ऊपर से आसपास के रमणीय दृश्यों का आनंद ले सकते हैं। शत्रुओं से रक्षा के लिए इस किले के चारों ओर दीवार का निर्माण किया गया था। ऐसा कहा जाता है कि चीन की महान दीवार के बाद यह सबसे लंबी दीवार है। यह किला 1,914 मीटर की ऊंचाई पर समुद्र स्तर से परे क्रेस्ट शिखर पर बनाया गया है। इस किले के निर्माण को पूरा करने में 15 साल का समय लागा। दुर्ग की विशालता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यह किसी एक पहाड़ी पर बना हुआ नहीं है, बल्कि इसे कई घाटियों और पहाड़ियों को मिलाकर गढ़ा गया है।
 
दस घोड़े एक साथ दौड़ते है इसके दीवार पर
महाराणा कुंभा के रियासत में कुल 84 किले आते थे जिसमें से 32 किलों का नक्शा उसके द्वारा बनवाया गया था। कुंभलगढ़ भी उनमें से एक है। इस किले की दीवार की चौड़ाई इतनी ज्यादा है कि 10 घोड़ एक ही समय में उसपर दौड़ सकते हैं। वहीं, चीन की दीवार पर एक साथ केवल 5 घोड़े दौड़ सकते हैं। एक मान्यता यह भी है कि महाराणा कुंभा अपने इस किले में रात में काम करने वाले मजदूरों के लिए 50 किलो घी और 100 किलो रूई का प्रयोग करते थे।
सुरक्षा ऐसी कि परिंदा भी न मार सके पैर
सुरक्षा को मद्देनजर इस दुर्ग में ऊंचे स्थानों पर महल, मंदिर व आवासीय इमारतें बनायीं गई और समतल भूमि का उपयोग कृषि कार्य के लिए किया गया। वहीं, ढलान वाले भागों का उपयोग जलाशयों के लिए कर इस दुर्ग को यथासंभव स्वावलंबी बनाया गया। इस दुर्ग के भीतर एक और गढ़ है जिसे कटारगढ़ के नाम से जाना जाता है यह गढ़ सात विशाल द्वारों व सुदृढ़ प्राचीरों से सुरक्षित है।
सिर्फ एक बार छाया किले पर हार का साया
कुंभलगढ़ को अपने इतिहास में सिर्फ एक बार हार का सामना करना पड़ा जब मुगल सेना ने किले की तीन महिलाओं को जान से मारने की धमकी देकर अंदर प्रवेश करने का रास्ता पूछा। महिलाओं ने डर से एक गुप्त द्वार बताया, लेकिन इसके बाद भी मुगल अंदर जाने में सफल नहीं हो पाए। एक बार फिर अकबर के बेटे सलीम ने भी इस किले पर फतह करने की सोची, लेकिन उसे भी खाली हाथ वापस लौटना पड़ा।
धोखा देने पर चुनवा दिया दीवार में
कुछ समय बाद जब राजा को उस महिलाओं के बारे में पता चला तो उन्होंने तीनों को किले के द्वार पर दीवार में जिंदा चुनवा दिया। ऐसा कर राजा ने लोगों को यह संदेश दिया कि राज्य के सुरक्षा के साथ जो भी खिलवाड़ करेगा उसका यही अंजाम होगा।
यहां का लाइट और साउंड शो है सबसे फेमस
किले के अंदर प्रवेश के लिए सात द्वार बने हुए हैं जिसमें, राम द्वार, पग्र द्वार, हनुमान द्वार आदि फेमस हे। इस किले के अंदर कुल 360 मंदिरों का समूह है जिसमें, 300 जैन मंदिर और 60 हिन्दू मंदिर हैं। इनमें से नीलकंठ महादेव के मंदिर का महत्व अन्य मंदिरों से ज्यादा है। इस मंदिर के पास देर शाम होने वाले लाइट और साउंड शो की अपनी एक अलग पहचान है। इस शो में बेहदखूबसूरती से कुंभलगढ़ किला के पूरे इतिहास के बारे में बताया जाता है। चारों ओर ऊंचे-ऊंचे पहाड़, घोड़ों के दौडऩे और बंदूकों की गोलियों की आवाज आज भी लोगों को प्रचीन समय का आभास कराता है।

जिसे कोई और न मार सका उसके बेटे ने ही ले ली जान
महाराणा प्रताप की जन्म स्थली कुंभलगढ़ एक तरह से मेवाड़ की संकटकालीन राजधानी रहा है। महाराणा कुंभा से लेकर महाराणा राज सिंह के समय तक मेवाड़ पर हुए आक्रमणों के समय राजपरिवार इसी दुर्ग में रहा। यहीं पर पृथ्वीराज और महाराणा सांगा का बचपन बीता था। जिन महाराणा कुंभा को कोई नहीं हरा सका, उन्हें उन्हीं के पुत्र उदयकर्ण ने राजलिप्सा के लिए मार डाला। महाराणा के ज्येष्ठ पुत्र उदयसिंह को ऊदा के नाम से भी जाना जाता है। ऊदा ने यहीं एक कुंड के पास पिता कुंभा की हत्या कर दी थी।
इसे बनाते समय रखा गया वास्तु शास्त्र का ध्यान
वास्तु शास्त्र के नियमानुसार बने इस दुर्ग में प्रवेश द्वार, प्राचीर,जलाशय, बहार जाने के लिए संकटकालीन द्वार, महल, मंदिर, आवासीय इमारते, यज्ञ वेदी, स्तम्भ, छत्रियां आदि बने है।

नीलकंठ महादेव मंदिर
नीलकंठ महादेव मंदिर, कुंभलगढ़ किले के पास स्थित है। इस मंदिर में पत्थर से बना हुआ छह फुट का शिवलिंग है। यह पवित्र स्थल भगवान शिव को समर्पित है, जो कि इस क्षेत्र के मुख्य देवता हैं। इतिहास के अनुसार राजा राणा कुंभा इस देवता की पूजा करते थे।
हरियाली में है गजब
उदयपुर के निकट यह कुंभलगढ़ अभ्यारण्य, चार सींगों वाले हिरन या चौसिंघा, काला तेंदुआ,जंगली सूअर, भेड़ियों, भालू, सियार, सांभर हिरन, चिंकारा, तेंदुओं,लकड़बघ्घों, जंगली बिल्ली, नीलगाय और खरगोश देखने के लिए आदर्श स्थल है। राज्य में केवल इस अभ्यारण्य में ही पर्यटक भेड़ियों को देख सकते हैं।
इस महल में बिना एसी के ही बनी रहती है ठंढक
बादल महल को ‘बादलों के महल' के नाम से भी जाना जाता है। इसकी खासियत है इसकी अद्भुत बनावट। इसमें इसमें बिना एयर कंडिशन के ठंड का अहसास होता है। यह कुंभलगढ़ किले के शीर्ष पर स्थित है। इस महल में दो मंजिलें हैं एवं यह संपूर्ण भवन दो आतंरिक रूप से जुड़े हुए खंडों, मर्दाना महल और जनाना महल में विभाजित हैं। इस महल के कमरों को पेस्टल रंगों के भित्ति चित्रों के साथ चित्रित किया गया है जो उन्नीसवीं शताब्दी के काल को प्रदर्शित करते हैं। फिरोजी, हरा एवं सफेद इन भव्य कमरों के मुख्य रंग हैं।
इस मंदिर में दिखती है धन के देवता कुबेर की छवि
मम्मदेव मंदिर का निर्माण राजा राणा कुंभा ने वर्ष 1460 में करवाया था। यह तीर्थ कुंभलगढ़ किले के नीचे स्थित है और इसमें चार तख्ते हैं। पर्यटक तख्तों पर खुदे हुए शिलालेख देख सकते हैं जो मेवाड़ का इतिहास बताते हैं। यहां इतिहास गुहिल के काल से प्रारंभ होकर राणा कुंभा के समय तक लिखा गया है। गुहिल मेवाड़ के संस्थापक थे। वर्तमान में ये तख्ते उदयपुर के संग्रहालय में सुरक्षित रूप से रखे हुए हैं। पर्यटक मंदिर के भीतर धन के देवता कुबेर की छवि एवं दो कब्रों को देख सकते हैं।
परशुराम मंदिर
परशुराम मंदिर एक प्राचीन गुफा के अंदर स्थित है एवं प्रसिद्ध संत परशुराम को समर्पित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार संत परशराम ने भगवान राम का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए यहां तपस्या की थी। पर्यटकों को गुफा तक पहुंचने के लिए 500 सीढियां उतरनी पड़ती हैं।
 
घूमने के लिए फुल पैकेज है कुंभलगढ़
कुंभलगढ़ अपने शानदार महलों के अतिरिक्त कई प्राचीन मंदिरों के लिए भी प्रसिद्ध है। उनमें से वेदी मंदिर, नीलकंठ महादेव मंदिर, मुच्छल महादेव मंदिर, परशुराम मंदिर, मम्मादेव मंदिर और रणकपुर जैन मंदिर इस पर्यटन स्थल के मुख्य पवित्र स्थल हैं।

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2015


 
जयपुर। यूं तो भारत में हनुमानजी के लाखों मंदिर हैं। हर मंदिर पर भक्तों की भीड़ उमड़ती है, पर राजस्थान के दौसा जिला स्थित घाटा मेंहदीपुर बालाजी की बात ही अलग है। मेंहदीपुर बालाजी को दुष्ट आत्माओं से छुटकारा दिलाने के लिए दिव्य शक्ति से प्रेरित हनुमानजी का बहुत ही शक्तिशाली मंदिर माना जाता है। यहां कई लोगों को जंजीर से बंधा और उलटे लटके देखा जा सकता है। यह मंदिर और इससे जुड़े चमत्कार देखकर कोई भी हैरान हो सकता है। शाम के समय जब बालाजी की आरती होती है तो भूत-प्रेत से पीड़ित लोगों को जूझते देखा जाता है।

जंजीर में बांधकर लाए जाते हैं पीड़ित
कहा जाता है कि कई सालों पहले हनुमानजी और प्रेत राजा अरावली पर्वत पर प्रकट हुए थे। बुरी आत्माओं और काले जादू से पीड़ित रोगों से छुटकारा पाने लोग यहां आते हैं। इस मन्दिर को इन पीड़ाओं से मुक्ति का एकमात्र मार्ग माना जाता है। मंदिर के पंडित इन रोगोंं से मुक्ति के लिए कई उपचार बताते हैं। शनिवार और मंगलवार को यहां आने वाले भक्तों की संख्या लाखों में पहुंच जाती है। कई गंभीर रोगियों को लोहे की जंजीर से बांधकर मंदिर में लाया जाता है। यहां आने वाले पीडित लोगों को देखकर सामान्य लोगों की रूह तक कांप जाती है। ये लोग मंदिर के सामने ऐसे चिल्ला-चिल्ला के अपने अंदर बैठी बुरी आत्माओं के बारे में बताते हैं, जिनके बारे में इनका दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं रहता है। भूत-प्रेत ऊपरी बाधाओं के निवारणार्थ यहां आने वालों का तांता लगा रहता है। ऐसे लोग यहां पर बिना दवा और तंत्र-मंत्र के स्वस्थ होकर लौटते हैं।
बादशाहों ने मूर्ति को नष्ट करने की थी कोशिश
कहा जाता है कि मुस्लिम शासनकाल में कुछ बादशाहों ने इस मूर्ति को नष्ट करने का प्रयास किया। हर बार ये बादशाह असफल रहे। वे इसे जितना खुदवाते गए मूर्ति की जड़ उतनी ही गहरी होती चली गई। थक हार कर उन्हें अपना यह कुप्रयास छोड़ना पड़ा। ब्रिटिश शासन के दौरान सन 1910 में बालाजी ने अपना सैकड़ों वर्ष पुराना चोला स्वतः ही त्याग दिया। भक्तजन इस चोले को लेकर समीपवर्ती मंडावर रेलवे स्टेशन पहुंचे, जहां से उन्हें चोले को गंगा में प्रवाहित करने जाना था। ब्रिटिश स्टेशन मास्टर ने चोले को निःशुल्क ले जाने से रोका और उसका लगेज करने लगा, लेकिन चमत्कारी चोला कभी मन भर ज्यादा हो जाता और कभी दो मन कम हो जाता। असमंजस में पड़े स्टेशन मास्टर को अंततः चोले को बिना लगेज ही जाने देना पड़ा और उसने भी बालाजी के चमत्कार को नमस्कार किया। इसके बाद बालाजी को नया चोला चढ़ाया गया। एक बार फिर से नए चोले से एक नई ज्योति दीप्यमान हुई।
प्रेतराज सरकार और कोतवाल कप्तान के मंदिर
बालाजी महाराज के अलावा यहां श्री प्रेतराज सरकार और श्री कोतवाल कप्तान ( भैरव) की मूर्तियां भी हैं। प्रेतराज सरकार जहां दंडाधिकारी के पद पर आसीन हैं। वहीं, भैरव जी कोतवाल के पद पर। यहां आने पर ही मालूम चलता है कि भूत और प्रेत किस तरह से मनुष्य को परेशान करते हैं। दुखी व्यक्ति मंदिर में आकर तीनों देवगणों को प्रसाद चढाना पड़ता है। बालाजी को लड्डू प्रेतराज सरकार को चावल और कोतवाल कप्तान (भैरव) को उड़द का प्रसाद चढ़ाया जाता है। इस प्रसाद में से दो लड्डू रोगी को खिलाए जाते हैं। शेष प्रसाद पशु पक्षियों को डाल दिया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि पशु पक्षियों के रूप में देवताओं के दूत ही प्रसाद ग्रहण कर रहे होते हैं। कुछ लोग बालाजी का नाम सुनते ही चैंक पड़ते हैं। उनका मानना है कि भूतप्रेतादि बाधाओं से ग्रस्त व्यक्ति को ही वहां जाना चाहिए। ऐसा सही नहीं है। कोई भी व्यक्ति जो बालाजी के प्रति भक्तिभाव रखता है , इन तीनों देवों की आराधना कर सकता है। अनेक भक्त तो देश-विदेश से बालाजी के दरबार में मात्र प्रसाद चढ़ाने नियमित रूप से आते हैं।
प्रसाद खाते ही झूमने लगते हैं पीड़ित लोग
प्रसाद का लड्डू खाते ही रोगी व्यक्ति झूमने लगता है। भूत प्रेतादि स्वयं ही उसके शरीर में आकर चिल्लाने लगते हैं। कभी वह अपना सिर धुनता है कभी जमीन पर लोटने लता है। पीड़ित लोग यहां पर अपने आप जो करते हैं वह एक सामान्य आदमी के लिए संभव नहीं है। इस तरह की प्रक्रियाओं के बाद वह बालाजी की शरण में आ जाता है फर उसे हमेशा के लिए इस तरह की परेशानियों से मुक्ति मिल जाती है। बालाजी महाराज के मंदिर में प्रातः और सायं लगभग चार चार घंटे पूजा होती है। 
श्री प्रेतराज सरकार
बालाजी मंदिर में प्रेतराज सरकार दण्डाधिकारी पद पर आसीन हैं। प्रेतराज सरकार के विग्रह पर भी चोला चढ़ाया जाता है। प्रेतराज सरकार को दुष्ट आत्माओं को दण्ड देने वाले देवता के रूप में पूजा जाता है। भक्तिभाव से उनकी आरती , चालीसा, कीर्तन, भजन आदि किए जाते हैं। बालाजी के सहायक देवता के रूप में ही प्रेतराज सरकार की आराधना की जाती है। प्रेतराज सरकार को पके चावल का भोग लगाया जाता है। भक्तजन प्रायः तीनों देवताओं को बूंदी के लड्डुओं का ही भोग लगाते हैं।
कोतवाल कप्तान श्री भैरव देव
कोतवाल कप्तान श्री भैरव देव भगवान शिव के अवतार हैं और उनकी ही तरह भक्तों की थोड़ी-सी पूजा-अर्चना से ही प्रसन्न भी हो जाते हैं। भैरव महाराज चतुर्भुजी हैं। उनके हाथों में त्रिशूल , डमरू, खप्पर तथा प्रजापति ब्रह्मा का पांचवां कटा शीश रहता है। वे कमर में बाघाम्बर नहीं , लाल वस्त्र धारण करते हैं। वे भस्म लपेटते हैं। उनकी मूर्तियों पर चमेली के सुगंध युक्त तिल के तेल में सिन्दूर घोलकर चोला चढ़ाया जाता है।
इसलिए कहा जाता है कोतवाल कप्तान
शास्त्र और लोक कथाओं में भैरव देव के अनेक रूपों का वर्णन है, जिनमें एक दर्जन रूप प्रामाणिक हैं। श्री बाल भैरव और श्री बटुक भैरव, भैरव देव के बाल रूप हैं। भक्तजन प्रायः भैरव देव के इन्हीं रूपों की आराधना करते हैं। भैरव देव बालाजी महाराज की सेना के कोतवाल हैं। इन्हें कोतवाल कप्तान भी कहा जाता है। बालाजी मन्दिर में आपके भजन, कीर्तन, आरती और चालीसा श्रद्धा से गाए जाते हैं। प्रसाद के रूप में आपको उड़द की दाल के वड़े और खीर का भोग लगाया जाता है। किन्तु भक्तजन बूंदी के लड्डू भी चढ़ा दिया करते हैं । सामान्य साधक भी बालाजी की सेवा-उपासना कर भूतप्रेतादि उतारने में समर्थ हो जाते हैं। इस कार्य में बालाजी उसकी सहायता करते हैं। वे अपने उपासक को एक दूत देते हैं , जो नित्य प्रति उसके साथ रहता है।
 
 
 
 
 
 

एक रात में तैयार हुई थी ये बावड़ी, इसकी गुफा में गायब हो गई थी पूरी बारात

जयपुर. सीढ़ियों की भूल-भुलैया के लिए ख्यात दौसा के आभानेरी कस्बा स्थित चांद बावड़ी नए टूरिस्ट डेस्टिनेशन के रूप में जल्द ही दुनिया के मानचित्र पर नजर आएगी। केंद्र ने इसके प्रचार-प्रसार के लिए बजट भी मंजूर कर दिया है। ऐसा माना जाता है कि यह बावड़ी एक रात में तैयार हुई थी। एक बार इसमें बनी गुफा में बारात गई जो आज तक वापस नहीं आई।
इसके कायाकल्प के लिए राज्य सरकार ने भी अपने स्तर पर तैयारी की है। इसके तहत शुरुआत में 50 लाख रुपए की लागत से इसके आसपास के अतिक्रमण हटाने और नए रास्ते तैयार कराए जा रहे हैं। भारतीय पुरातत्व विभाग के सहायक पुराविद प्रवीण सिंह के मुताबिक यहां एंट्री टिकट शुरू करने के लिए केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा गया है। पुरातत्व विभाग के निदेशक हृदेश कुमार ने बताया कि यहां पर टूरिज्म की काफी संभावना है। अब तक यहां करीब 47 लाख के काम हो चुके हैं। टूरिस्ट फैसिलिटी भी डेवलप की गई है।

गुफा

बावड़ी की सबसे निचली मंजिल पर बने दो ताखों में स्थित गणेश एवं महिसासुर मर्दिनी की भव्य प्रतिमाएं इसकी खूबसूरती में चार चांद लगा देती हैं। इस बावड़ी में एक गुफा भी है, जिसकी लंबाई लगभग 17 कि.मी. है, जो पास ही स्थित गांव भांडारेज में निकलती है। कहा जाता है कि युद्ध के समय राजा एवं उनके सैनिकों द्वारा इस सुरंग का इस्तेमाल किया जाता था।
भूल-भुलैया के लिए मशहूर
> बावड़ी में 250 एक समान सीढ़ियों की भूल-भुलैया है। कहा जाता है कि कोई सीढ़ियों पर सिक्के रखकर भी वापस आना-जाना चाहे तो चूक तय है। एक फिल्म की शूटिंग के दौरान आए गोविंदा ने भी इसे स्वीकारा।
> किंवदंती है कि एक बार एक बारात यहां आई और बावड़ी में मौजूद अंधेरी-उजाली गुफा में उतर गई। इसके बाद बाहर नहीं आई।
> कहते हैं चांदबावड़ी, अलूदा की बावड़ी और भांडारेज की बावड़ी को एक रात में बनाया गया। ये तीनों सुरंग से एक-दूसरे से जुडी हैं।
हॉलीवुड व बॉलीवुड भी नहीं रहे दूर
आभानेरी अंग्रेजी और हिन्दी फिल्मों में भी छाई हुई है। अंग्रेजी फिल्म 'द फ़ॉल' व प्रसिद्ध हिन्दी फिल्म 'भूल भूलैया' सहित अन्य कई फिल्मों की शूटिंग यहां हो चुकी है। चांद बावड़ी की सीढ़ियों पर कई कलाकार भी थिरक चुके हैं।
यह भी खास
> बावड़ी वाटर हार्वेस्टिंग का खूबसूरत नमूना है।
> यह धरोहर देश की सबसे बड़ी और गहरी बावड़ी में शुमार है।
> यहां के राजा चांद ने 8वीं सदी में इसे बनवाया था।
> बावड़ी में बेहद खूबसूरत भित्ति चित्र बने हुए हैं।