शुक्रवार, 27 मार्च 2015

ऐसा वीर जिसने सेना में आगे रहने को अपना सिर काटकर फेंका था किले में इस वीर ने अपना सिर काटकर फेंका था किले में और जीत ली थी प्रतियोगिता

जयपुर। राजस्थान का इतिहास यहां के राजपूतों के हजारों वीरता की सच्ची गाथाओं के लिए भी जाना जाता है। उन्हीं गाथाओं मे से एक है जैत सिंह चुण्डावत की कहानी। मेवाड़ के महाराणा अमर सिंह की सेना की दो राजपूत रेजिमेंट चुण्डावत और शक्तावत में अपनी श्रेष्ठता साबित करने के लिए एक प्रतियोगिता हुई थी। इस प्रतियोगिता को राजपूतों की अपनी आन, बान और शान के लिए अपने प्राण तक न्यौछावर कर देने वाली कहावत का एक अच्छा उदाहरण माना जाता है।
मेवाड़ के महाराणा अमर सिंह की सेना में विशेष पराक्रमी होने के कारण चुण्डावत खांप के वीरों को ही युद्ध भूमि में अग्रिम पंक्ति में रहने का गौरव मिला हुआ था। वह उसे अपना अधिकार मानते थे। किन्तु शक्तावत खांप के वीर राजपूत भी कम पराक्रमी नहीं थे। उनकी भी इच्छा थी की युद्ध क्षेत्र में सेना में आगे रहकर मृत्यु से पहला मुकाबला उनका होना चाहिए। उन्होंने मांग रखी कि हम चुंडावतों से त्याग, बलिदान व शौर्य में किसी भी प्रकार कम नहीं है। युद्ध भूमि में आगे रहने का अधिकार हमें मिलना चाहिए। इसके लिए एक प्रतियोगिता रखी गई जिसे जीतने के लिए चुण्डावत ने अपना सिर खुद धड़ से अलग कर किले में फेंक दिया था।
सभी जानते थे कि युद्ध भूमि में सबसे आगे रहना यानी मौत को सबसे पहले गले लगाना। मौत की इस तरह पहले गले लगाने की चाहत को देख महाराणा धर्म-संकट में पड़ गए। किस पक्ष को अधिक पराक्रमी मानकर युद्ध भूमि में आगे रहने का अधिकार दिया जाए?
इसका निर्णय करने के लिए उन्होंने एक कसौटी तय की, जिसके अनुसार यह निश्चित किया गया कि दोनों दल उन्टाला दुर्ग (किला जो कि बादशाह जहांगीर के अधीन था और फतेहपुर का नवाब समस खां वहां का किलेदार था) पर अलग-अलग दिशा से एक साथ आक्रमण करेंगे व जिस दल का व्यक्ति पहले दुर्ग में प्रवेश करेगा उसे ही युद्ध भूमि में रहने का अधिकार दिया जाएगा।
प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए दोनों दलों के रण-बांकुरों ने उन्टाला दुर्ग (किले) पर आक्रमण कर दिया। शक्तावत वीर दुर्ग के फाटक के पास पहुंच कर उसे तोड़ने का प्रयास करने लगे तो चुंडावत वीरों ने पास ही दुर्ग की दीवार पर रस्से डालकर चढ़ने का प्रयास शुरू कर दिया। इधर शक्तावतों ने जब दुर्ग के फाटक को तोड़ने के लिए फाटक पर हाथी को टक्कर देने के लिए आगे बढाया तो फाटक में लगे हुए लोहे के नुकीले शूलों से सहम कर हाथी पीछे हट गया।  
हाथी को पीछे हटते देख शक्तावतों का सरदार बल्लू शक्तावत, अद्भुत बलिदान का उदहारण देते हुए फाटक के शूलों पर सीना अड़ाकर खड़ा हो गया व महावत को हाथी से अपने शरीर पर टक्कर दिलाने को कहा जिससे कि हाथी शूलों के भय से पीछे न हटे।
एक बार तो महावत सहम गया, किन्तु फिर वीर बल्लू के मृत्यु से भी भयानक क्रोधपूर्ण आदेश की पालन करते हुए उसने हाथी से टक्कर मारी जिसके बाद फाटक में लगे हुए शूल वीर बल्लू शक्तावत के सीने में घुस गए और वह वीर-गति को प्राप्त हो गया। उसके साथ ही दुर्ग का फाटक भी टूट गया।
शक्तावत के दल ने दुर्ग का फाटक तोड़ दिया। दूसरी ओर चूण्डावतों के सरदार जैत सिंह चुण्डावत ने जब यह देखा कि फाटक टूटने ही वाला है तो उसने पहले दुर्ग में पहुंचने की शर्त जीतने के उद्देश्य से अपने साथी को कहा कि मेरा सिर काटकर दुर्ग की दीवार के ऊपर से दुर्ग के अन्दर फेंक दो। साथी जब ऐसा करने में सहम गया तो उसने स्वयं अपना मस्तक काटकर दुर्ग में फेंक दिया।
फाटक तोड़कर जैसे ही शक्तावत वीरों के दल ने दुर्ग में प्रवेश किया, उससे पहले ही चुण्डावत सरदार का कटा मस्तक दुर्ग के अन्दर मौजूद था। इस प्रकार चूणडावतों ने अपना आगे रहने का अधिकार अद्भुत बलिदान देकर कायम रखा।
 
 
 

न ही बादशाह अकबर और न अंग्रेज जान पाए इन 9 दैविक ज्वालाओं का राज

जयपुर। भारत ही क्या पूरे विश्व में पृथ्वी के गर्भ से ज्वाला निकलना वैसे कोई आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि पृथ्वी की अंदरूनी हलचल के कारण पूरी दुनिया में कहीं ज्वाला तो कहीं गरम पानी निकलता रहता है। कहीं-कहीं तो बाकायदा पावर हाऊस भी बनाए गए हैं, जिनसे बिजली उत्पादित की जाती है।
लेकिन नवरात्रों के पावन अवसर पर आपको आज बताने जा रहे हैं एक ऐसे मंदिर के बारे में जिसे हिमालय की गोद में पंजाब और हिमाचल के महाराजाओं ने बनवाया। इस मंदिर में प्राकृतिक रूप से निकलने वाली ज्वालाओं का रहस्य न तो बादशाह अकबर जान पाए थे और न ही अंग्रेज। अाजादी के बाद भी भूगर्भ विज्ञानियों से राज को जानने की कोशिश की लेकिन विफल हुए।
भूगर्भ से निकलने वाली ज्वाला को इस्तेमाल करना चाहते थे अंग्रेज
हिमाचल के कांगड़ा जिला के ज्वाला मां के इस मंदिर में निकलने वाली ज्वाला चमत्कारिक है। ब्रितानी काल में अंग्रेजों ने अपनी तरफ से पूरा जोर लगा दिया कि जमीन के अंदर से निकलती इस ऊर्जा का इस्तेमाल किया जाए, लेकिन लाख कोशिश करने पर भी वे इस भूगर्भ से निकलती इस ज्वाला का पता नहीं कर पाए कि यह आखिर इसके निकलने का कारण क्या है। वहीं इतिहास इस बात का भी गवाह है कि अकबर द ग्रेट लाख कोशिशों के बाद भी इसे बुझा न पाया।
भूगर्भ विज्ञानी सात दशकों से बैठे हैं तंबू गाड़ कर
यही नहीं पिछले सात दशकों से भूगर्भ विज्ञानी इस क्षेत्र में तंबू गाड़ कर बैठे हैं, वह भी इस ज्वाला की जड़ तक नहीं पहुंच पाए। यह सब बातें यह सिद्ध करती हैं की यहां ज्वाला प्राकृतिक रूप से ही नहीं चमत्कारी रूप से भी निकलती है, नहीं तो आज यहां मंदिर की जगह मशीनें लगी होतीं और बिजली का उत्पादन होता।
पृथ्वी के गर्भ से निकल रही है 9 ज्वालाएं
यह मंदिर माता के अन्य मंदिरों की तुलना में अनोखा है क्योंकि यहां पर किसी मूर्ति की पूजा नहीं होती है बल्कि पृथ्वी के गर्भ से निकल रही 9 ज्वालाओं की पूजा होती है। यहां पर पृथ्वी के गर्भ से 9 अलग अलग जगह से ज्वालाएं निकल रही हैं जिसके ऊपर ही मंदिर बना दिया गया है। इन 9 ज्योतियों को महाकाली, अन्नपूर्णा, चंडी, हिंगलाज, विंध्यवासिनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अंबिका, अंजीदेवी के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर का प्राथमिक निमार्ण राजा भूमि चंद ने करवाया था। बाद में पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह और हिमाचल के राजा संसारचंद ने 1835 में इस मंदिर का पूर्ण निमार्ण कराया। यही वजह है कि इस मंदिर में हिंदुओं और सिखों की साझी आस्था है।
यहां है यह चमत्कारिक ज्वाला मां का मंदिर
ज्वालामुखी देवी का मंदिर हिमाचल प्रदेश में कांगड़ा शहर से 30 किलोमीटर की दूरी पर है। ज्वालामुखी मंदिर को जोतां वाली का मंदिर भी कहा जाता है। ज्वालामुखी मंदिर को खोजने का श्रेय पांडवों को जाता है। इसकी गिनती माता के प्रमुख शक्ति पीठों में होती है। ऐसी मान्यता है कि यहां देवी सती की जीभ गिरी थी।
बादशाह अकबर ज्वालाओं को बुझाने के लिए खुदवा दी थी नहर
बादशाह अकबर ने इस मंदिर के बारे में सुना तो वह हैरान हो गया 7 उसने अपनी सेना बुलाई और खुद मंदिर की तरफ चल पड़ा। मंदिर में जलती हुई ज्वालाओं को देखकर उसके मन में शंका हुई। उसने अपनी सेना को मंदिर में जल रही ज्वालाओं पर पानी डालकर बुझाने के आदेश दिए। लाख कोशिशों के बाद भी अकबर की सेना मंदिर की ज्वालाओं को बुझा नहीं पाई। देवी मां की अपार महिमा को देखते हुए
उसने सवा मन (पचास किलो) सोने का छतर देवी मां के दरबार में चढ़ाया, लेकिन माता ने वह छतर कबूल नहीं किया और वह छतर गिर कर किसी अन्य पदार्थ में परिवर्तित हो गया। आज भी बादशाह अकबर का यह छतर ज्वाला देवी के मंदिर में पड़ा है।
गोरख डिब्बी का चमत्कारिक स्थान
मंदिर का मुख्य द्वार काफी सुंदर एवं भव्य है। मंदिर में प्रवेश के साथ ही बाएं हाथ पर अकबर नहर है। इस नहर को अकबर ने बनवाया था। उसने मंदिर में प्रज्ज्वलित ज्योतियों को बुझाने के लिए यह नहर बनवाया था। उसके आगे मंदिर का गर्भ द्वार है जिसके अंदर माता ज्योति के रूम में विराजमान है। थोड़ा ऊपर की ओर जाने पर गोरखनाथ का मंदिर है जिसे गोरख डिब्बी के नाम से जाना जाता है। कहते हैं की यहां गुरु गोरखनाथ पधारे थे और कई चमत्कार दिखाए थे। यहां पर आज भी एक पानी का कुण्ड है जो देखने मे खौलता हुआ लगता है पर वास्तव मे पानी ठंडा है। ज्वालामुखी मंदिर की चोटी पर सोने की परत चढ़ी हुई है।

गुरुवार, 26 मार्च 2015

370 किमी. पैदल चल यहां आया था अकबर, झुका चुके हैं शीश

जयपुर। भारत में ऐसे अनेक तीर्थ हैं, जो सभी धर्मों के लिए आस्था का केंद्र हैं। ऐसा ही एक तीर्थ है अजमेर शरीफ, जहां ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह है। कहा जाता है कि मुगल बादशाह अकबर आगरा से 370 किमी. पैदल ही चलकर ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पुत्र प्राप्ति की कामना लिए आया था। यही नहीं बॉलीवुड के शहंशाह माने जाने वाले अमिताभ बच्चन भी दादा बनने के बाद यहां चादर चढ़ाने आए थे। आज इस दर पर हर तबके के चेहरे दिखाई देते हैं चाहे वो किसी भी धर्म का क्यों न हो। यहां अक्सर बॉलीवुड स्टार्स अपने फिल्मों की सफलता के लिए दुआ मांगने आते रहे हैं।
बेहद दिलचस्प है इस दरगाह की कहानी
89 साल की उम्र में ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती ने खुद को घर के अंदर बंद कर लिया। उनसे जो भी मिलने आता, वह मिलने से इनकार कर देते। इस दौरान नमाज अता करते-करते वह एक दिन अल्लाह को प्यारे हुए। उनके चाहने वालों ने उस स्थान पर उन्हें दफना दिया और कब्र बना दी। बाद में, उस स्थान पर उनके प्रिय भक्तों ने एक भव्य मकबरे का निर्माण कराया, जिसे आजकल 'ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती का मकबरा' कहा जाता है।
रोचक है यहां की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि- माना जाता है कि ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती साहिब सन 1195 ई में मदीना से भारत आए थे। ख्वाजा साहिब ऐसे व़क्त भारत में आए, जब मोहम्मद गौरी की फौज पृथ्वीराज चौहान से पराजित होकर वापस गजनी की ओर भाग रही थी। उन लोगों ने ख्वाजा साहिब से कहा कि आप आगे न जाएं। आगे जाने पर आपके लिए ख़तरा पैदा हो सकता है, चूंकि मोहम्मद गौरी की पराजय हुई है। मगर ख्वाजा साहिब नहीं माने। वह कहने लगे, चूंकि तुम लोग तलवार के सहारे दिल्ली गए थे, इसलिए वापस आ रहे हो। मगर मैं अल्लाह की ओर से मोहब्बत का संदेश लेकर जा रहा हूं।
थोड़ा समय दिल्ली में रुककर वह अजमेर चले गए और वहीं रहने लगे। वह जब 97 वर्ष के हुए तो उन्होंने ख़ुद को घर के अंदर बंद कर लिया। जो भी मिलने आता, वह मिलने से इनकार कर देते। नमाज अता करते-करते वह एक दिन अल्लाह को प्यारे हुए, उस स्थान पर उनके चाहने वालों ने उन्हें दफ़ना दिया और क़ब्र बना दी। बाद में उस स्थान पर उनके चाहने वालों ने मकबरा बना दिया, जिसे आजकल ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती का मकबरा कहते है।
पुत्र प्राप्ति के बाद अकबर 437 किमी. पैदल चलकर आया था
ईरान में जन्में ख्वाजा साहब अपने जीवन के कुछ पड़ाव वहां बिताने के बाद भारत आ गए। एक बार बादशाह अकबर ने दरगाह शरीफ में दुआ मांगी कि उन्हें पुत्र-रत्न प्राप्त होगा तो वे पैदल चलकर जियारत पेश करने आएंगे। सलीम को पुत्र के रूप में प्राप्त करने के बाद अकबर ने आगरा से 437 किमी. दूर अजमेर शरीफ तक की यात्रा नंगे पैर चलकर की थी। यहां मन्नत मांगने के साथ पवित्र धागा बांधने का तो रिवाज है, परंतु मुराद पूरी होने पर खोलने का नहीं।
 हाथ लगते ही खुल गया था द्वार
ख़्वाजा के वंशज हुसैन अजमेरी ग़रीब नवाज़ की औलाद से ताल्लुक रखतें हैं। उनके पिता की मृत्य के बाद अजमेर शरीफ के लोगों ने यह तय किया कि उनके तीनो भाइयों को ख्वाजा के दर पर ले चलते हैं। इनमें से जिसके हाथ लगाने से दरवाजा रोजा शरीफ खुद-ब-खुद खुल जाएगा उसी को दरगाह शरीफ का दीवान मुकर्रर कर दिया जाएगा। लिहाजा उनके दो भाइयों के हाथ से रोजा शरीफ का दरवाजा नहीं खुला। उनके हाथ लगाते ही रोजा शरीफ का दरवाजा खुल गया।
वास्तुकला का सुंदर संगम
तारागढ़ पहाड़ी की तलहटी में स्थित दरगाह शरीफ वास्तुकला की दृष्टि से भी बेजोड़ है...यहां ईरानी और हिन्दुस्तानी वास्तुकला का सुंदर संगम दिखता है। दरगाह का प्रवेश द्वार और गुंबद बेहद खूबसूरत है। इसका कुछ भाग अकबर ने तो कुछ जहांगीर ने पूरा करवाया था। माना जाता है कि दरगाह को पक्का करवाने का काम माण्डू के सुल्तान ग्यासुद्दीन खिलजी ने करवाया था।
दरगाह के अंदर है चांदी का कटघरा
दरगाह के अंदर बेहतरीन नक्काशी किया हुआ एक चांदी का कटघरा है। इस कटघरे के अंदर ख्वाजा साहब की मजार है। यह कटघरा जयपुर के महाराजा राजा जयसिंह ने बनवाया था। दरगाह में एक खूबसूरत महफिल खाना भी है, जहां कव्वाल ख्वाजा की शान में कव्वाली गाते हैं। दरगाह के आस-पास कई अन्य ऐतिहासिक इमारतें भी स्थित हैं।
अकबर द्वारा चढ़ाए गए देग में बनता है पकवान
दरगाह के बरामदे में दो बड़ी देग रखी हुई हैं...इन देगों को बादशाह अकबर और जहांगीर ने चढ़ाया था। तब से लेकर आज तक इन देगों में काजू, बादाम, पिस्ता, इलायची, केसर के साथ चावल पकाया जाता है और गरीबों में बांटा जाता है। दरगाह में एक सुंदर महफिलखाना तथा कई दरवाजे हैं, जहां कव्वाल ख्वाजा की शान में कव्वाली गाते हैं। दरगाह के आसपास कई अन्य ऐतिहासिक इमारतें भी स्थित हैं।

गुरुवार, 15 मई 2014

राजस्थान में है सबसे शक्तिशाली तोप, जहां इसका गोला गिरा वहां आज तालाब है

जयपुर. पुराने जमाने में खुद को सुरक्षित रखने का सबसे अच्छा तरीका होता था कि किसी मजबूत किले के अंदर रहा जाए। राजा-महाराजा लोग किले के अंदर महल बनवाते थे, जो दुश्मन के हमले से उन्हें बचाते थे। बारूद और तोप की खोज के बाद मजबूत किले भी सुरक्षित नहीं रहे। हमलावर सेना तोप के गोलों से किसी भी किले को ढहा देती थी। ऐसे में शासकों के बीच सबसे ताकतवर तोप पाने की होड़ लगी रहती थी। 

सबसे ताकतवर और भारी तोप

राजस्थान के जयगढ़ के किले में रखे गए तोप की गिनती पुराने समय के सबसे ताकतवर और भारी तोपों में की जाती है। 1720 ई. में महाराजा सवाई जय सिंह ने इसे रायगढ़ के किले में लगवाया था। 50 टन वजनी इस तोप के बैरल की लंबाई 20 फीट है और बैरल का व्यास 11 इंच है।

35 किलोमीटर तक मार करने वाले इस तोप को एक बार फायर करने के लिए 100 किलो गन पाउडर की जरूरत होती थी। अधिक वजन के कारण इसे किले से बाहर नहीं ले जाया गया और न ही कभी युद्ध में इसका इस्तेमाल किया गया था। इस तोप को सिर्फ एक बार टेस्ट के लिए चलाया गया था। ऐसा कहा जाता है कि किले से दक्षिण की ओर 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित तालाब उसी टेस्ट फायर के गोले के गिरने से बना था।
दुनिया की सबसे लंबी बंदूक

बंदूक के आविष्कार के साथ ही गोली को ज्यादा से ज्यादा दूरी तक सटीक मार करने लायक बनाना चुनौती थी। शुरुआत में लोगों ने जाना कि गन के बैरल की लंबाई अधिक होने पर गोली ज्यादा दूरी तक सटीक मार करती है। इसके बाद लंबी बैरल वाली बंदूकें सामने आईं। जयगढ़ के किले में रखी गई बंदूक उसी समय की है। इस बंदूक को दुनिया की सबसे लंबी बंदूकों में गिना जाता है।
 
ऊंट की पीठ पर बांधी जाने वाली तोप

किले की रक्षा में तैनात ताकतवर और भारी तोपों का तभी इस्तेमाल होता था, जब कोई दुश्मन हमला करे। दूसरे राज्य पर हमला करने  के लिए इन भारी-भरकम तोपों को युद्ध भूमि तक ले जाना काफी कठिन था। इसी दौर में छोटे और हल्की तोपें बनाई गईं। इन तोपों को हाथी या ऊंट की पीठ पर बांधा जा सकता था। जयगढ़ के किले में रखी गई इस छोटी तोप को भी ऊंट की पीठ पर बांध कर चलाया जाता था। ईसा पूर्व से ही चीन के लोगों को बारूद की जानकारी थी। प्राचीन काल में बारूद का इस्तेमाल किसी जगह पर तेजी से आग फैलाने के लिए किया जाता था। 13वीं शताब्दी में लोगों को यह पता चला की बारूद के इस्तेमाल से किसी भारी चीज को दूर तक फेंका जा सकता है। इसके बाद दो तरह की तोपें बनाई गई। पहली भारी और लंबी नालवाली और दूसरी छोटी नालवाली। 15वीं शताब्दी में हाथ में लेकर चलाने वाली तोपें भी बनाई गई थी, बात में बंदूकों ने इनका स्थान ले लिया।
 
पहले तोप से फेंके जाते थे पत्थर
 
शुरुआत में तोपों का इस्तेमाल पत्थरों को फेंकने के लिए किया जाता था। ये तोपें पहले तांबे और कांसे की बनीं फिर लोहे की बनने लगीं। 15वीं शताब्दी में तोपें 30 इंच परिधि की होती थीं और 1,200 से 1,500 पाउंड भार के पत्थर के गोले चलाती थीं। लोहे की तोपें आने के बाद लोगों ने देखा की पत्थर की जगह लोहे के गोले से ज्यादा नुकसान पहुंचाया जा सकता है। इसके बाद तोपों में लोहे के गोलों का इस्तेमाल किया जाने लगा और बैरल का व्यास कम हो गया।

सोमवार, 5 मई 2014

तस्वीर देख दुश्मन की बेटी का हुआ दीवाना, भरी महफिल से किया अपहरण

राजस्थान की मिट्टी सदैव से ही महापुरुषों और वीरों की भूमि रही है। साथ ही यहां वीरों की वसुंधरा पर कई प्रेम कहानियां भी जो आज भी बहुत प्रचलित हैं। कभी कभी एक दासी के रूप के आगे नतमस्तक हो गया राज तो कभी राजा ने नाराज रानी ऐसी रूठी कि उसका नाम ही रूठी रानी पड़ गया।
यह एक ऐसे प्रेमी की कहानी जिसने अपनी प्रेमिका का अपहरण उसके पिता के सामने उस वक्त कर लिया जब उसका स्वयंवर चल रहा था। 
 दिल्ली की राजगद्दी पर बैठने वाले अंतिम हिन्दू शासक और भारत के महान वीर योद्धाओं में शुमार पृथ्वीराज चौहान का नाम कौन नहीं जानता। एक ऐसा वीर योद्धा जिसने अपने बचपन में ही शेर का जबड़ा फाड़ डाला था और जिसने अपनी आंखें खो देने के बावजूद भी मोहम्मद गौरी को मृत्यु का रास्ता दिखा दिया था। 
 ये सभी जानते हैं कि पृथ्वीराज चौहान एक वीर योद्धा थे लेकिन ये बहुत कम ही लोगों को पता है कि वो एक प्रेमी भी थे। वो कन्नौज के महाराज जय चन्द्र की पुत्री संयोगिता से प्रेम करते थे। दोनों में प्रेम इतना था कि राजकुमारी को पाने के लिए पृथ्वी स्वयंवर के बीच से उन्हें उठा लाए थे। इस प्रेम कहानी की शुरुआत बेहद रोचक है, आइये हम आपको बताते हैं कि आखिर कैसे शुरू हुई संयोगिता और पृथ्वीराज चौहान की प्रेम कहानी।
दिल्ली की सत्ता संभालने के साथ हुआ था चौहाण को संयोगिता से प्यार
 बात उन दिनों की है जब पृथ्वीराज चौहाण अपने नाना और दिल्ली के सम्राट महाराजा अनंगपाल की मृत्यु के बाद दिल्ली की राज गद्दी पर बैठे। गौरतलब है कि महाराजा अनंगपाल को कोई पुत्र नहीं था इसलिए उन्होंने अपने दामाद अजमेर के महाराज और पृथ्वीराज चौहाण के पिता सोमेश्वर सिंह चौहाण से आग्रह किया कि वे पृथ्वीराज को दिल्ली का युवराज घोषित करने की अनुमति प्रदान करें। महाराजा सोमेश्वर सिंह ने सहमति जता दी और पृथ्वीराज को दिल्ली का युवराज घोषित किया गया, काफी राजनीतिक संघर्षों के बाद पृथ्वीराज दिल्ली के सम्राट बने। दिल्ली की सत्ता संभालने के साथ ही पृथ्वीराज को कन्नौज के महाराज जयचंद की पुत्री संयोगिता भा गई।
सुंदरता के बखान को सुन राजकुमारी हो गईं थी देखने के लिए लालायित
उस समय कन्नौज में महाराज जयचंद्र का राज था। उनकी एक खूबसूरत राजकुमारी थी जिसका नाम संयोगिता था। जयचंद्र पृथ्वीराज की यश वृद्धि से ईर्ष्या का भाव रखा करते थे। एक दिन कन्नौज में एक चित्रकार पन्नाराय आया जिसके पास दुनिया के महारथियों के चित्र थे और उन्हीं में एक चित्र था दिल्ली के युवा सम्राट पृथ्वीराज चौहान का। जब कन्नौज की लड़कियों ने पृथ्वीराज के चित्र को देखा तो वे देखते ही रह गईं। सभी युवतियां उनकी सुन्दरता का बखान करते नहीं थक रहीं थीं। पृथ्वीराज के तारीफ की ये बातें संयोगिता के कानों तक पहुंची और वो पृथ्वीराज के उस चित्र को देखने के लिए लालायित हो उठीं।
 पृथ्वीराज के मन में राजकुमारी की मूर्ति देख प्रेम उमड़ पड़ा
 संयोगिता अपनी सहेलियों के साथ उस चित्रकार के पास पहुंची और चित्र दिखाने को कहा। चित्र देख पहली ही नजर में संयोगिता ने अपना सर्वस्व पृथ्वीराज को दे दिया, लेकिन दोनों का मिलन इतना सहज न था। महाराज जयचंद और पृथ्वीराज चौहान में कट्टर दुश्मनी थी। इधर चित्रकार ने दिल्ली पहुंचकर पृथ्वीराज से भेट की और राजकुमारी संयोगिता का एक चित्र बनाकर उन्हें दिखाया जिसे देखकर पृथ्वीराज के मन में भी संयोगिता के लिए प्रेम उमड़ पड़ा। उन्हीं दिनों महाराजा जयचंद्र ने संयोगिता के लिए एक स्वयंवर का आयोजन किया। इसमें विभिन्न राज्यों के राजकुमारों और महाराजाओं को आमंत्रित किया लेकिन ईर्ष्या वश पृथ्वीराज को इस स्वंयवर के लिए आमंत्रण नहीं भेजा। 
 राजकुमारी ने वरमाला मूर्ति को पहनाई और वो वास्तव में पृथ्वीराज के गले में पड़ी
 राजकुमारी के पिता ने चौहाण का अपमान करने के उद्देश्य से स्वयंवर में उनकी एक मूर्ति को द्वारपाल की जगह खड़ा कर दिया। राजकुमारी संयोगिता जब वर माला लिए सभा में आईं तो उन्हें अपने पसंद का वर (पृथ्वीराज चौहाण) कहीं नजर नहीं आए। इसी समय उनकी नजर द्वारपाल की जगह रखी पृथ्वीराज की मूर्ति पर पड़ी और उन्होंने आगे बढ़कर वरमाला उस मूर्ति के गले में डाल दी। वास्तव में जिस समय राजकुमारी ने मूर्ति में वरमाला डालना चाहा ठीक उसी समय पृथ्वीराज स्वयं आकर खड़े हो गए और माला उनके गले में पड़ गया। संयोगिता द्वारा पृथ्वीराज के गले में वरमाला डालते देख पिता जयचंद्र आग बबूला हो गए। वह तलवार लेकर संयोगिता को मारने के लिए आगे आए, लेकिन इससे पहले की वो संयोगिता तक पहुंचे पृथ्वीराज संयोगिता को अपने साथ लेकर वहां से निकल पड़े।
प्यार के बदले में पृथ्वीराज को मिली कई यातानए
 स्वयंवर से राजकुमारी के उठाने के बाद पृथ्वीराज दिल्ली के लिये रवाना हो गए। आगे जयचंद्र ने पृथ्वीराज से बदला लेने के उद्देश्य से मोहम्मद गौरी से मित्रता की और दिल्ली पर आक्रमण कर दिया। पृथ्वीराज ने मोहम्मद गौरी को 16 बार परास्त किया लेकिन पृथ्वीराज चौहान ने सहर्दयता का परिचय देते हुए मोहम्मद गौरी को हर बार जीवित छोड़ दिया। राजा जयचन्द ने गद्दारी करते हुए मोहम्मद गोरी को सैन्य मदद दी और इसी वजह से मोहम्मद गौरी की ताकत दोगुनी हो गयी तथा 17वी बार के युद्ध मे पृथ्वीराज चौहान मोहम्मद गोरी से द्वारा पराजित होने पर पृथ्वीराज चौहान को मोहम्मद गोरी के सैनिको द्वारा उन्‍हें बंदी बना लिया गया एवं उनकी आंखें गरम सलाखों से जला दी गईं। इसके साथ अलग-अलग तरह की यातनाए भी दी गई।
शब्दभेदी बाण से गोरी को उतारा मौत के घाट
 अंतत: मो.गोरी ने पृथ्वीराज को मारने का फैसला किया तभी महा-कवि चन्द्रवरदायी ने मोहम्मद गोरी तक पृथ्वीराज के एक कला के बारे में बताया। चन्द्रवरदाई जो कि एक कवि और खास दोस्त था पृथ्वीराज चौहान का। उन्होंने बताया कि चौहाण को शब्द भेदी बाण छोड़ने की काला मे महारत हासिल है। यह बात सुन मोहम्मद गोरी ने रोमांचित होकर इस कला के प्रदर्शन का आदेश दिया। प्रदर्शन के दौरान गोरी के "शाबास आरंभ करो" लफ्ज के उद्घोष के साथ ही भरी महफिल में चन्द्रवरदाई ने एक दोहे द्वारा पृथ्वीराज को मोहम्मद गोरी के बैठने के स्थान का संकेत दिया तभी अचूक शब्दभेदी बाण से पृथ्वीराज ने गोरी को मार गिराया। साथ ही दुश्मनों के हाथों मरने से बचने के लिए चन्द्रवरदाई और पृथ्वीराज ने एक-दूसरे का वध कर दिया। जब संयोगिता को इस बात की जानकारी मिली तो वह एक वीरांगना की भांति सती हो गई।

सत्ता के लालच में जसवंत सिंह ने चली थी चाल, प्रधान को बनाया जिंदा भूत


हम जब राजस्थान की बात करते हैं तो हमारे जेहन में कई चित्र उभर कर आते हैं, जैसे सुन्दर महल, ऊंट की शाही सवारी, वीरों की गाथाएं, रोमांटिक कहानियां और आकर्षक विरासत। राजस्थान का इतिहास जितना वैभवपूर्ण है, उतना ही गौरवशाली भी। एक तरफ जहां राजाओं ने अपनी रियासत के लिए जान की परवाह तक नहीं की और किले के साम्राज्य के लिए अपने आप को भी दांव पर लगाया वहीं कुछ राजा और महाराजा ऐसे भी हुए जिन्होंने सत्ता की लालच में अपनों को ही मौत के घाट उतारने की कोशिश की। 
राजस्थान के एक ऐसे महाराजा की कहानी जिसे रानी ने महल से भगाया तो दूसरे शासक के अधीन हो गया। फिर सत्ता के लालच में अपने ही प्रधान को बना डाला जिंदा भूत। 
जोधपुर के महाराजा जसवंत सिंह राजस्थान के इतिहास के प्रसिद्ध व्यक्ति रहे है। जब तक जसवंत सिंह जीवित थे, तब तक औरंगजेब मंदिर तोडऩा तो दूर जजिया कर (एक तरह का धार्मिक कर) भी नहीं ले पाए थे। एक बार जब वो युद्ध में घायल होकर राजस्थान लौटे तो उनकी रानी ने यह कहकर महल के दरवाजे बंद कर दिए कि युद्ध से हारकर जीवित आए राजा के लिए किले में कोई जगह नहीं होती। हालांकि वे औरंगजेब के अधीन थे लेकिन औरंगजेब उनसे हमेशा डरता था। 
भारतीय इतिहास का प्रसिद्ध वीर शिरोमणि दुर्गादास राठौड़ भी इन्ही महाराजा का सेनापति था। दुर्गादास के अलावा सरदारों में एक और जोरदार सामंत थे ठाकुर राजसिंह जी। वो जोधपुर में महाराजा जसवंत सिंह के प्रधान भी थे और मारवाड़ राज्य के सबसे ज्यादा प्रभावशाली सरदार थे। राज्य में उनके प्रभाव व उनकी मजबूत स्थिति होने के कारण महाराजा जसवंत सिंह हमेशा उनके प्रति सशंकित रहते थे। कारण था औरंगजेब की कूटनीति व कुटिल राजनीति। जसवंत सिंह राजसिंह को अपने रास्ते से हटाने के नई तरकीब सोचने लगे।
दरअसल, औरंगजेब महाराजा जसवंत सिंह से मन ही मन बहुत जलता था और महाराजा के खिलाफ हमेशा षड्यंत्र रचता रहता था। अत: महाराजा को लगता था कि कहीं औरंगजेब ठाकुर राजसिंह जी को कभी अपनी कूटनीति का हिस्सा ना बना लें। इसलिए जसवंत सिंह जी ठाकुर राजसिंह जी को मरवाना चाहते थे।
राजा का हर आदेश मानना होता था चाहे वो जहर पीने को ही क्यों न कहे, जसवंत सिंह ने भी यही चाल चली
जब जसवंत सिंह को कोई उपाय नहीं सुझा तो उन्होंने ठाकुर राजसिंह को जहर दे कर मरवाना चाहा। उस जमाने में हुक्म के साथ किसी को भी जहर का प्याला भेज उसे पीने हेतु बाध्य करने का रिवाज चलन में था। लेकिन राजसिंह जी जैसे प्रभावशाली व वीर के साथ ऐसा करना महाराजा जसवंतसिंह जी के लिए बहुत कठिन था। एक दिन पता चला कि महाराजा जसवंतसिंह पेट दर्द को लेकर बहुत तड़प रहे हैं। कई वैद्यों ने उनका इलाज किया पर कोई कारगर साबित नहीं हुआ। महाराजा की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। पुरे शहर में महाराजा की बीमारी के चर्चे शुरू हो गए।

भूत भगाने को होने लगे जतन, बुलाए गए बड़े-बड़े तांत्रिक
कोई कहे काबुल के थाने पर रात को गस्त करते हुए महाराजा का सामना भूतों से हुआ था और तब से भूत उनके पीछे पड़े हैं। पूरे शहर में जितने लोग, उतनी बातें। सारे शहर में भय छा गया। उधर महाराजा का इलाज करने के लिए वैध तरह-तरह की जड़ी बूटियां घोटने में लगे। कोई मन्त्र बोलने में लगा था तो कोई झाड़ फूंक करने में व्यस्त थे। प्रजा मंदिरों में बैठ अपने राजा के लिए भगवान से दुवाएं मांगने में लगे थे। ब्राह्मण राजा की सलामती के लिए यज्ञ करने लगे थे। लेकिन, ये सभी कोशिश बेकार दिख रही थीं। उधर महाराजा दर्द के मारे ऐसे तड़प रहे थे जैसे कबूतर फडफड़ा रहा हो। सभी लोग दुखी थे।
प्रेत का साया बताकर फंसाया अपने चाल में
आखिर में खबर आई कि एक बहुत बड़े बाबा आए हैं। उन्होंने महाराजा की बीमारी की जांच कर कहा- "महाराजा के पीछे बहुत शक्तिशाली प्रेत लगा है। वह बिना बलि लिए नहीं जायेगा। महाराजा को ठीक करना है तो किसी दूसरे की बलि देनी होगी। मैं मंत्र बोलकर जो पानी राजा के माथे से उतारूंगा उस पानी में राजाजी का भूत बाहर आ जाएगा और वह उस पानी को पीने वाले पर चला जाएगा।" इतना सुनते ही वहां उपस्थित पचासों हाथ खड़े हो गए- "महाराजा की प्राण रक्षा के लिए हम अपनी बलि देंगे। आप मंत्र बोल पानी उतारिये उसे हम पियेंगे।"
बाबा हंसते हुए बोले- "आम लोगों से काम नहीं चलेगा। महाराजा के बदले किसी महाराजा सरीखे व्यक्ति की बलि देनी होगी। शेर की जगह शेर ही चाहिए। छोटी-मोटी बलि से ये प्रेत संतुष्ट होने वाला नहीं।"
"इस राज्य में महाराजा सरीखे तो ठाकुर राजसिंह जी ही है।" सोचती हुई भीड़ में से एक आदमी ने कहा और सैकडों आंखें राजसिंह जी की और ताकने लगी। इस समय मना करना कायरता और हरामखोरी का पक्का प्रमाण था, सो राजसिंह जी उठे और बोले- "हाजिर हूं! बाबा जी महाराज आप अपने मंत्र बोलकर अपना टोटका पूरा कीजिये।" बाबा ने पानी भरा एक प्याला लेकर मंत्र बुदबुदाते हुए उस प्याले को महाराजा के शरीर पर घुमाया और प्याला ठाकुर राजसिंह जी के हाथ में थमा दिया।
राजसिंह खुशी खुशी पी गए जहर का प्याला
महाराजा का अभिवादन कर ठाकुर राजसिंह बोले- "मैं जानता हूं इसमें क्या है! आपको इतना बड़ा नाटक रचने की क्या जरुरत थी? ये प्याला आप वैसे ही भेज देते, मैं ख़ुशी ख़ुशी पी जाता।"
अपनी प्रधानगी का पट्टा महाराजा की ओर फेंक कर जहर का वह प्याला एक घूंट में पीते हुए राजसिंह जी ने बोलना जारी रखा- "ये प्रधानगी आपकी नजर है। आगे से मेरे खानदान में कोई आपका प्रधान नहीं बनेगा। मैंने तन मन से आपकी चाकरी की और उसका फल मुझे ये मिला।" यह कहते कहते जहर के कारण राजसिंह जी की आंखें फिरने लगी वे जमीन पर गिर गए।
जयसिंह के भूत का भय पूरे शहर में फैल गया
राजसिंह को तुरंत उनकी हवेली लाया गया। सारे शहर में बात आग की तरह फैल गयी- "आसोप ठाकुर साहब राजसिंह जी का प्रेत की बली चढ़ गए और राजाजी (जसवंत सिंह) उठ बैठे।" उसके बाद राजसिंह जी की प्रेत योनी में जाकर भूत बनने की बातें पूरे शहर में फैल गयी। जितने लोग उतनी कहानियां। कोई उनके द्वारा परचा देने की कहानी सुनाता, कोई हवेली में अब भी उनकी आवाज आने की कहानी कहता, कोई उनके द्वारा हवेली में हुक्का गड्गुड़ाने की आवाज सुनने के बारे में बाते बताता। इस तरह यह भय पूरे शहर में फैल गया। लोगों का रात में सोना मुश्किल हो गया। 
जहर पीने के बाद भी सात साल तक जिन्दा रहे जयसिंह जी
कुछ लोगों को तो राजसिंह का प्रेत हवेली खिड़कियों से इधर उधर घूमता भी नजर आया, किसी को उनका प्रेत डराए तो किसी को बख्शीस भी देता था। जितने लोग उतनी बातें। लेकिन यहां बात कुछ और ही थी। दरअसल, ठाकुर राजसिंह जी मरे नहीं थे वे जहर को पचा गए। जहर पीने के बाद उन्हें आसोप हवेली के एक महल में महाराजा जसवंत सिंह ने नजर बंद करवा दिया था। इस घटना के बाद वे सात वर्ष तक जिन्दा रहे। इसीलिए कभी हवेली में वे लोगो को हुक्का गुडगुडाते नजर आ जाते तो कभी महल से उनके खंखारे सुनाई दे जाते। 
आज भी लोगों को भूतों आहटें सुनाई देती हैं
कभी कभी महल की उपरी मंजिल में घूमते हुए वे लोगों को किसी खिड़की से नजर आ जाते और उनको देखने वाले लोग डर के मारे उनसे मन्नते मांगते, चढ़ावा चढ़ाते। इस तरह महाराजा जसवंत सिंह जी ने ऐसा नाटक रचा कि ठाकुर राजसिंह जी को जिन्दा रहते ही भूत बना दिया। महाराजा ने लोगों के मन ऐसा विश्वास पैदा कर दिया कि अभी तक आसोप हवेली के पड़ोसी लोग राजसिंह जी के प्रेत को देखने की बाते यदा कदा करते रहते है।

इस किले के कमरे में लगे शीशे से रानी की छवि को देखता था सुल्तान


पूरी दुनिया को अपनी ओर आकर्षित करने वाला राजस्थान खुद में कई रोचक तथ्य छुपाए हुए है। यहां पर बने किलों का इतिहास हजारों साल पुराना है। माना जाता है कि महाभारत के पात्र भीम ने यहां करीब 5000 वर्ष पूर्व एक किले का निर्माण करवाया था। उसका नाम था 'चित्तौड़गढ़ का किला'। चित्तौड़गढ़ का किला भारत के सभी किलों में सबसे बड़ा माना जाता है। राजस्थान के माटी के लाल महाराणा प्रताप ने दिल्ली के बादशाह अकबर के साथ महीनों तक इस किले में युद्ध लड़ा। अंतत: महाराणा प्रताप को वहां की जनता के लिए चितौड़गढ़ छोड़कर वर्षों तक जंगलों व पहाड़ों में विस्थापित जीवन जीना पड़ा। 
इस किले में कई सुंदर मंदिरों के साथ-साथ रानी पद्मिनी और महाराणा कुम्भ के शानदार महल हैं। चित्तौड़गढ़ किला राजपूत शौर्य के इतिहास में गौरवपूर्ण स्थान रखता है। यह किला 7वीं से 16वीं शताब्दी तक सत्ता का एक महत्वपूर्ण केंद्र हुआ करता था। लगभग 700 एकड़ के क्षेत्र में फैला यह किला 500 फुट ऊंची पहाड़ी पर खड़ा है। यह माना जाता है कि 7वीं शताब्दी में मोरी राजवंश के चित्रांगद मोरी द्वारा इसका निर्माण करवाया गया था। इस दुर्ग की विशालता और ऊंचाई को देखते हुए कहा जाता है कि ’चित्तौड़ का दुर्ग पूरा देखने के लिए पत्थर के पांव चाहिएं।’  इस दुर्ग का विशेष आकर्षण यहां स्थित सात विशाल दरवाजे हैं। 
किले में कई दर्शनीय स्थल हैं। उनमें से एक है रानी पद्मिनी का महल। यह महल रानी पद्मिनी के साहस और शान की कहानी बताता है। इसकी वास्तुकला अदभुत है। यहां दीवारों पर किए गए चित्र कला का प्रदर्शन मन को मोह लेने वाला है। इस महल में एक कमरा ऐसा भी है जिसमें बड़े-बड़े दर्पण (शीशे) लगे हुए हैं। एक विशाल दर्पण इस तरह से लगा है कि यहां से झील के मध्य बने जनाना महल की सीढियों पर खड़े किसी भी व्यक्ति का स्पष्ट छवी (प्रतिबिंब) दर्पण में नजर आता है।
एक छोटा महल पानी के बीच में बना
चौगान के निकट ही एक झील के किनारे रावल रत्नसिंह की रानी पद्मिनी के महल बने हुए हैं। पद्मिनी महल सुंदर और बहादुर रानी पद्मिनी का घर था। एक छोटा महल पानी के बीच में बना है, जो जनाना महल कहलाता है व किनारे के महल मरदाने महल कहलाते हैं। मरदाना महल मे एक कमरे में एक विशाल दर्पण इस तरह से लगा है कि यहां से झील के मध्य बने जनाना महल की सीढियों पर खड़े किसी भी व्यक्ति का स्पष्ट प्रतिबिंब दपंण में नजर आता है, परंतु पीछे मुड़कर देखने पर सीढ़ी पर खड़े व्यक्ति को नहीं देखा जा सकता। माना जाता है कि अलाउद्दीन खिलजी ने यहीं खड़े होकर रानी पद्मिनी की छवी देखा करता था। दरअसल, रानी के शाश्वत सौंदर्य से सुलतान अभिभूत हो गया और उसकी रानी को पाने की इच्छा के कारण अंततः युद्ध हुआ। पास ही भगवान शिव को समर्पित नीलकंठ महादेव मंदिर है।
गुस्से में एक वीर ने मारी लात और बन गया एक बड़ा तालाब
माना जाता है कि पांडव के दूसरे भाई भीम जब संपत्ति की खोज में निकले तो रास्ते में उनकी एक योगी से मुलाकात हुई। उस योगी से भीम ने पारस पत्थर मांगा। इसके बदले में योगी ने एक ऐसे किले की मांग की जिसका निर्माण रातों-रात हुआ हो।

भीम ने अपने बल और भाइयों की सहायता से किले का काम लगभग समाप्त कर ही दिया था, सिर्फ थोड़ा-सा कार्य शेष था। इतना देख योगी के मन में कपट उत्पन्न हो गया। उसने जल्दी सवेरा करने के लिए यति से मुर्गे की आवाज में बांग देने को कहा। जिससे भीम सवेरा समझकर निर्माण कार्य बंद कर दे और उसे पारस पत्थर नहीं देना पड़े। मुर्गे की बांग सुनते ही भीम को क्रोध आया और उसने क्रोध से अपनी एक लात जमीन पर दे मारी। जहां भीम ने लात मारी वहां एक बड़ा सा जलाशय बन गया। आज इसे 'भीमलात' के नाम से जाना जाता है।
महावीर स्वामी का मंदिर में कोई प्रतिमा नहीं है

जैन कीर्ति स्तम्भ के निकट ही महावीर स्वामी का मन्दिर है। इस मंदिर का जीर्णोद्धार महाराणा कुम्भा के राज्यकाल में ओसवाल महाजन गुणराज ने करवाया थ। हाल ही में जीर्ण-शीर्ण अवस्था प्राप्त इस मंदिर का जीर्णोद्धार पुरातत्व विभाग ने किया है। इस मंदिर में कोई प्रतिमा नहीं है। आगे महादेव का मंदिर आता है। मंदिर में शिवलिंग है तथा उसके पीछे दीवार पर महादेव की विशाल त्रिमूर्ति है, जो देखने में समीधेश्वर मंदिर की प्रतिमा से मिलती है। कहा जाता है कि महादेव की इस विशाल मूर्ति को पाण्डव भीम अपने बाजूओं में बांधे रखते थे। 
विजय स्तम्भ

यह स्तम्भ वास्तुकला की दृष्टि से अपने आप अनुठा है। इसके प्रत्येक मंजिल पर झरोखा होने से इसके भीतरी भाग में भी प्रकाश रहता है। इसमें भगवानों के विभिन्न रुपों और रामायण तथा महाभारत के पात्रों की सैकड़ों मूर्तियां खुदी हैं। कीर्तिस्तम्भ के ऊपरी मंजिल से दुर्ग एवं निकटवर्ती क्षेत्रों का विहंगम दृश्य दिखता है। बिजली गिरने से एक बार इसके ऊपर की छत्री टूट गई थी, जिसकी महाराणा स्वरुप सिंह ने मरम्मत करायी।
मिट्टी से बनी चट्टान

किले के अंत में दीवार के 150 फीट नीचे एक छोटी-सी पहाड़ी (मिट्टी का टीला) दिखाई पड़ती है। यह टीला कृत्रिम है और कहा जाता है कि अकबर ने जब चित्तौड़ पर आक्रमण किया था, तब अधिक उपयुक्त मोर्चा इसी स्थान को माना और उस मगरी पर मिट्टी डलवा कर उसे ऊंचा उठवाया, ताकि किले पर आक्रमण कर सके। प्रत्येक मजदूर को प्रत्येक मिट्टी की टोकरी हेतु एक-एक मोहर दी गई थी। 
पाडन पोल
इस किले में नदी के जल प्रवाह के लिए दस मेहरावें बनी हैं, जिसमें नौ के ऊपर के सिरे नुकीले हैं। यह दुर्ग का प्रथम प्रवेश द्वार है। कहा जाता है कि एक बार भीषण युद्ध में खून की नदी बह निकलने से एक पाड़ा (भैंसा) बहता-बहता यहां तक आ गया था। इसी कारण इस द्वार को पाडन पोल कहा जाता है।
सात दरवाजे
पाडन पोल
यह दुर्ग का प्रथम प्रवेश द्वार है। कहा जाता है कि एक बार भीषण युद्ध में खून की नदी बह निकलने से एक पाड़ा (भैंसा) बहता-बहता यहाँ तक आ गया था। इसी कारण इस द्वार को पाडन पोल कहा जाता है।
भैरव पोल (भैरों पोल)
पाडन पोल से थोड़ा उत्तर की तरफ चलने पर दूसरा दरवाजा आता है, जिसे भैरव पोल के रुप में जाना जाता है। 
 हनुमान पोल
दुर्ग के तृतीय प्रवेश द्वार को हनुमान पोल कहा जाता है। क्योंकि पास ही हनुमान जी का मंदिर है। हनुमान जी की प्रतिमा चमत्कारिक एवं दर्शनीय हैं।
गणेश पोल
हनुमान पोल से कुछ आगे बढ़कर दक्षिण की ओर मुड़ने पर गणेश पोल आता है, जो दुर्ग का चौथा द्वार है। इसके पास ही गणपति जी का मंदिर है।
 जोड़ला पोल
यह दुर्ग का पांचवां द्वार है और छठे द्वार के बिल्कुल पास होने के कारण इसे जोड़ला पोल कहा जाता है।
 लक्ष्मण पोल
दुर्ग के इस छठे द्वार के पास ही एक छोटा सा लक्ष्मण जी का मंदिर है जिसके कारण इसका नाम लक्ष्मण पोल है।
 राम पोल
लक्ष्मण पोल से आगे बढ़ने पर एक पश्चिमाभिमुख प्रवेश द्वार मिलता है, जिससे होकर किले के अन्दर प्रवेश कर सकते हैं। यह दरवाजा किला का सातवां तथा अन्तिम प्रवेश द्वार है। इस दरवाजे के बाद चढ़ाई समाप्त हो जाती है।
 00 एकड़ में फैला है यह किला
 चित्तौड़गढ़ का किला भारत के सभी किलों में सबसे बड़ा माना जाता है। यह 700 एकड़ में फैला हुआ है। यह किला 3 मील लंबा और आधे मील तक चौड़ा है। किले के पहाड़ी का घेरा करीब 8 मील का है। इसके चारो तरफ खड़े चट्टान और पहाड़ थे। साथ ही साथ दुर्ग में प्रवेश करने के लिए लगातार सात दरवाजे कुछ अन्तराल पर बनाए गये थे। इन सब कारणों से किले में प्रवेश कर पाना शत्रुओं के लिए बेहद मुश्किल था। 
 प्रवेश द्वार   
इस किले के सात प्रवेश द्वार हैं। राम पोल, सूरज पोल, भैरव पोल, हनुमान पोल, गणेश पोल, जोली पोल, और लक्ष्मण पोल। सभी की अलग-अलग विशेषताएं हैं।

आक्रमण 
 किले के लंबे इतिहास के दौरान इस पर तीन बार आक्रमण किए गए। पहला आक्रमण सन 1303 में अलाउद्दीन खलिजी द्वारा, दूसरा सन 1535 में गुजरात के बहादुरशाह द्वारा तथा तीसरा सन 1567-68 में मुगल बादशाह अकबर द्वारा किया गया था। इसकी प्रसिद्ध स्मारकीय विरासत की विशेषता इसके विशिष्ट मजबूत किले, प्रवेश द्वार, बुर्ज, महल, मंदिर, दुर्ग तथा जलाशय स्वयं बताते हैं जो राजपूत वास्तुकला के उत्कृष्ट नमूने हैं।
सूर्यकुण्ड (सूरज कुण्ड)
कालिका माता के मंदिर के उत्तर-पूर्व में एक विशाल कुण्ड बना है, जिसे सूरजकुण्ड कहा जाता है। इस कुण्ड के बारे में मान्यता यह है कि महाराणा को सूर्य भगवान का आशीर्वाद प्राप्त था तथा कुण्ड से प्रतिदिन प्रातः सफेद घोड़े पर सवार एक सशस्र योद्धा निकलता था, जो महाराणा को युद्ध में सहायता देता था।