गुरुवार, 15 मई 2014

राजस्थान में है सबसे शक्तिशाली तोप, जहां इसका गोला गिरा वहां आज तालाब है

जयपुर. पुराने जमाने में खुद को सुरक्षित रखने का सबसे अच्छा तरीका होता था कि किसी मजबूत किले के अंदर रहा जाए। राजा-महाराजा लोग किले के अंदर महल बनवाते थे, जो दुश्मन के हमले से उन्हें बचाते थे। बारूद और तोप की खोज के बाद मजबूत किले भी सुरक्षित नहीं रहे। हमलावर सेना तोप के गोलों से किसी भी किले को ढहा देती थी। ऐसे में शासकों के बीच सबसे ताकतवर तोप पाने की होड़ लगी रहती थी। 

सबसे ताकतवर और भारी तोप

राजस्थान के जयगढ़ के किले में रखे गए तोप की गिनती पुराने समय के सबसे ताकतवर और भारी तोपों में की जाती है। 1720 ई. में महाराजा सवाई जय सिंह ने इसे रायगढ़ के किले में लगवाया था। 50 टन वजनी इस तोप के बैरल की लंबाई 20 फीट है और बैरल का व्यास 11 इंच है।

35 किलोमीटर तक मार करने वाले इस तोप को एक बार फायर करने के लिए 100 किलो गन पाउडर की जरूरत होती थी। अधिक वजन के कारण इसे किले से बाहर नहीं ले जाया गया और न ही कभी युद्ध में इसका इस्तेमाल किया गया था। इस तोप को सिर्फ एक बार टेस्ट के लिए चलाया गया था। ऐसा कहा जाता है कि किले से दक्षिण की ओर 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित तालाब उसी टेस्ट फायर के गोले के गिरने से बना था।
दुनिया की सबसे लंबी बंदूक

बंदूक के आविष्कार के साथ ही गोली को ज्यादा से ज्यादा दूरी तक सटीक मार करने लायक बनाना चुनौती थी। शुरुआत में लोगों ने जाना कि गन के बैरल की लंबाई अधिक होने पर गोली ज्यादा दूरी तक सटीक मार करती है। इसके बाद लंबी बैरल वाली बंदूकें सामने आईं। जयगढ़ के किले में रखी गई बंदूक उसी समय की है। इस बंदूक को दुनिया की सबसे लंबी बंदूकों में गिना जाता है।
 
ऊंट की पीठ पर बांधी जाने वाली तोप

किले की रक्षा में तैनात ताकतवर और भारी तोपों का तभी इस्तेमाल होता था, जब कोई दुश्मन हमला करे। दूसरे राज्य पर हमला करने  के लिए इन भारी-भरकम तोपों को युद्ध भूमि तक ले जाना काफी कठिन था। इसी दौर में छोटे और हल्की तोपें बनाई गईं। इन तोपों को हाथी या ऊंट की पीठ पर बांधा जा सकता था। जयगढ़ के किले में रखी गई इस छोटी तोप को भी ऊंट की पीठ पर बांध कर चलाया जाता था। ईसा पूर्व से ही चीन के लोगों को बारूद की जानकारी थी। प्राचीन काल में बारूद का इस्तेमाल किसी जगह पर तेजी से आग फैलाने के लिए किया जाता था। 13वीं शताब्दी में लोगों को यह पता चला की बारूद के इस्तेमाल से किसी भारी चीज को दूर तक फेंका जा सकता है। इसके बाद दो तरह की तोपें बनाई गई। पहली भारी और लंबी नालवाली और दूसरी छोटी नालवाली। 15वीं शताब्दी में हाथ में लेकर चलाने वाली तोपें भी बनाई गई थी, बात में बंदूकों ने इनका स्थान ले लिया।
 
पहले तोप से फेंके जाते थे पत्थर
 
शुरुआत में तोपों का इस्तेमाल पत्थरों को फेंकने के लिए किया जाता था। ये तोपें पहले तांबे और कांसे की बनीं फिर लोहे की बनने लगीं। 15वीं शताब्दी में तोपें 30 इंच परिधि की होती थीं और 1,200 से 1,500 पाउंड भार के पत्थर के गोले चलाती थीं। लोहे की तोपें आने के बाद लोगों ने देखा की पत्थर की जगह लोहे के गोले से ज्यादा नुकसान पहुंचाया जा सकता है। इसके बाद तोपों में लोहे के गोलों का इस्तेमाल किया जाने लगा और बैरल का व्यास कम हो गया।

सोमवार, 5 मई 2014

तस्वीर देख दुश्मन की बेटी का हुआ दीवाना, भरी महफिल से किया अपहरण

राजस्थान की मिट्टी सदैव से ही महापुरुषों और वीरों की भूमि रही है। साथ ही यहां वीरों की वसुंधरा पर कई प्रेम कहानियां भी जो आज भी बहुत प्रचलित हैं। कभी कभी एक दासी के रूप के आगे नतमस्तक हो गया राज तो कभी राजा ने नाराज रानी ऐसी रूठी कि उसका नाम ही रूठी रानी पड़ गया।
यह एक ऐसे प्रेमी की कहानी जिसने अपनी प्रेमिका का अपहरण उसके पिता के सामने उस वक्त कर लिया जब उसका स्वयंवर चल रहा था। 
 दिल्ली की राजगद्दी पर बैठने वाले अंतिम हिन्दू शासक और भारत के महान वीर योद्धाओं में शुमार पृथ्वीराज चौहान का नाम कौन नहीं जानता। एक ऐसा वीर योद्धा जिसने अपने बचपन में ही शेर का जबड़ा फाड़ डाला था और जिसने अपनी आंखें खो देने के बावजूद भी मोहम्मद गौरी को मृत्यु का रास्ता दिखा दिया था। 
 ये सभी जानते हैं कि पृथ्वीराज चौहान एक वीर योद्धा थे लेकिन ये बहुत कम ही लोगों को पता है कि वो एक प्रेमी भी थे। वो कन्नौज के महाराज जय चन्द्र की पुत्री संयोगिता से प्रेम करते थे। दोनों में प्रेम इतना था कि राजकुमारी को पाने के लिए पृथ्वी स्वयंवर के बीच से उन्हें उठा लाए थे। इस प्रेम कहानी की शुरुआत बेहद रोचक है, आइये हम आपको बताते हैं कि आखिर कैसे शुरू हुई संयोगिता और पृथ्वीराज चौहान की प्रेम कहानी।
दिल्ली की सत्ता संभालने के साथ हुआ था चौहाण को संयोगिता से प्यार
 बात उन दिनों की है जब पृथ्वीराज चौहाण अपने नाना और दिल्ली के सम्राट महाराजा अनंगपाल की मृत्यु के बाद दिल्ली की राज गद्दी पर बैठे। गौरतलब है कि महाराजा अनंगपाल को कोई पुत्र नहीं था इसलिए उन्होंने अपने दामाद अजमेर के महाराज और पृथ्वीराज चौहाण के पिता सोमेश्वर सिंह चौहाण से आग्रह किया कि वे पृथ्वीराज को दिल्ली का युवराज घोषित करने की अनुमति प्रदान करें। महाराजा सोमेश्वर सिंह ने सहमति जता दी और पृथ्वीराज को दिल्ली का युवराज घोषित किया गया, काफी राजनीतिक संघर्षों के बाद पृथ्वीराज दिल्ली के सम्राट बने। दिल्ली की सत्ता संभालने के साथ ही पृथ्वीराज को कन्नौज के महाराज जयचंद की पुत्री संयोगिता भा गई।
सुंदरता के बखान को सुन राजकुमारी हो गईं थी देखने के लिए लालायित
उस समय कन्नौज में महाराज जयचंद्र का राज था। उनकी एक खूबसूरत राजकुमारी थी जिसका नाम संयोगिता था। जयचंद्र पृथ्वीराज की यश वृद्धि से ईर्ष्या का भाव रखा करते थे। एक दिन कन्नौज में एक चित्रकार पन्नाराय आया जिसके पास दुनिया के महारथियों के चित्र थे और उन्हीं में एक चित्र था दिल्ली के युवा सम्राट पृथ्वीराज चौहान का। जब कन्नौज की लड़कियों ने पृथ्वीराज के चित्र को देखा तो वे देखते ही रह गईं। सभी युवतियां उनकी सुन्दरता का बखान करते नहीं थक रहीं थीं। पृथ्वीराज के तारीफ की ये बातें संयोगिता के कानों तक पहुंची और वो पृथ्वीराज के उस चित्र को देखने के लिए लालायित हो उठीं।
 पृथ्वीराज के मन में राजकुमारी की मूर्ति देख प्रेम उमड़ पड़ा
 संयोगिता अपनी सहेलियों के साथ उस चित्रकार के पास पहुंची और चित्र दिखाने को कहा। चित्र देख पहली ही नजर में संयोगिता ने अपना सर्वस्व पृथ्वीराज को दे दिया, लेकिन दोनों का मिलन इतना सहज न था। महाराज जयचंद और पृथ्वीराज चौहान में कट्टर दुश्मनी थी। इधर चित्रकार ने दिल्ली पहुंचकर पृथ्वीराज से भेट की और राजकुमारी संयोगिता का एक चित्र बनाकर उन्हें दिखाया जिसे देखकर पृथ्वीराज के मन में भी संयोगिता के लिए प्रेम उमड़ पड़ा। उन्हीं दिनों महाराजा जयचंद्र ने संयोगिता के लिए एक स्वयंवर का आयोजन किया। इसमें विभिन्न राज्यों के राजकुमारों और महाराजाओं को आमंत्रित किया लेकिन ईर्ष्या वश पृथ्वीराज को इस स्वंयवर के लिए आमंत्रण नहीं भेजा। 
 राजकुमारी ने वरमाला मूर्ति को पहनाई और वो वास्तव में पृथ्वीराज के गले में पड़ी
 राजकुमारी के पिता ने चौहाण का अपमान करने के उद्देश्य से स्वयंवर में उनकी एक मूर्ति को द्वारपाल की जगह खड़ा कर दिया। राजकुमारी संयोगिता जब वर माला लिए सभा में आईं तो उन्हें अपने पसंद का वर (पृथ्वीराज चौहाण) कहीं नजर नहीं आए। इसी समय उनकी नजर द्वारपाल की जगह रखी पृथ्वीराज की मूर्ति पर पड़ी और उन्होंने आगे बढ़कर वरमाला उस मूर्ति के गले में डाल दी। वास्तव में जिस समय राजकुमारी ने मूर्ति में वरमाला डालना चाहा ठीक उसी समय पृथ्वीराज स्वयं आकर खड़े हो गए और माला उनके गले में पड़ गया। संयोगिता द्वारा पृथ्वीराज के गले में वरमाला डालते देख पिता जयचंद्र आग बबूला हो गए। वह तलवार लेकर संयोगिता को मारने के लिए आगे आए, लेकिन इससे पहले की वो संयोगिता तक पहुंचे पृथ्वीराज संयोगिता को अपने साथ लेकर वहां से निकल पड़े।
प्यार के बदले में पृथ्वीराज को मिली कई यातानए
 स्वयंवर से राजकुमारी के उठाने के बाद पृथ्वीराज दिल्ली के लिये रवाना हो गए। आगे जयचंद्र ने पृथ्वीराज से बदला लेने के उद्देश्य से मोहम्मद गौरी से मित्रता की और दिल्ली पर आक्रमण कर दिया। पृथ्वीराज ने मोहम्मद गौरी को 16 बार परास्त किया लेकिन पृथ्वीराज चौहान ने सहर्दयता का परिचय देते हुए मोहम्मद गौरी को हर बार जीवित छोड़ दिया। राजा जयचन्द ने गद्दारी करते हुए मोहम्मद गोरी को सैन्य मदद दी और इसी वजह से मोहम्मद गौरी की ताकत दोगुनी हो गयी तथा 17वी बार के युद्ध मे पृथ्वीराज चौहान मोहम्मद गोरी से द्वारा पराजित होने पर पृथ्वीराज चौहान को मोहम्मद गोरी के सैनिको द्वारा उन्‍हें बंदी बना लिया गया एवं उनकी आंखें गरम सलाखों से जला दी गईं। इसके साथ अलग-अलग तरह की यातनाए भी दी गई।
शब्दभेदी बाण से गोरी को उतारा मौत के घाट
 अंतत: मो.गोरी ने पृथ्वीराज को मारने का फैसला किया तभी महा-कवि चन्द्रवरदायी ने मोहम्मद गोरी तक पृथ्वीराज के एक कला के बारे में बताया। चन्द्रवरदाई जो कि एक कवि और खास दोस्त था पृथ्वीराज चौहान का। उन्होंने बताया कि चौहाण को शब्द भेदी बाण छोड़ने की काला मे महारत हासिल है। यह बात सुन मोहम्मद गोरी ने रोमांचित होकर इस कला के प्रदर्शन का आदेश दिया। प्रदर्शन के दौरान गोरी के "शाबास आरंभ करो" लफ्ज के उद्घोष के साथ ही भरी महफिल में चन्द्रवरदाई ने एक दोहे द्वारा पृथ्वीराज को मोहम्मद गोरी के बैठने के स्थान का संकेत दिया तभी अचूक शब्दभेदी बाण से पृथ्वीराज ने गोरी को मार गिराया। साथ ही दुश्मनों के हाथों मरने से बचने के लिए चन्द्रवरदाई और पृथ्वीराज ने एक-दूसरे का वध कर दिया। जब संयोगिता को इस बात की जानकारी मिली तो वह एक वीरांगना की भांति सती हो गई।

सत्ता के लालच में जसवंत सिंह ने चली थी चाल, प्रधान को बनाया जिंदा भूत


हम जब राजस्थान की बात करते हैं तो हमारे जेहन में कई चित्र उभर कर आते हैं, जैसे सुन्दर महल, ऊंट की शाही सवारी, वीरों की गाथाएं, रोमांटिक कहानियां और आकर्षक विरासत। राजस्थान का इतिहास जितना वैभवपूर्ण है, उतना ही गौरवशाली भी। एक तरफ जहां राजाओं ने अपनी रियासत के लिए जान की परवाह तक नहीं की और किले के साम्राज्य के लिए अपने आप को भी दांव पर लगाया वहीं कुछ राजा और महाराजा ऐसे भी हुए जिन्होंने सत्ता की लालच में अपनों को ही मौत के घाट उतारने की कोशिश की। 
राजस्थान के एक ऐसे महाराजा की कहानी जिसे रानी ने महल से भगाया तो दूसरे शासक के अधीन हो गया। फिर सत्ता के लालच में अपने ही प्रधान को बना डाला जिंदा भूत। 
जोधपुर के महाराजा जसवंत सिंह राजस्थान के इतिहास के प्रसिद्ध व्यक्ति रहे है। जब तक जसवंत सिंह जीवित थे, तब तक औरंगजेब मंदिर तोडऩा तो दूर जजिया कर (एक तरह का धार्मिक कर) भी नहीं ले पाए थे। एक बार जब वो युद्ध में घायल होकर राजस्थान लौटे तो उनकी रानी ने यह कहकर महल के दरवाजे बंद कर दिए कि युद्ध से हारकर जीवित आए राजा के लिए किले में कोई जगह नहीं होती। हालांकि वे औरंगजेब के अधीन थे लेकिन औरंगजेब उनसे हमेशा डरता था। 
भारतीय इतिहास का प्रसिद्ध वीर शिरोमणि दुर्गादास राठौड़ भी इन्ही महाराजा का सेनापति था। दुर्गादास के अलावा सरदारों में एक और जोरदार सामंत थे ठाकुर राजसिंह जी। वो जोधपुर में महाराजा जसवंत सिंह के प्रधान भी थे और मारवाड़ राज्य के सबसे ज्यादा प्रभावशाली सरदार थे। राज्य में उनके प्रभाव व उनकी मजबूत स्थिति होने के कारण महाराजा जसवंत सिंह हमेशा उनके प्रति सशंकित रहते थे। कारण था औरंगजेब की कूटनीति व कुटिल राजनीति। जसवंत सिंह राजसिंह को अपने रास्ते से हटाने के नई तरकीब सोचने लगे।
दरअसल, औरंगजेब महाराजा जसवंत सिंह से मन ही मन बहुत जलता था और महाराजा के खिलाफ हमेशा षड्यंत्र रचता रहता था। अत: महाराजा को लगता था कि कहीं औरंगजेब ठाकुर राजसिंह जी को कभी अपनी कूटनीति का हिस्सा ना बना लें। इसलिए जसवंत सिंह जी ठाकुर राजसिंह जी को मरवाना चाहते थे।
राजा का हर आदेश मानना होता था चाहे वो जहर पीने को ही क्यों न कहे, जसवंत सिंह ने भी यही चाल चली
जब जसवंत सिंह को कोई उपाय नहीं सुझा तो उन्होंने ठाकुर राजसिंह को जहर दे कर मरवाना चाहा। उस जमाने में हुक्म के साथ किसी को भी जहर का प्याला भेज उसे पीने हेतु बाध्य करने का रिवाज चलन में था। लेकिन राजसिंह जी जैसे प्रभावशाली व वीर के साथ ऐसा करना महाराजा जसवंतसिंह जी के लिए बहुत कठिन था। एक दिन पता चला कि महाराजा जसवंतसिंह पेट दर्द को लेकर बहुत तड़प रहे हैं। कई वैद्यों ने उनका इलाज किया पर कोई कारगर साबित नहीं हुआ। महाराजा की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। पुरे शहर में महाराजा की बीमारी के चर्चे शुरू हो गए।

भूत भगाने को होने लगे जतन, बुलाए गए बड़े-बड़े तांत्रिक
कोई कहे काबुल के थाने पर रात को गस्त करते हुए महाराजा का सामना भूतों से हुआ था और तब से भूत उनके पीछे पड़े हैं। पूरे शहर में जितने लोग, उतनी बातें। सारे शहर में भय छा गया। उधर महाराजा का इलाज करने के लिए वैध तरह-तरह की जड़ी बूटियां घोटने में लगे। कोई मन्त्र बोलने में लगा था तो कोई झाड़ फूंक करने में व्यस्त थे। प्रजा मंदिरों में बैठ अपने राजा के लिए भगवान से दुवाएं मांगने में लगे थे। ब्राह्मण राजा की सलामती के लिए यज्ञ करने लगे थे। लेकिन, ये सभी कोशिश बेकार दिख रही थीं। उधर महाराजा दर्द के मारे ऐसे तड़प रहे थे जैसे कबूतर फडफड़ा रहा हो। सभी लोग दुखी थे।
प्रेत का साया बताकर फंसाया अपने चाल में
आखिर में खबर आई कि एक बहुत बड़े बाबा आए हैं। उन्होंने महाराजा की बीमारी की जांच कर कहा- "महाराजा के पीछे बहुत शक्तिशाली प्रेत लगा है। वह बिना बलि लिए नहीं जायेगा। महाराजा को ठीक करना है तो किसी दूसरे की बलि देनी होगी। मैं मंत्र बोलकर जो पानी राजा के माथे से उतारूंगा उस पानी में राजाजी का भूत बाहर आ जाएगा और वह उस पानी को पीने वाले पर चला जाएगा।" इतना सुनते ही वहां उपस्थित पचासों हाथ खड़े हो गए- "महाराजा की प्राण रक्षा के लिए हम अपनी बलि देंगे। आप मंत्र बोल पानी उतारिये उसे हम पियेंगे।"
बाबा हंसते हुए बोले- "आम लोगों से काम नहीं चलेगा। महाराजा के बदले किसी महाराजा सरीखे व्यक्ति की बलि देनी होगी। शेर की जगह शेर ही चाहिए। छोटी-मोटी बलि से ये प्रेत संतुष्ट होने वाला नहीं।"
"इस राज्य में महाराजा सरीखे तो ठाकुर राजसिंह जी ही है।" सोचती हुई भीड़ में से एक आदमी ने कहा और सैकडों आंखें राजसिंह जी की और ताकने लगी। इस समय मना करना कायरता और हरामखोरी का पक्का प्रमाण था, सो राजसिंह जी उठे और बोले- "हाजिर हूं! बाबा जी महाराज आप अपने मंत्र बोलकर अपना टोटका पूरा कीजिये।" बाबा ने पानी भरा एक प्याला लेकर मंत्र बुदबुदाते हुए उस प्याले को महाराजा के शरीर पर घुमाया और प्याला ठाकुर राजसिंह जी के हाथ में थमा दिया।
राजसिंह खुशी खुशी पी गए जहर का प्याला
महाराजा का अभिवादन कर ठाकुर राजसिंह बोले- "मैं जानता हूं इसमें क्या है! आपको इतना बड़ा नाटक रचने की क्या जरुरत थी? ये प्याला आप वैसे ही भेज देते, मैं ख़ुशी ख़ुशी पी जाता।"
अपनी प्रधानगी का पट्टा महाराजा की ओर फेंक कर जहर का वह प्याला एक घूंट में पीते हुए राजसिंह जी ने बोलना जारी रखा- "ये प्रधानगी आपकी नजर है। आगे से मेरे खानदान में कोई आपका प्रधान नहीं बनेगा। मैंने तन मन से आपकी चाकरी की और उसका फल मुझे ये मिला।" यह कहते कहते जहर के कारण राजसिंह जी की आंखें फिरने लगी वे जमीन पर गिर गए।
जयसिंह के भूत का भय पूरे शहर में फैल गया
राजसिंह को तुरंत उनकी हवेली लाया गया। सारे शहर में बात आग की तरह फैल गयी- "आसोप ठाकुर साहब राजसिंह जी का प्रेत की बली चढ़ गए और राजाजी (जसवंत सिंह) उठ बैठे।" उसके बाद राजसिंह जी की प्रेत योनी में जाकर भूत बनने की बातें पूरे शहर में फैल गयी। जितने लोग उतनी कहानियां। कोई उनके द्वारा परचा देने की कहानी सुनाता, कोई हवेली में अब भी उनकी आवाज आने की कहानी कहता, कोई उनके द्वारा हवेली में हुक्का गड्गुड़ाने की आवाज सुनने के बारे में बाते बताता। इस तरह यह भय पूरे शहर में फैल गया। लोगों का रात में सोना मुश्किल हो गया। 
जहर पीने के बाद भी सात साल तक जिन्दा रहे जयसिंह जी
कुछ लोगों को तो राजसिंह का प्रेत हवेली खिड़कियों से इधर उधर घूमता भी नजर आया, किसी को उनका प्रेत डराए तो किसी को बख्शीस भी देता था। जितने लोग उतनी बातें। लेकिन यहां बात कुछ और ही थी। दरअसल, ठाकुर राजसिंह जी मरे नहीं थे वे जहर को पचा गए। जहर पीने के बाद उन्हें आसोप हवेली के एक महल में महाराजा जसवंत सिंह ने नजर बंद करवा दिया था। इस घटना के बाद वे सात वर्ष तक जिन्दा रहे। इसीलिए कभी हवेली में वे लोगो को हुक्का गुडगुडाते नजर आ जाते तो कभी महल से उनके खंखारे सुनाई दे जाते। 
आज भी लोगों को भूतों आहटें सुनाई देती हैं
कभी कभी महल की उपरी मंजिल में घूमते हुए वे लोगों को किसी खिड़की से नजर आ जाते और उनको देखने वाले लोग डर के मारे उनसे मन्नते मांगते, चढ़ावा चढ़ाते। इस तरह महाराजा जसवंत सिंह जी ने ऐसा नाटक रचा कि ठाकुर राजसिंह जी को जिन्दा रहते ही भूत बना दिया। महाराजा ने लोगों के मन ऐसा विश्वास पैदा कर दिया कि अभी तक आसोप हवेली के पड़ोसी लोग राजसिंह जी के प्रेत को देखने की बाते यदा कदा करते रहते है।

इस किले के कमरे में लगे शीशे से रानी की छवि को देखता था सुल्तान


पूरी दुनिया को अपनी ओर आकर्षित करने वाला राजस्थान खुद में कई रोचक तथ्य छुपाए हुए है। यहां पर बने किलों का इतिहास हजारों साल पुराना है। माना जाता है कि महाभारत के पात्र भीम ने यहां करीब 5000 वर्ष पूर्व एक किले का निर्माण करवाया था। उसका नाम था 'चित्तौड़गढ़ का किला'। चित्तौड़गढ़ का किला भारत के सभी किलों में सबसे बड़ा माना जाता है। राजस्थान के माटी के लाल महाराणा प्रताप ने दिल्ली के बादशाह अकबर के साथ महीनों तक इस किले में युद्ध लड़ा। अंतत: महाराणा प्रताप को वहां की जनता के लिए चितौड़गढ़ छोड़कर वर्षों तक जंगलों व पहाड़ों में विस्थापित जीवन जीना पड़ा। 
इस किले में कई सुंदर मंदिरों के साथ-साथ रानी पद्मिनी और महाराणा कुम्भ के शानदार महल हैं। चित्तौड़गढ़ किला राजपूत शौर्य के इतिहास में गौरवपूर्ण स्थान रखता है। यह किला 7वीं से 16वीं शताब्दी तक सत्ता का एक महत्वपूर्ण केंद्र हुआ करता था। लगभग 700 एकड़ के क्षेत्र में फैला यह किला 500 फुट ऊंची पहाड़ी पर खड़ा है। यह माना जाता है कि 7वीं शताब्दी में मोरी राजवंश के चित्रांगद मोरी द्वारा इसका निर्माण करवाया गया था। इस दुर्ग की विशालता और ऊंचाई को देखते हुए कहा जाता है कि ’चित्तौड़ का दुर्ग पूरा देखने के लिए पत्थर के पांव चाहिएं।’  इस दुर्ग का विशेष आकर्षण यहां स्थित सात विशाल दरवाजे हैं। 
किले में कई दर्शनीय स्थल हैं। उनमें से एक है रानी पद्मिनी का महल। यह महल रानी पद्मिनी के साहस और शान की कहानी बताता है। इसकी वास्तुकला अदभुत है। यहां दीवारों पर किए गए चित्र कला का प्रदर्शन मन को मोह लेने वाला है। इस महल में एक कमरा ऐसा भी है जिसमें बड़े-बड़े दर्पण (शीशे) लगे हुए हैं। एक विशाल दर्पण इस तरह से लगा है कि यहां से झील के मध्य बने जनाना महल की सीढियों पर खड़े किसी भी व्यक्ति का स्पष्ट छवी (प्रतिबिंब) दर्पण में नजर आता है।
एक छोटा महल पानी के बीच में बना
चौगान के निकट ही एक झील के किनारे रावल रत्नसिंह की रानी पद्मिनी के महल बने हुए हैं। पद्मिनी महल सुंदर और बहादुर रानी पद्मिनी का घर था। एक छोटा महल पानी के बीच में बना है, जो जनाना महल कहलाता है व किनारे के महल मरदाने महल कहलाते हैं। मरदाना महल मे एक कमरे में एक विशाल दर्पण इस तरह से लगा है कि यहां से झील के मध्य बने जनाना महल की सीढियों पर खड़े किसी भी व्यक्ति का स्पष्ट प्रतिबिंब दपंण में नजर आता है, परंतु पीछे मुड़कर देखने पर सीढ़ी पर खड़े व्यक्ति को नहीं देखा जा सकता। माना जाता है कि अलाउद्दीन खिलजी ने यहीं खड़े होकर रानी पद्मिनी की छवी देखा करता था। दरअसल, रानी के शाश्वत सौंदर्य से सुलतान अभिभूत हो गया और उसकी रानी को पाने की इच्छा के कारण अंततः युद्ध हुआ। पास ही भगवान शिव को समर्पित नीलकंठ महादेव मंदिर है।
गुस्से में एक वीर ने मारी लात और बन गया एक बड़ा तालाब
माना जाता है कि पांडव के दूसरे भाई भीम जब संपत्ति की खोज में निकले तो रास्ते में उनकी एक योगी से मुलाकात हुई। उस योगी से भीम ने पारस पत्थर मांगा। इसके बदले में योगी ने एक ऐसे किले की मांग की जिसका निर्माण रातों-रात हुआ हो।

भीम ने अपने बल और भाइयों की सहायता से किले का काम लगभग समाप्त कर ही दिया था, सिर्फ थोड़ा-सा कार्य शेष था। इतना देख योगी के मन में कपट उत्पन्न हो गया। उसने जल्दी सवेरा करने के लिए यति से मुर्गे की आवाज में बांग देने को कहा। जिससे भीम सवेरा समझकर निर्माण कार्य बंद कर दे और उसे पारस पत्थर नहीं देना पड़े। मुर्गे की बांग सुनते ही भीम को क्रोध आया और उसने क्रोध से अपनी एक लात जमीन पर दे मारी। जहां भीम ने लात मारी वहां एक बड़ा सा जलाशय बन गया। आज इसे 'भीमलात' के नाम से जाना जाता है।
महावीर स्वामी का मंदिर में कोई प्रतिमा नहीं है

जैन कीर्ति स्तम्भ के निकट ही महावीर स्वामी का मन्दिर है। इस मंदिर का जीर्णोद्धार महाराणा कुम्भा के राज्यकाल में ओसवाल महाजन गुणराज ने करवाया थ। हाल ही में जीर्ण-शीर्ण अवस्था प्राप्त इस मंदिर का जीर्णोद्धार पुरातत्व विभाग ने किया है। इस मंदिर में कोई प्रतिमा नहीं है। आगे महादेव का मंदिर आता है। मंदिर में शिवलिंग है तथा उसके पीछे दीवार पर महादेव की विशाल त्रिमूर्ति है, जो देखने में समीधेश्वर मंदिर की प्रतिमा से मिलती है। कहा जाता है कि महादेव की इस विशाल मूर्ति को पाण्डव भीम अपने बाजूओं में बांधे रखते थे। 
विजय स्तम्भ

यह स्तम्भ वास्तुकला की दृष्टि से अपने आप अनुठा है। इसके प्रत्येक मंजिल पर झरोखा होने से इसके भीतरी भाग में भी प्रकाश रहता है। इसमें भगवानों के विभिन्न रुपों और रामायण तथा महाभारत के पात्रों की सैकड़ों मूर्तियां खुदी हैं। कीर्तिस्तम्भ के ऊपरी मंजिल से दुर्ग एवं निकटवर्ती क्षेत्रों का विहंगम दृश्य दिखता है। बिजली गिरने से एक बार इसके ऊपर की छत्री टूट गई थी, जिसकी महाराणा स्वरुप सिंह ने मरम्मत करायी।
मिट्टी से बनी चट्टान

किले के अंत में दीवार के 150 फीट नीचे एक छोटी-सी पहाड़ी (मिट्टी का टीला) दिखाई पड़ती है। यह टीला कृत्रिम है और कहा जाता है कि अकबर ने जब चित्तौड़ पर आक्रमण किया था, तब अधिक उपयुक्त मोर्चा इसी स्थान को माना और उस मगरी पर मिट्टी डलवा कर उसे ऊंचा उठवाया, ताकि किले पर आक्रमण कर सके। प्रत्येक मजदूर को प्रत्येक मिट्टी की टोकरी हेतु एक-एक मोहर दी गई थी। 
पाडन पोल
इस किले में नदी के जल प्रवाह के लिए दस मेहरावें बनी हैं, जिसमें नौ के ऊपर के सिरे नुकीले हैं। यह दुर्ग का प्रथम प्रवेश द्वार है। कहा जाता है कि एक बार भीषण युद्ध में खून की नदी बह निकलने से एक पाड़ा (भैंसा) बहता-बहता यहां तक आ गया था। इसी कारण इस द्वार को पाडन पोल कहा जाता है।
सात दरवाजे
पाडन पोल
यह दुर्ग का प्रथम प्रवेश द्वार है। कहा जाता है कि एक बार भीषण युद्ध में खून की नदी बह निकलने से एक पाड़ा (भैंसा) बहता-बहता यहाँ तक आ गया था। इसी कारण इस द्वार को पाडन पोल कहा जाता है।
भैरव पोल (भैरों पोल)
पाडन पोल से थोड़ा उत्तर की तरफ चलने पर दूसरा दरवाजा आता है, जिसे भैरव पोल के रुप में जाना जाता है। 
 हनुमान पोल
दुर्ग के तृतीय प्रवेश द्वार को हनुमान पोल कहा जाता है। क्योंकि पास ही हनुमान जी का मंदिर है। हनुमान जी की प्रतिमा चमत्कारिक एवं दर्शनीय हैं।
गणेश पोल
हनुमान पोल से कुछ आगे बढ़कर दक्षिण की ओर मुड़ने पर गणेश पोल आता है, जो दुर्ग का चौथा द्वार है। इसके पास ही गणपति जी का मंदिर है।
 जोड़ला पोल
यह दुर्ग का पांचवां द्वार है और छठे द्वार के बिल्कुल पास होने के कारण इसे जोड़ला पोल कहा जाता है।
 लक्ष्मण पोल
दुर्ग के इस छठे द्वार के पास ही एक छोटा सा लक्ष्मण जी का मंदिर है जिसके कारण इसका नाम लक्ष्मण पोल है।
 राम पोल
लक्ष्मण पोल से आगे बढ़ने पर एक पश्चिमाभिमुख प्रवेश द्वार मिलता है, जिससे होकर किले के अन्दर प्रवेश कर सकते हैं। यह दरवाजा किला का सातवां तथा अन्तिम प्रवेश द्वार है। इस दरवाजे के बाद चढ़ाई समाप्त हो जाती है।
 00 एकड़ में फैला है यह किला
 चित्तौड़गढ़ का किला भारत के सभी किलों में सबसे बड़ा माना जाता है। यह 700 एकड़ में फैला हुआ है। यह किला 3 मील लंबा और आधे मील तक चौड़ा है। किले के पहाड़ी का घेरा करीब 8 मील का है। इसके चारो तरफ खड़े चट्टान और पहाड़ थे। साथ ही साथ दुर्ग में प्रवेश करने के लिए लगातार सात दरवाजे कुछ अन्तराल पर बनाए गये थे। इन सब कारणों से किले में प्रवेश कर पाना शत्रुओं के लिए बेहद मुश्किल था। 
 प्रवेश द्वार   
इस किले के सात प्रवेश द्वार हैं। राम पोल, सूरज पोल, भैरव पोल, हनुमान पोल, गणेश पोल, जोली पोल, और लक्ष्मण पोल। सभी की अलग-अलग विशेषताएं हैं।

आक्रमण 
 किले के लंबे इतिहास के दौरान इस पर तीन बार आक्रमण किए गए। पहला आक्रमण सन 1303 में अलाउद्दीन खलिजी द्वारा, दूसरा सन 1535 में गुजरात के बहादुरशाह द्वारा तथा तीसरा सन 1567-68 में मुगल बादशाह अकबर द्वारा किया गया था। इसकी प्रसिद्ध स्मारकीय विरासत की विशेषता इसके विशिष्ट मजबूत किले, प्रवेश द्वार, बुर्ज, महल, मंदिर, दुर्ग तथा जलाशय स्वयं बताते हैं जो राजपूत वास्तुकला के उत्कृष्ट नमूने हैं।
सूर्यकुण्ड (सूरज कुण्ड)
कालिका माता के मंदिर के उत्तर-पूर्व में एक विशाल कुण्ड बना है, जिसे सूरजकुण्ड कहा जाता है। इस कुण्ड के बारे में मान्यता यह है कि महाराणा को सूर्य भगवान का आशीर्वाद प्राप्त था तथा कुण्ड से प्रतिदिन प्रातः सफेद घोड़े पर सवार एक सशस्र योद्धा निकलता था, जो महाराणा को युद्ध में सहायता देता था।

गुरुवार, 26 सितंबर 2013

महज 11 साल की उम्र में दुश्मनों के छुड़ा दिए थे छक्के

 राजस्थान वीरों की धरती है। यहां ऐसे शासक हुए जो अपनी राज्य की सीमा तक ही सीमित नहीं रहे। इन्होंने अपनी वीरता का परिचय कद से बढ़ कर दिया। बाहुबली तो थे ही, साथ ही अपनी विवेक और चतुराई से दुश्मनों को धूल चटाने में भी पीछे नहीं रहे। ऐसी ही एक मिसाल पृथ्वीराज चौहान के नाम की भी है। इतिहास के पन्नों पर नजर डालें तो पृथ्वीराज अनगिनत युद्ध में अपनी वीरता के परचम लहरा चुके हैं। इतिहासकारों के अनुसार महज 11 साल की उम्र में पृथ्वीराज चौहान ने विद्रोही नागार्जुन के छक्के छुड़ा दिए थे। उसे बुरी तरह से पराजित ही नहीं बल्कि मौत के घाट उतार दिया था। एक बार फिर दिल्ली और अजमेर रियासत पूरी तरह से महफूज हो चुकी थी। पृथ्वीराज ने अपनी वीरता और साहस का परिचय बचपन में दे दिया था। कहा जाता है कि पृथ्वीराज ने बाल अवस्था में ही शेर से लड़ाई कर उसका जबड़ा फाड़ डाला था। वैसे चौहान तलवारबाजी के शौकीन थे। शायद यही वजह थी कि इतनी कम उम्र में अपने दुश्मनों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया।

दिल्ली से शुरू हुआ शासन का सफर: 1177 में पृथ्वीराज दिल्ली सल्तनत की गद्दी पर बैठे। हालात काफी नाजुक थे। भारत पर बाहरी आक्रमण का बोलवाला था। पृथ्वीराज के इतने कम उम्र में गद्दी पर बैठ जाने पर राजनीतिक खलबली मच गई थी। इस बीच विद्रोही नागार्जुन को पृथ्वीराज के गद्दी पर बैठना गवारा नहीं था। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उसने काफी दिनों तक दिल्ली को बाहरी आक्रमण से महफूज रखा था। इसके बावजूद दिल्ली की बागडोर उसकी हाथों से निकल गई। विद्रोह का लावा फूट पड़ा। उसने पृथ्वीराज के खिलाफ आवाज उठा दी। स्थिति को देखते हुए पृथ्वीराज की मां (कर्पूर देवी) ने शासन का बागडोर अपने हाथों में ले ली। ताकि मंत्रियों और अधिकारियों पर नजर रखी जा सके । साथ ही सेना को सुढ्ढ़ किया जा सके।
ऐसा कहा जा सकता है कि पृथ्वीराज को अपनी मां की देखरेख में शासन चलाना पड़ा। लेकिन लगभग 1178 में पृथ्वीराज ने स्वयं सभी कामकाज अपने हाथ में लिया। इतिहासकारों के अनुसार मां के सान्निध्य में ही पृथ्वीराज ने विद्रोही नागार्जुन का दमन किया था। मां के साथ शासन का सफर चलता रहा और दिल्ली से लेकर अजमेर तक एक शक्तिशाली साम्राज्य कायम हो गया। भूभाग काफी विस्तृत हो चुका था। इसके बाद पृथ्वीराज ने अपनी राजधानी दिल्ली का नवनिर्माण किया। इससे पहले यहां पर तोमर नरेश ने एक गढ़ का निर्माण शुरू किया था। जिसे पृथ्वीराज ने विशाल रूप देकर पूरा किया। यह किला पिथौरागढ़ कहलाता है। इस किले का नाम पृथ्वीराज के नाम पर रखा गया है। पृथ्वीराज को "राय पिथौरा" भी कहा जाता है। आज भी दिल्ली के पुराने किले के नाम से जीर्णावस्था में विद्यमान है।

पृथ्वीराज के जन्म स्थल और जन्मदिन को लेकर मतभेद: पृथ्वीराज की जन्मतिथि और जन्मस्थल को लेकर कई विद्वानों में मतभेद बना हुआ है। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि पृथ्वीराज का जन्म गुजरात में हुआ था। तो दिल्ली और राजस्थान के इतिहासकारों का कहाना है कि पृथ्वीराज का जन्म राजस्थान के अजमेर में हुआ था। तिथि को लेकर भी काफी संशय है। 1100 में दिल्ली में महाराजा अनंगपाल का शासन था। उनकी इकलौती संतान पुत्री कर्पूरी देवी थी। कर्पूरी देवी का विवाह अजमेर के महाराजा सोमेश्वर के साथ हुआ था। अजमेर के राजा सोमेश्वर और रानी कर्पूरी देवी के यहां 1149 में एक पुत्र उत्पन्न हुआ। जो आगे चलकर इतिहास में महान हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान के नाम से प्रसिद्ध हुआ। जबकि दूसरे इतिहासकार कुछ और बयां कर रहे हैं। उनके अनुसार पृथ्वीराज 11 वर्ष के थे, तब उनके पिता सोमेश्वर का विक्रम संवत 1234 (1177) में देहांत हो गया था। इस अनुसार 1223 विक्रम संवत 1166 में पृथ्वीराज का जन्म हुआ था। विश्व के अधिकांश विद्वानों ने भी इस तिथि को प्रामाणिक माना है।

गद्दी पर बैठते ही शुरू हुआ विद्रोह: दिल्ली सल्तनत पर हुकूमत करना सहज नहीं था। क्योंकि मुस्लिम और देसी रियासतों का आक्रमण दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा था। गद्दी पर बैठते ही सबसे पहले अपने निकट संबंधी नागार्जुन के विरोध का सामना करना पड़ा। नागार्जुन का दमन करने के बाद पृथ्वीराज ने 1191 में मुस्लिम शासक सुल्तान मोहम्मद शहाबुद्दीन गौरी को हराया। इसे इतिहास में तराइन के युद्ध से जाना जाता है। हालांकि गौरी ने दूसरी बार फिर से आक्रमण किया। इस युद्ध में पृथ्वीराज की हार हुई थी। ऐसा इतिहासकारों का मानना है। इस युद्ध के बाद पृथ्वीराज को गौरी अपने साथ ले गया था। इस बात की पुष्टि राजकवि चन्द्रबदाई ने की है। हालांकि इसकी पुष्टि भारत के इतिहासकार नहीं करते हैं। उनका मानना है कि तराइन के दूसरे युद्ध में पृथ्वीराज की मौत हो गई थी।

गुजरात के भीमदेव के साथ युद्ध: पृथ्वीराज ने गद्दी पर बैठते अपने साम्राज्य विस्तार और सैनिक को प्रशिक्षित करने में जुट गए। सबसे पहले साम्राज्य विस्तार का सफर राजस्थान से शुरू हुआ। अजमेर के आस-पास के रियासत पर कब्जा करने के  बाद पृथ्वीराज ने गुजरात की की ओर रुख किया। उस समय गुजरात में चालुक्य वंश का शासन था। वहां के महाराजा भीमदेव बघेला थे। हालांकि युद्ध की पहल चालुक्य वंश की ओर से हुई थी। महाराजा भीमदेव ने पृथ्वीराज के किशोर होने का फायदा उठाना चाह
गुजरात में उस समय चालुक्य वंश के महाराजा भीमदेव बघेला का राज था। उसने पृथ्वीराज के किशोर होने का फायदा उठाना चाहता था। यही विचार कर उसने नागौर पर आक्रमण करने का निश्चय कर लिया। पृथ्वीराज किशोर अवश्य था परन्तु उसमें साहस-संयम और निति-निपुणता के भाव कूट-कूट कर भरे हुए थे। जब पृथ्वीराज को पता चला के चालुक्य राजा ने नागौर पर अपना अधिकार करना चाहते है तो उन्होंने भी अपनी सेना को युद्ध के लिए तैयार रहने के लिए कहा। भीमदेव ने ही पृथ्वीराज के पिता सोमेश्वर को युद्ध में हरा कर मृत्यु के घाट उतर दिया था। नौगर के किले के बाहर भीमदेव के पुत्र जगदेव के साथ पृथ्वीराज का भीषण संग्राम हुआ जिसमे अंतत जगदेव की सेना ने पृथ्वीराज की सेना के सामने घुटने टेक दिए। फलस्वरूप जगदेव ने पृथ्वीराज से संधि कर ली और पृथ्वीराज ने उसे जीवन दान दे दिया और उसके साथ वीरतापूर्ण व्यवहार किया। जगदेव के साथ संधि करके उसको अकूत घोड़े, हठी और धन संपदा प्राप्त हुई। आस पास के सभी राज्यों में सभी पृथ्वीराज की वीरता, धीरता और रन कौशल का लोहा मानने लगे। यहीं से पृथ्वीराज चौहान का विजयी अभियान आगे की और बढऩे लगा।


विद्रोही नागार्जुन का अंत: जब महाराज अनंगपाल की मृत्यु हुई उस समय बालक पृथ्वीराज की आयु मात्र 11 वर्ष थी। अनंगपाल का एक निकट सम्बन्धित था विग्रह्राज। विग्रह्राज के पुत्र नागार्जुन को पृथ्वीराज का दिल्लिअधिपति बनाना बिलकुल अच्छा नहीं लगा। उसकी इच्छा अनंगपाल की मृत्यु के बाद स्वयं गद्दी पर बैठने की थी, परन्तु जब अनंगपाल ने अपने जीवित रहते ही पृथ्वीराज को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया तो उसके हृदय में विद्रोह की लहरे मचलने लगी। महाराज की मृत्यु होते ही उसके विद्रोह का लावा फुट पड़ा। उसने सोचा के पृथ्वीराज मात्र ग्यारह वर्ष का बालक है और युद्ध के नाम से ही घबरा जायेगा। नागार्जुन का विचार सत्य से एकदम विपरीत था। पृथ्वीराज बालक तो जरूर था पर उसके साथ उसकी माता कर्पूरी देवी का आशीर्वाद और प्रधानमंत्री एवं सेनाध्यक्ष कमासा का रण कौशल साथ था। विद्रोही नागार्जुन ने शीघ्र ही गुडपुरा (अजमेर) पर चढ़ाई कर दी। गुडपुरा (अजमेर) के सैनिकों ने जल्दी ही नागार्जुन के समक्ष अपने हथियार डाल दिए। अब नागार्जुन का साहस दोगुना हो गया। दिल्ली और अजमेर के विद्रोहियों पर शिकंजा कसने के बाद सेनापति कमासा ने गुडपुरा की और विशाल सेना लेकर प्रस्थान किया। नागार्जुन भी भयभीत हुए बिना अपनी सेना के साथ कमासा से युद्ध करने के लिए मैदान में आ डाटा। दोनों तरफ से सैनिक बड़ी वीरता से लड़े। अंतत: वही जयपुर। राजस्थान वीरों की धरती है। यहां ऐसे शासक हुए जो अपनी राज्य की सीमा तक ही सीमित नहीं रहे। इन्होंने अपनी वीरता का परिचय कद से बढ़ कर दिया। बाहुबली तो थे ही, साथ ही अपनी विवेक और चतुराई से दुश्मनों को धूल चटाने में भी पीछे नहीं रहे। ऐसी ही एक मिसाल पृथ्वीराज चौहान के नाम की भी है। इतिहास के पन्नों पर नजर डालें तो पृथ्वीराज अनगिनत युद्ध में अपनी वीरता के परचम लहरा चुके हैं। इतिहासकारों के अनुसार महज 11 साल की उम्र में पृथ्वीराज चौहान ने विद्रोही नागार्जुन के छक्के छुड़ा दिए थे। उसे बुरी तरह से पराजित ही नहीं बल्कि मौत के घाट उतार दिया था। एक बार फिर दिल्ली और अजमेर रियासत पूरी तरह से महफूज हो चुकी थी। पृथ्वीराज ने अपनी वीरता और साहस का परिचय बचपन में दे दिया था। कहा जाता है कि पृथ्वीराज ने बाल अवस्था में ही शेर से लड़ाई कर उसका जबड़ा फाड़ डाला था। वैसे चौहान तलवारबाजी के शौकीन थे। शायद यही वजह थी कि इतनी कम उम्र में अपने दुश्मनों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया।

पृथ्वीराज ने 17 बार किया था गौरी को पराजित:1166 से 1192 तक दिल्ली और अजमेर की हुकूमत पृथ्वीराज चौहान के हाथों में थी। वे चौहान वंश के हिंदू क्षत्रिय राजा थे। जो उत्तरी भारत में एक क्षत्र राज करते थे। किंवदंतियों के अनुसार मोहम्मद
गोरी ने 18 बार पृथ्वीराज पर आक्रमण किया था। जिसमें 17 बार गोरी को पराजित होना पड़ा। हालांकि इतिहासकार युद्धों की संख्या के बारे में तो नहीं बताते लेकिन इतना मानते हैं कि गौरी और पृथ्वीराज में कम से कम दो भीषण युद्ध हुए थे। जिनमें प्रथम में पृथ्वीराज विजयी और दूसरे में पराजित हुआ था। वे दोनों युद्ध थानेश्वर के निकटवर्ती तराइन या तरावड़ी के मैदान में 1191 और 1192 में हुए थे।

पृथ्वीराज की मृत्यु पर इतिहासकारों में मतभेद: इतिहासकारों के अनुसार तराइन के दूसरे युद्ध में पृथ्वीराज की पराजय हुई थी। हालांकि इस युद्ध में पृथ्वीराज के योद्धाओं ने मुसलमानी सेना पर भीषण प्रहार कर अपनी वीरता का परिचय दिया था। लेकिन फिर भी गोरी के सैनिकों ने दिल्ली पर कब्जा कर लिया। युद्ध में पराजित होने के बाद पृथ्वीराज की किस प्रकार मृत्यु हुई। इस विषय में इतिहासकारों के विभिन्न मत मिलते है। कुछ के मतानुसार वह पहिले बंदी बनाकर दिल्ली में रखा गया था और बाद में गोरी के सैनिकों द्वारा मार दिया गया था। कुछ का मत है कि उसे बंदी बनाकर गजनी ले जाया गया था और वहां पर उसकी मृत्यु हुई।

शब्दभेदी बाण से मार गिराया गौरी को 
 चंदबरदाई द्वारा लिखित "पृथ्वीराज रासो" में विस्तार से पृथ्वीराज चौहान के बारे में लिखा गया है। खासतौर पर उनके अंतिम समय के बारे में। जब गौरी उन्हें पकड़कर अपने साथ ले गया और गरम सलाखें दाग कर उनकी आंखे फोड़ दी। अंधे होने के बावजूद पृथ्वीराज एक वीर की मौत मरना चाहते थे। अपने मित्र और राजकवि चंदबरदाई के साथ उन्होंने शब्दभेदी बाण चलाने की पूरी कला पर महारत हासिल की। इसके साथ उन्होंने गौरी से तीरंदाजी कौशल प्रदर्शित करने की अनुमति मांगी। गौरी ने पृथ्वीराज को दरबार में बुलाया। जहां उन्हें कुछ निशानों पर तीर चलाने थे। लेकिन पृथ्वीराज की योजना कुछ और ही थी। वे उन निशानों के बहाने गौरी पर निशाना साधना चाहते थे।

चंदरबरदाई ने दोहे के माध्यम से उन्हें गौरी का स्थान समझाया। जो इस प्रकार है-
"चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण,
ता ऊपर सुल्तान है मत चुके चौहान।"
इसी शब्दभेदी बाण के द्वारा पृथ्वीराज ने आंकलन करके बाण चला दिया। जिसके फलस्वरूप गौरी का प्राणांत हो गया। चूंकि पृथ्वीराज और चंदरबरदाई दोनों गौरी के सैनिकों से घिरे हुए थे, दुश्मन के हाथों मरने से बेहतर दोनों मित्रों ने एक दूसरे को मारकर वीरगति प्राप्त कर ली।

रविवार, 30 जून 2013

आइए जानते हैं ताजमहल के बारे में कुछ रोचक किस्से !


प्यार एक ऐसा शब्द है जिसका बयां करना सहज नहीं है। वैसे तो प्यार में साथ जीने और मरने की कसमें खाने वाले बहुत लोगों के बारे में सुना होगा। लेकिन हमारे देश में ऐसे शासकों की भी कभी नहीं है जिन्होंने प्यार में मिसाल कायम की। अपनी मुमताज की याद में एक ऐसा महल बनवाया जो पूरे दुनिया में सातवां अजूबा है। हम बात कर रहे हैं शाहजहां की। जिसने अपनी बेगम के लिए न सिर्फ ताजमहल बनवाया बल्कि उसके मरने के बाद भी उसे सीने लगाकर सोता रहा। आज हम आपके लिए आए हैं एक ऐसी प्यार की दास्तां। रोमांचित करने वाली यह एक ऐसी हकीकत है। जिसे पढ़कर आप हैरान हो जाएंगे। प्यार का दूसरा जुदाई है। जंग और फिर मौत प्रेम की ऐसी सच्चाई जिसे चाहकर भी नकारा नहीं जा सकता है।

प्यार की निशानी ताजमहल, एक ऐसी ही दास्तां को बयां करता है जिसमें प्यार भी है, जुदाई भी है, जंग भी है और फिर मौत भी है। संगमरमर से बने आगरा के खूबसूरत ताजमहल के बारे में सभी अच्छी तरह परिचित हैं। यह क्यों बना, किसने बनाया और बनाने के बाद इसका निर्माण करवाने वाले का क्या हश्र हुआ, यह बात किसी से भी छिपी नहीं है। लेकिन आज हम आपको आगरा के इसी ताजमहल के बारे में जो सच्चाई बताने जा रहे हैं, उसे शायद बहुत कम ही लोग जानते होंगे। ताजमहल से जुड़ी यह हकीकत हैरान करने वाली भी है और थोड़ी परेशान भी करती है।

आगरा के जिस स्थान पर आज ताजमहल खड़ा है वह कभी जयपुर के महाराज जयसिंह की धरोहर हुआ करता था। महाराज जयसिंह को इस स्थान के बदले शाहजहां ने आगरा के बीचो बीच एक महल दे दिया था। ताजमहल का निर्माण करवाने से पहले इस स्थान के आसपास की तीन एकड़ जमीन को खोदा गया और इस नींव को कंकड़-पत्थरों से इस कद भर कर ऊंचा कर दिया गया ताकि यमुना नदी की नमी से इस इस इमारत का बचाव किया जा सके।

शाहजहां काला ताजमहल भी बनवाना चाहता था, लेकिन इससे पहले ही उसे उसके पुत्र औरंगजेब ने कैद कर लिया", यह कहना था उस पहले शख्स का जो ताजमहल घूमने आया था। यूरोपीय पर्यटक जीन बैप्टिस्ट टैवर्नियर पहला इंसान था जो ताजमहल घूमने आया था और उसी ने इस बात को पुख्ता किया था कि शाहजहां ताजमहल के पास एक काले रंग का ताजमहल भी बनवाना चाहता था।

अपनी चौदहवीं संतान को जन्म देते समय शाहजहां की सबसे चहेती बेगम मुमताज की मौत हो गई थी। शाहजहां अपनी बेगम से बेइंतहा मोहब्बत करता था और चाहता था कि मुमताज अपनी आंखों से ताजमहल को बनता देखे। लेकिन ऐसा ना हो सका इसीलिए जब तक ताजमहल का निर्माण पूरा नहीं हो गया तब तक एक यूनानी हकीम की मदद से शाहजहां ने मुमताज महल के शव को एक ममी की भांति संरक्षित रखा था। लेकिन इतिहासकार इस बात से इंकार करते हैं कि मुमताज महल के शव को ममी के रूप में ही दफनाया भी गया था।

ताजमहल के निर्माण में एशिया के अलग-अलग स्थानों से पत्थर लाकर प्रयोग किए गए। मुख्य पत्थर संगमरमर को राजस्थान से मंगवाया गया था, पंजाब से जैस्पर, तिब्बत से फिरोजा, अफगानिस्तान से लैपिज़ लजू़ली, चीन से हरिताश्म और क्रिस्टल, श्रीलंका से नीलम और अरब से इंद्रगोप पत्थर लाए गए थे। पत्थरों की आवाजाही को 1,000 हाथियों ने अंजाम दिया था।

ताजमहल में जो कब्र पर्यटकों के लिए खोली गई है वह मुमताज और शाहजहां की असली कब्र नहीं है।तहखाने में इन दोनों प्रेमियों की असली कब्रें मौजूद हैं, जिनकी नक्काशी अविस्मरणीय और अतुलनीय है। तहखाने में मुमताज महल की कब्र पर अल्लाह के 99 नाम खुदे हुए हैं। जबकि शाहजहां की कब्र पर "उसने हिजरी के 1076 साल में रज्जब के महीने की छब्बीसवीं तिथि को इस संसार से नित्यता के प्रांगण की यात्रा की" लिखा हुआ है।

मंगलवार, 25 जून 2013

लैला की दर्द भरी दास्तां, राजस्थान की सीमा पर मजनूं ने ली थीं आखिरी सांसें

प्यार, इश्क, प्रेम और मोहब्बत ये ऐसे शब्द हैं जो जुबान पर आते ही मन रोमांचित हो जाता है। लेकिन इनके रास्ते सहज नहीं हैं। हर पग पर कांटे और आग के शोले हैं। या यूं कहें कि ये आग का दरिया और जिसे डूब कर पार करना है। दुनिया में ऐसी कई प्रेम कहानियां हैं, जिन्हें आपने भले ही न देखा हो, लेकिन उनकी दर्द भरी दास्तां जरूर सुनी होगी। ये ऐसे प्रेमी युगल थे, जिन्होंने अपनी मोहब्बत के लिए सब कुछ न्यौछावर कर दिया। आज हम आपको एक ऐसी प्रेमी युगल के बारे बताने जा रहा है। जिसकी दास्तान आज भी सुनी सुनाई जाती है। यह प्रेम कहानी आज भी अमर है। इस प्रेमी युगल को भारत का रोमियो जूलियट कहा जाता है। जी हां ये जोड़ा लैला-मजनूं है।

राजस्थान की सीमा पर मजनूं ने ली आखिरी सांस: राजस्थान के गंगानगर जिले में अनूपगढ़ से 11 किमी की दूरी पर लैला और मजनूं का मजार है। कहा जाता है कि एक दूसरे के प्यार में डूबे लैला मजनूं ने प्रेम में विफल होने के बाद अपनी जा दे दी थी। जमाने के विरोध के बावजूद दोनों की मजारें बिल्कुल पास हैं। भारत-पाक सीमा के नजदीक स्थित यह मजार मजहब से परे है। भारत पाक में मतभेद होने पर भी हिन्दू और मुस्लिम दोनों यहां आकर सिर नवाजते हैं। कहने का अभिप्राय है कि प्रेम सरहदें नहीं मानता। वह सीमाओं से सदा सर्वदा मुक्त है। स्थानीय लोगों की मान्यता है कि अपने प्रेम को बचाने समाज से भागे इस प्रेमी जोड़े ने राजस्थान के इसी बिजनौर गांव में शरण ली और यहीं अंतिम सांस भी ली। इस स्थल को मुस्लिम लैला मजनूं की मजार कहते हैं तो हिंदू लैला मजनूं की समाधि।

प्यार दर-दर भटकता रहा मजनूं: किसी कल्पना से कम नहीं है लैला मजनूं की प्रेम कहानी। लेकिन यह सच है। सदियों से लैला मजनूं की दास्तान सुनाई जा रही है। यह कहानी उस दौर की है जब प्यार को गुनाह माना जाता था। प्रेम करना किसी सामाजिक बुराई से कम नहीं था। लैला मजनूं का प्रेम लंबे समय तक चला और आखिर इसका अंत काफी दुखदायी हुआ। दोनों जानते थे कि वे कभी एक साथ नहीं रह पाएंगे। एक दूसरे के लिए प्रेम की इस असीम भावना के साथ दोनों सदा के लिए इस दुनिया से दूर चले गए। उनके प्रेम की पराकाष्ठा यह थी कि लोगों के उन दोनों के नाम के बीच में "और" लगाना भी मुनासिब नहीं समझा और दोनों हमेशा "लैला-मजनूं" के रूप में ही पुकारे गए। बाद में प्यार करने वालों के लिए यह बदनसीब प्रेमी युगल एक आदर्श बन गया। प्रेम में गिरफ्तार हर लड़की को लैला कहा जाने लगा और प्यार में दर-दर भटकने वाले आशिक को मजनूं की संज्ञा दी जाने लगी।
आजादी से पूर्व बन गया था यहां लैला मजनूं का मजार: देश की आजादी और भारत-पाक विभाजन से पूर्व यहां लैला मजनूं का मजार बन गया था। विभाजन के बाद भारत-पाकिस्तान दो देश बन गए। लेकिन इस मजार पर माथा टेकने दोनों आते रहे। दुश्मनी अपनी जगह थी और मोहब्बत अपनी जगह। राजस्थान की सीमाएं पाकिस्तान से लगती हैं और समय समय पर सीमा पर तनाव की खबरें भी आती हैं। लेकिन दुश्मनी की इसी सीमा पर राजस्थान में एक स्थान ऐसा भी है जहां नफरत के कोई मायने नहीं हैं। जहां सीमाएं कोई अहमियत नहीं रखती है। यह स्थान राजस्थान के गंगानगर जिले की अनूपगढ़ तहसील के करीब है, जहां लैला मजनूं की मजारें प्रेम का संदेश हवाओं में महकाती हैं। अनूपगढ के बिजनौर में स्थित ये मजारें पाकिस्तान की सीमा से महज 2 किमी अंदर भारत में हैं।

सिंध के रहने वाले थे लैला मजनूं: बिजनौर के स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार लैला मजनूं मूल रूप से सिंध प्रांत के रहने वाले थे। एक दूसरे से उनका प्रेम इस हद तक बढ़ गया कि वे एक साथ जीवन जीने के लिए अपने-अपने घर से भाग निकले और भारत के बहुत सारे इलाकों में छुपते फिरें। आखिर वे दोनोंं राजस्थान आ गए। जहां उन दोनों की मृत्यु हो गई। लैला मजनूं की मौत के बारे में ग्रामीणों में एक राय नहीं है। कुछ लोगों का मानना है कि लैला के भाई को जब दोनों के इश्क का पता चला तो उसे बर्दाश्त नहीं हुआ और आखिर उसने निर्ममता से मजनूं की हत्या कर दी। लैला को जब इस बात का पता चला तो वह मजनूं के शव के पास पहुंची और वहीं उसने खुदकुशी करके अपनी जान दे दी। कुछ लोगों का मत है कि घर से भाग कर दर दर भटकने के बाद वे यहां तक पहुंचे और प्यास से उन दोनों की मौत हो गई।

कुछ लोग यह भी मानते हैं कि अपने परिवार वालों और समाज से दुखी होकर उन्होंने एक साथ जान दे देने का फैसला कर लिया था और आत्महत्या कर ली। दोनों के प्रेम की पराकाष्ठा की कहानियां यहीं खत्म नहीं होती है। ग्रामीणों में एक अन्य कहानी भी प्रचलित है जिसके अनुसार लैला के धनी माता पिता ने जबरदस्ती उसकी शादी एक समृद्ध व्यक्ति से कर दी थी। लैला के पति को जब मजनूं और लैला के प्रेम का पता चला तो वह आग बबूला हो उठा और उसने लैला के सीने में एक खंजर उतार दिया। मजनूं को जब इस वाकये का पता चला तो वह लैला तक पहुंच गया। जब तक वह लैला के दर पर पहुंचा लैला की मौत हो चुकी थी। लैला को बेजान देखकर मजनूं ने वहीं आत्महत्या कर अपने आपको खत्म कर लिया।

अनगिनत कहानी हैं इस प्रेमी युगल की: लैला मजनूं के प्रेम की अनगिनत दास्ताने बिजनौर और पूरी दुनिया में फैली हुई हैं। कई भाषाओं और कई देशों में लैला मजनूं पर फिल्में और संगीत भी रचा गया है जो बहुत सफल हुआ है। शायद ही असल कहानी का किसी को पता हो लेकिन यह सच है कि लैला मजनूं ने एक दूसरे से अपार प्रेम किया और जुदाई ने दोनों की जान ले ली। प्रेम की इस भावना को नमन करते हुए बिजनौर की इस मजार पर हर साल मेला भी आयोजित किया जाता है। हर साल 15 जून को लैला मजनूं की मजार पर भरने वाले इस मेले में बड़ी संख्या में भारतीय और पाकिस्तानी प्रेमी युगल आते हैं, प्यार की कसमें खाते हैं और हमेशा हमेशा साथ रहने की मन्नतें मांगते हैं।
चमत्कारी है यह मजार: इस मजार को लेकर यहां कई ऐसी मान्यता हैं। स्थानीय लोगों में यह एक पवित्र स्थल है। हिन्दू इसे समाधि स्थल और मुस्लिम मजार मानकर अपना सिर नवाजते आए हैं। ये दोनों समुदाय लैला मजनूं की मजारों को एक जोड़कर देखते हैं और उनके प्रेम को नमन करते हैं। पहले इस मजारों के ऊपर एक छतरी थी। लोगों का कहना है इन मजारों पर उन्होंने कई चमत्कार होते देखे हैं। जो लोग यहां अपना दुख दर्द लेकर आते हैं उनके जीवन में कई अच्छी घटनाएं घटती हैं, उनकी मन्नतें पूरी होती हैं। इसी चमत्कार ने हजारों लाखों लोगों में इन मजारों के प्रति असीम श्रद्धा भर दी है और वे हर साल यहां नियमित रूप से आने लगे हैं। वर्तमान में यहां दोनो मजारें एक दूसरे से सटी हुई दिखाई देती हैं लेकिन ऊपर छतरी ढह गई है।