सोमवार, 8 अप्रैल 2024

एक ही रात में यहां के 84 गांवों के लोग गायब हो गए।

 ये है जैसलमेर का कुलधरा गांव। इस गांव में 170 साल पहले कुछ ऐसा हुआ था कि एक ही रात में यहां के 84 गांवों के लोग गायब हो गए। आज भी रहस्य है कि ऐसा क्या हुआ कि यहां के लोग कहां चले गए।कहते हैं कि इस गांव को एक ऐसा श्राप दिया गया कि ये गांव रातोंरात उजड़ गया और आज भी यहां कोई नहीं रहता। जिस रात गांव के लोग यहां से गायब हुए, आज भी सब वैसा का वैसा है। घरों की दीवारें, किवाड़। ये गांव खंडहर में जरूर तब्दील हो गए हैं लेकिन इनका अस्तित्व आज भी बना हुआ है। ऐसा माना जाता है कि इस गांव को साल 1300 में पालीवाल ब्राह्मण समाज ने सरस्वती नदी के किनारे इस गांव को बसाया था। किसी समय इस गांव में काफी चहल-पहल रहा करती थी। लेकिन आज ऐसी स्थिति है कि 170 वर्षों के बाद भी को बसावट नहीं है। आइए हम आपको इस गांव की कुछ दिलचस्प बातें बताते हैं।

ब्राह्मणों ने ही बसाया था कुलधरा को

 इस गांव की पुस्तकों और साहित्यिक वृत्तांतों से पता चलता है कि पाली के एक ब्राह्मण कधान ने सबसे पहले इस जगह पर अपना घर बनाया था। वहां पर एक तालाब भी खोदा था, जिसका नाम उसने उधनसर रखा था। पाली ब्राह्मणों को पालीवाल कहा जाता था। कुलधरा गांव मूल रूप से ब्राह्मणों ने बसाया था, जो पाली क्षेत्र से जैसलमेर चले गए थे और कुलधरा गांव में बस गए थे।

यहां देवी मं​दिर भी है, जो खंडहर हो चुका

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित तरीके से रखा जाने वाला कुलधरा गांव अब एक ऐतिहासिक स्थल है। यहां पर्यटक घूमने आते हैं। यहां एक देवी मंदिर भी है, जो अब खंडहर हो चुका है। मंदिर के अंदर शिलालेख है जिसकी वजह से पुरातत्वविदों को गांव और इसके प्राचीन निवासियों के बारे में जानकारी इकट्ठा करने में मदद मिली है।

सुबह 8 बजे से शाम 6 बजे तक घूम सकते हैं यहां

कुलधरा गांव जैसलमेर से 14 किमी दूर है। ये जगह, राजस्थान में होने की वजह से अत्यधिक गर्म है। यहां घूमने का सबसे अच्छा समय अक्टूबर से मार्च के बीच है। गांव में आप रोजाना सुबह 8 बजे से शाम 6 बजे तक घूमना-फिरना कर सकते हैं। चूंकि ये जगह भूतिया मानी जाती है, इसलिए स्थानीय लोग सूर्यास्त के बाद द्वार बंद कर देते हैं। कुलधरा गांव में एंट्री फीस 10 रुपए प्रति व्यक्ति है। घूमने के दौरान झलकियां आपको यहां देखने को मिल जाएंगी। कुलधरा क्षेत्र एक विशाल क्षेत्र में फैला हुआ है, जिसमें लगभग 85 छोटी बस्तियां शामिल हैं। गांवों की सभी झोपड़ियां टूट चुकी हैं और खंडहर हो चुकी हैं। 

ये मिथक जानना जरूरी 

प्रचलित मिथक के अनुसार, 1800 के दशक में, गांव मंत्री सलीम सिंह के अधीन एक जागीर या राज्य हुआ करता था, जो कर इख्ठा करके लोगों के साथ विश्वासघात किया करता था। ग्रामीणों पर लगाया जाने वाले कर की वजह से यहां के लोग परेशान रहते थे। ऐसा कहा जाता है कि सलीम सिंह को ग्राम प्रधान की बेटी पसंद आ गई और गांव वालों को इसपर धमकी दे डाली कि अगर उन्होंने इस बात की विरोध करने की कोशिश की या रस्ते में आए, तो वह और कर वसूल करने लगेगा। अपने गांव वालों की जान बचाने के साथ-साथ अपनी बेटी की इज्जत बचाने के लिए मुखिया समेत पूरा गांव रातों-रात फरार हो गया। गांव वाले गांव को छोड़कर किसी दूसरी जगह पर चले गए। ऐसा कहा जाता है कि गांव वालों ने जाते समय गांव को ये श्राप दिया था कि यहां आने वाले दिनों में कोई नहीं रह पाएगा।




शनिवार, 20 मई 2023

भारत की 5 ऐसी अजीब जगह जो आपकाे हैरान कर देगी

 


 भारत में कई अजीबों-गरीब जगह हैं, जो आपको को हैरान कर देती हैं। बस यहां मॉन्स्टर्स नहीं हैं, लेकिन कहानियां भी किसी मॉन्स्टर्स से कम नहीं है। चलिए आपको देश की कुछ अजीबों गरीब जगहें बताते हैं, जहां आपको एक बार जरूर जाना चाहिए।

अहमदनगर से 35 किमी दूर स्थित एक छोटा सा गांव शनि शिंगणापुर अपने शनि मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन यह केवल एक गांव के लिए ही फेमस नहीं है। यह धार्मिक कारणों से भारत में घूमने के लिए सबसे रहस्यमय स्थानों में से एक है। आप जब भी इस गांव में जाएंगे आपको इस गांव में हर घर, स्कूल और यहां की बैंक में भी ताला नहीं लगाया जाता। हर दरवाजा सुबह से लेकर पूरी रात तक, 12 महीने खुले रहते हैं। बता दें, ग्रामीणों की भगवान शनि में अटूट आस्था है और उनका मानना है कि गांव में जो शून्य अपराध दर है, वो सब उन्हीं की कृपा की वजह से है।
पश्चिमी घाट की समृद्ध खूबसूरती के अलावा, यहां कई आकर्षक चीजें हैं, जो लोगों को बेहद पसंद आती हैं। लेकिन इडुक्की, या 'लाल क्षेत्र', भारत में रहस्यमय स्थानों में से एक के रूप में भी प्रसिद्ध है। इडुक्की में लाल रंग की बारिश पहली बार 25 जुलाई, 2001 को हुई थी। इस बारिश को 2 महीने तक इसी रंग में देखा गया था। इस रंग की वजह से कपड़े और इमारत सब कुछ इसी कलर में हो गए थे। जब इस बारिश का पानी स्थानीय लोगों द्वारा इकठ्ठा की गई तो, ऊपर साफ पानी तैरने लगा और नीचे लाल कण दिखने लगे। वैज्ञानिकों को भी इस बात की आजतक स्पष्ट रूप से जानकारी नहीं मिल पाई।
असम का जतिंगा एक छोटा और खूबसूरत गांव है, लेकिन इस सुंदर गांव में कई बार दुखद घटना देखी गई है। यह दुर्लभ घटना इस गांव को भारत की सबसे रहस्यमयी जगह बनाती है। मानसून में प्रवासी पक्षी यहां उड़ते हुए आते हैं, और पेड़ों, खम्बों और इमारतों से जमीन पर अचानक से गिरने लगते हैं। जटिंगा भारत में घूमने के लिए उन अजीब जगहों में से एक है जो हर साल सितंबर और अक्टूबर के दौरान खूब सारे मरे हुए पक्षियों में बदल जाती है।
8 वीं शताब्दी की ये खूबसूरत संरचना, बड़ा इमामबाड़ा, अरबी और यूरोपीय वास्तुकला के मिश्रण के साथ, भारत के सबसे रहस्यमय ऐतिहासिक स्थानों में से एक है। इस स्मारक का केंद्रीय धनुषाकार हॉल लगभग 50 मीटर लंबा और लगभग 3 मंजिला ऊंचा है, लेकिन जानकारी हैरानी होगी कि ये हॉल बिना किसी खंभे के खड़ा हुआ है। मुख्य हॉल अपनी अनोखी भूलभुलैया के लिए भी प्रसिद्ध है।
18 वीं शताब्दी की ये खूबसूरत संरचना, बड़ा इमामबाड़ा, अरबी और यूरोपीय वास्तुकला के मिश्रण के साथ, भारत के सबसे रहस्यमय ऐतिहासिक स्थानों में से एक है। इस स्मारक का केंद्रीय धनुषाकार हॉल लगभग 50 मीटर लंबा और लगभग 3 मंजिला ऊंचा है, लेकिन जानकारी हैरानी होगी कि ये हॉल बिना किसी खंभे के खड़ा हुआ है। मुख्य हॉल अपनी अनोखी भूलभुलैया के लिए भी प्रसिद्ध है।
भारत में एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक और ऐतिहासिक स्थल, लेपाक्षी अपनी वास्तुकला और चित्रकला के लिए जाना जाता है। भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर अपने प्रसिद्ध लटके स्तंभ के कारण भारत के सबसे रहस्यमय स्थानों में से एक है। इस जगह पर मौजूद 70 खंभों में से एक खंभा हवा के बीच में लटका हुआ है, यानी बिना सहारे के ज्यों का त्यों है। लोग मंदिर में आते हैं और खंभे के नीचे कपड़ा पास करते हैं। माना जाता है कि ऐसा करने से जीवन में समृद्धि आती है।

शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2022

चंपारण से ही महात्मा गांधी का देश की राजनीति में हुआ था उदय....

 राजकुमार शुक्ल के प्रयासों का ही नतीजा था कि गांधीजी साल 1917 में चंपारण आए। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में आजमाए सत्याग्रह और अहिंसा के अपने अस्‍त्र का भारत में पहला प्रयोग चंपारण में ही किया। इस आंदोलन ने 135 सालों से शोषित चंपारण के किसानों को मुक्त किया। यह गांधी का देश की राजनीति में धमाकेदार उदय हुआ। 

गांधी के महात्‍मा तक के सफर का पहला स्‍टेशन था बिहार का चंपारण

 यह बात उस समय की है, जब मोहनदास करमचंद गांधी  दक्षिण अफ्रीका से भारत आए थे। दक्षिण अफ्रीका में किए गए उनके आंदाेलन की गूंज तो थी, लेकिन भारत में अभी वे महात्‍मा  या बापू नहीं थे। उनकी मोहनदास करमचंद गांधी से महात्‍मा गांधी व बापू तक का सफर अप्रैल 1917 में शुरू हुआ, जिसका पहला स्‍टेशन बिहार का चंपारण  था। इस यात्रा की शुरुआत चंपारण के एक किसान राजकुमार शुक्‍ल ने कराई, जिसका निमित्‍त नील किसानों पर अंग्रेजों के अत्‍याचार का तीनकठिया कानून बना। साल 1915 में गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे। पराधीन भारत में उनकी दिलचस्पी देख उनके राजनीतिक गुरु गोपालकृष्ण गोखले ने उन्हें भारत भ्रमण की सलाह दी। गोखले ने गांधी में भविष्‍य का बड़ा नेता देख लिया था। वे समझते थे कि भारत को लेकर गांधी के किताबी में जमीनी समझ भी जरूरी है।साल 1916 के गांधी कांग्रेस के अधिवेशन के लिए लखनऊ पहुंचे थे। वहां चंपारण के किसान राजकुमार शुक्ल भी पहुंचे थे। राजकुमार शुक्‍ल ने गांधी को चंपारण के किसानों के दुख-दर्द से अवगत कराते हुए वहां चलने का आग्रह किया। उन्‍होंने बताया कि चंपारण के किसानों पर तीनकठिया कानून के माध्‍यम से अंग्रेज किस तरह जुल्‍म कर रहे थे। अपनी आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ के 'नील के दाग' वाले अध्याय में गांधी लिखते हैं कि लखनऊ के कांग्रेस अधिवेशन के पहले तक वे चंपारण का नाम तक नहीं जानते थे। वहां नील की खेती और इस कारण वहां के हजारों किसानों के कष्ट की भी कोई जानकारी नहीं थी। गांधी लिखते हैं कि राजकुमार शुक्ल नाम के चंपारण के एक किसान ने वहां उनका पीछा पकड़ा और वकील बाबू (उस वक्‍त बिहार के नामी वकील और जयप्रकाश नारायण के ससुर ब्रजकिशोर प्रसाद) के बारे में कहते कि वे सब हाल बता देंगे। साथ हीं चंपारण आने का निमंत्रण देते।नेपाल सीमा से सटे बिहार के चंपारण में उस वक्‍त अंग्रेजों ने हर बीघे में तीन कट्ठे जमीन पर अंग्रेजों के लिए नील की अनिवार्य खेती का 'तिनकठिया कानून' लागू कर रखा था। बंगाल के अलावा यहीं नील की खेती होती थी। इसके बदले किसानों को कुछ नहीं मिलता था। इतना ही नहीं, किसानों पर कई दर्जन अलग-अलग कर भी लगाए गए थे। चंपारण के समृद्ध किसान राजकुमार शुक्ल इस शोषण के खिलाफ उठ खड़े हुए। इसके लिए अंग्रेजों ने उन्‍हें कई तरह से प्रताडि़त किया। वे चाहते थे कि गांधी जी यहां आकर अंग्रेजों के अत्‍याचार के खिलाफ ने लोगों को एकजुट करें।राजकुमार शुक्ल के प्रयासों का ही नतीजा था कि गांधीजी साल 1917 में चंपारण आए। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में आजमाए सत्याग्रह और अहिंसा के अपने अस्‍त्र का भारत में पहला प्रयोग चंपारण में ही किया। इस आंदोलन ने 135 सालों से शोषित चंपारण के किसानों को मुक्त किया। यह गांधी का देश की राजनीति में धमाकेदार उदय हुआ। इसके साथ देश को एक नया नेता मिला तो नई तरह की अहिंसक राजनीति भी मिली। जैसे गंगा का उद्गम गंगोत्री से हुआ है, ठीक वैसे हीं गांधी से बापू और महात्मा बनने के सफर का पहला स्टेशन ही चंपारण है। अब कुछ बात राजकुमार शुक्ल की भी। 23 अगस्त 1875 को बिहार के पश्चिमी चंपारण में जन्‍में राजकुमार शुक्‍ल चंपारण के एक बड़े किसान थे। अधिक पढ़े-लिखे नहीं होने तथा सामाजिक लोगों में भी बहुत उठ-बैठ नहीं रहने के बावजूद किसानों के शोषण के खिलाफ आवाज उठाई। गांधी को देश की राजनीति में स्‍थापित करने वाले चंपारण अत्‍याग्रह के आयोजन में उनका अहम योगदान रहा, लेकिन इतिहास ने उनके साथ न्‍याय नहीं किया। वे केवल आजादी के सिपाहियों की लिस्ट में एक नाम भर बनकर रह गए हैं। भारत की स्‍वतंत्रता के पहले हीं 20 मई 1929 को मोतिहारी में उनकी मृत्यु हो गई। बाद में भारत सरकार ने उनपर दो स्मारक डाक टिकट भी प्रकाशित किए।


मंगलवार, 18 अक्टूबर 2022

भारत में सबसे ज्यादा किले कौन से राज्य में है?

भारत के लगभग प्रत्येक राज्य में क़िले मौजूद हैं। इन किलों में कुछ बड़े ही भव्य है जो आज भी आकर्षण का केंद्र है और भारत में पर्यटन के मुख्य केंद्रों में गिना जाता है। आंकड़ो के अनुसार भारत के अधिकांश राज्यों में मौजूद सभी छोटे-बड़े किले को मिलाकर कुल 571 किले मौजूद हैं। राजस्थान और महाराष्ट्र दो ऐसे राज्य हैं, जहां सबसे अधिक किले हैं। आज हम ऐसे ही भारत के कुछ आलीशान और एतिहासिक किलों के बारे में बताने जा रहे हैं, जो देश की शान हैं। इसमें पहला है, राजस्थान के जोधपुर शहर में स्थित मेहरानगढ़ किला। यह 500 साल से भी ज्यादा पुराना और काफी बड़ा है।

शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2022

इस किले के लिए हुआ था भीषण युद्ध, बही थी खून की नदियां

 राजस्थान भौगोलिक कारणों से सदैव राजाओं के लिए केंद्र बिंदु रहा है। यहां की वादियों में आलौकिक शक्तियां तो हैं ही। मिट्टी में खजाने और कई रहस्य छुपे हुए हैं। यहां के किले और महल भी अपनी दास्तां बयां करने में पीछे नहीं है। हम बात कर रहे हैं चित्तौड़ किले की। इतिहासकारों के अनुसार सातवीं शताब्दी में मौर्य वंशीय राजा चित्रांगद ने अपने नाम पर चित्रकूट किला बनवाया था। प्राचीन सिक्कों पर एक तरफ चित्रकूट नाम अंकित मिलता है। इससे पता चलता है कि इस किले का नाम चित्रकूट था जो बाद में चित्तौड़ के नाम से जाना जाने लगा।

वास्तव में इस दुर्ग का निर्माण अभी भी विस्मय व रोमांच से भरा पड़ा है। इस किले के बारे में कई किवंदतियां हैं। कहा जाता है कि पांडवों के दूसरे भाई भीम ने इसे करीब 5000 वर्ष पूर्व बनवाया था। एक बार भीम जब संपति की खोज में निकला तो उसे रास्ते में एक योगी निर्भयनाथ व एक यति कुकड़ेश्वर से भेंट हुई। भीम ने योगी से पारस पत्थर मांगा, जिसे योगी इस शर्त पर देने को राजी हुआ कि वह इस पहाड़ी स्थान पर रातों-रात एक दुर्ग निर्माण करवा दें। अगर ऐसा होता है तो वह उसे पारस पत्थर दे देगा।

...आखिर क्यों इस गांव में मां के नाम से जाने जाते हैं बच्चे

हम जिस देश में रहते हैं वहां की संस्कृति और समाज सेक्स जैसे विषय पर खुलकर बात नहीं करती हैं। और जो इंसान इस पर खुलकर बोलता है उसे ही बेशर्म की संज्ञा दे दी जाती है। खासकर हमारे देश में माता-पिता भी इस बारे में बच्चों से कभी कोई बात करना पसंद नहीं करते हैं और न चाहते हैं कि इस तरह की बातें उनके बच्चे उनसे इस विषय पर कुछ पूछे। भारत ही नहीं विश्व के कई देश शादी से पहले शारीरिक संबंधों को सही नहीं मानते हैं। लेकिन आपको सुनकर हैरत होगी कि भारत में भी एक ऐसा राज्य है जहां के बच्चे मां के नाम से जाने जाते हैं। राजस्‍थान के जैसलमेर में "नगर वधुओं" एक ऐसा गांव है। यहां की युवतियां शादी से पहले ही कई लोगों से शारीरिक संबंध बनाती है। ऐसी सूरत में बच्चे को अपने पिता का नाम पता नहीं होता है। सुनने में भले ही ये अजीब लग रहा है, लेकिन यहां की ये परंपरा है। यहां शादियों का चलन नहीं है। वहीं विश्व में एक ऐसा भी देश है जहां पर लड़की का पिता ही उससे कहता है कि वो जाकर लड़कों से मिले और अच्छा लगे तो उसके साथ रिलेशन बना लें। यह प्रथा कंबोडिया के आदिवासी समुदाय का है।

 एक ऐसा गांव जहां पिता बनाता है बेटी से संबंध

पिता ही तैयार करता है बेटी के लिए झोपड़ी: शादी से पहले युवतियां पिता के कहने पर शारीरिक संबंध बनाती है। कंबोडिया के आदिवासी समुदाय में यह एक प्रथा है। प्रथा के मुताबिक जैसे ही किसी युवती को मासिक धर्म आना शुरू हो जाता है तो उसे जवान मान लिया जाता है। इसके बाद पिता अपनी बेटी के लिए एक झोपड़ी तैयार करता है। इसे लव हट कहा जाता है। जिसमें लड़की आदिवासी समुदाय के लड़कों से मिलती है और अच्छा लगने पर संबंध बना लेती है। इसके बाद भी लड़की को लड़का सही नहीं लगता है तो वह उससे शादी नहीं करती है। लड़की फिर से झोपड़ी में दूसरे लड़के को बुलाती है। यह सिलसिला तब तक चलता है जब तक कि लड़की को सही लड़का न मिल जाए। इसके बाद ही उसकी शादी उस लड़के से कर दी जाती है। इस तरह से एक बाप अपनी ही बेटी को कहता है कि वो एक से ज्यादा लड़कों के साथ रिलेशन बनाए। 


गर्भधारण होने पर भी लड़कियां नहीं करती है शादी:

लड़कियां रिलेशन बनाने से पहले किसी तरह का गर्भनिरोधक वस्तु का इस्तेमाल नहीं करती है। ऐसे में अगर कोई लड़की गर्भवती हो जाती है और उसे वह पंसद नहीं करती है तो वह उससे शादी नहीं करती है। गर्भधारण के बावजूद लड़की जिसे पसंद करती है उससे शादी करके बच्चे को पिता के नाम से जोड़ देती है। इस गांव सिर्फ महिलाएं और बच्चे हैं:नगर बंधुओं का एक ऐसा गांवजहां बसती हैं सिर्फ महिलाएं और उनके मासूम बच्चे। ऐसे बच्चे जो अपने बाप के नाम से नहीं बल्कि अपनी मां के नाम से जाने जाते हैं, स्कूल में भी इनके नाम के आगे मां का नाम ही लिखा हुआ है। यह गांव है राजस्थान के बाड़मेर जिले का सांवरड़ा गांव। इस गांव में साटिया जाति के करीब 70 परिवार निवास करते हैं। गांव में 132 नगर बधुएं और लगभग 45 बच्चे हैं जो गांव के प्राथमिक स्कूल में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। गांव की महिलाएं अपना और अपने बच्चों का पेट पालने के लिए शारीरिक संबंध बनाती है

 इस गांव में सदियों से शादी का चलन नहीं है: 

इस गांव में शादी की कोई खास परंपरा नहीं है। यहां बिना शादी के ही युवतियां शारीरिक संबंध बनती हैं। यही कारण है कि गांव के बच्चे अपनी मां के नाम से जाने जाते हैं। एक एनजीओ की मदद से चार साल पहले गांव में पहली बारात आई थी तब यह निर्णय लिया गया कि बहुओं को दूसरे से शारीरिक संबंध नहीं बनाने दिया जाएगा। यह संबंध पहले समाज में थी भी जायज:युवतियों का शादी नहीं करना और एक से अधिक कई से शारीरिक संबंध बनाना समाज में जायज था। लेकिन बदलते दौर ने इस परंपरा को वेश्यावृत्ति में बदल दिया। इस वजह से यहां की युवतियों को घृणा की दृष्टि से देखा जाता है। इतना ही नहीं युवतियों को अपने इस धंधे की कमाई का कुछ भाग टैक्स के रूप में भी अदा करना पड़ता था। 

कैसे शुरू हुई ये परंपरा: 

यह परंपरा 2500 साल पहले की है। जब भारत पर मौर्य वंश का राज था। तब युवतियां शादी से पूर्व ही शारीरिक संबंध बनाती थी। वे एक से अधिक लड़कों से इस तरह के संबंध रखती थी। ऐसा करना उनकी परंपरा में था। पुरुष इसके एवज में खूब धन-दौलत देते थे। ऐसा कहा जा सकता है कि युवतियों से देहव्यापार कराया जाता था। नगर के लोगों के द्वारा प्राप्त धन से इन युवतियों का कोषालय हमेशा भरा रहता था। इनकी इस कमाई का कुछ भाग राजकोष में कर के रूप में जमा कराया जाता था जिसका उपयोग राजा द्वारा अपने राज्य की भलाई में किया जाता था।

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भानगढ़ का खंडहर बताते हैं गुलजार था कभी यहां...


भानगढ़ नगर में प्रवेश करते ही सबसे पहले बाजार पड़ता है। वह बाजार जो उस जमाने में गुलजार रहा करता होगा। आज वीरान और खंडहर में तब्दील है। बाजार में बनी दुकानों की दीवारों से छत कुछ इस तरह गिरी कि लगता ही नहीं इनके ऊपर कभी कुछ था भी। देखकर अहसास होता है मानों किसी ने तलवार से इन्हें इकसार काट दिया है या इन्हें बनाया ही इस तरह गया है। कहते हैं नगर में बने नर्तकी महल से रात को घुंघुरुओं की आवाजें आती हैं। वैसे आपको बता दें कि जाने-माने वास्तुविद् ने जब यहां का परीक्षण किया तो बताया कि इस जगह बड़ी मात्रा में चमगादर और कक्रोच हैं जिसकी वजह से रात में ऐसी ध्वनि सुनाई देती हैं जैसे घुंघुरु बज रहे हों यानी उन्होंने रूहानी ताकतों की बजाय वास्तु और इन नकारात्मकता बढ़ाने वाली चीजों को यहां डर की वजह बताया।यह तो हुआ भानगढ़ का उपलब्ध इतिहास। अब बात करते हैं कि क्या वाकई यहां पर भूत हैं? क्या सचमुच यहां आत्माएं भटकती हैं? इन सवालों के साथ सुपरनैचरल पावर्स पर काम करने वाले और पैरानॉर्मल इंवेस्टिगेटर इस जगह जा चुके हैं। इनमें से कई लोगों ने यहां पर नेगेटिव एनर्जी की प्रेजेंस को स्वीकारा है। कई इंवेस्टिगेटर्स के कैमरे में कुछ अजीब तस्वीरें कैद भी हुई हैं, लेकिन किसी ने यह नहीं कहा कि ये कोई भूत है। उनका कहना है कि जब तक रिसर्च पूरी नहीं हो जाती वह ऐसा कुछ नहीं कह सकते।अगर भूत नहीं है तो फिर यह नेगेटिव एनर्जी क्या हो सकती है? इस पर कुछ पैरानॉर्मल इंवेस्टिगेटर्स का जवाब होता है कि ऐसी एनर्जी जो लंबे समय से एक ही जगह पर अटकी हुई हो, जिसका किसी कारण फ्लो नहीं हो पा रहा हो, नेगेटिव एनर्जी कहलाती है। साइंस कभी यह नहीं कहती कि भूत हैं, लेकिन वह भूतों के अस्तित्व को नकारती भी नहीं है। पैरानॉर्मल ऐक्टिविस्ट का कहना है कि साइंस के इस रवैये के पीछे कारण यह है कि साइंस के पास भूतों के न होने के सबूत भूतों के होने के सबूत से ज्यादा हैं। ऐसे में खास बात यह है कि साइंस के पास भी इस बात के सबूत हैं कि भूत होते हैं। भले ही ये अभी कम हैं। इस स्टोरी में हम किसी भी तरह के अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं दे रहे हैं, बस उपलब्ध तथ्यों के आधार पर बात कर रहे हैं।

बुधवार, 13 मई 2020

कहते हैं रात के समय इस महल में नाचती हैं नर्तकी की रूह

राजस्थान के अलवर जिले में स्थित भानगढ़ का किला एशिया की सबसे डरावनी जगहों में से एक माना गया है। सरकारी आदेश है कि यहां शाम 6 बजे के बाद किसी को भी रुकने न दिया जाए। इसलिए यहां सैलानियों को 5:30 होते ही किले से बाहर निकालना शुरू कर दिया जाता है। ताकि भूल से भी कोई इसके अंदर न रह जाए...

तांत्रिक की बुरी नियत से बर्बाद हो गया समृद्ध नगर

भानगढ़ एक प्राचीन नगर है। मान्यता है कि एक तांत्रिक की बुरी नियत इस नगर के विनाश का कारण बनी। इतिहास के अनुसार, भानगढ़ का निर्माण आमेर के राजा भगवंत दास ने 1573 ई. में अपने छोटे बेटे माधो सिंह के लिए कराया। बाद में इनकी 3 पीढ़ियों ने इस नगर पर राज किया।

अभिमंत्रित तेल ने बिगाड़ दिया सब खेल

कहा जाता है कि भानगढ़ की राजकुमारी रत्नावती अत्यंत सुंदर थी। इस राज्य में एक सिंघिया नाम का तांत्रिक राजकुमारी पर मोहित हो गया। वह रत्नावती से विवाह करना चाहता था लेकिन यह संभव नहीं था। ऐसे में उसने नगर के हाट से राजकुमारी के लिए तेल खरीदने आई दासी को अभिमंत्रित किया हुआ तेल दे दिया। ताकि तेल के प्रभाव से राजकुमारी सम्मोहन में उसकी तरफ खिंची चली आए। लेकिन जाते वक्त दासी के हाथ से वह शीशी छूटकर एक शिला पर गिर गई। तेल गिरने से वह शिला चटककर तांत्रिक की तरफ खींचने लगी और शिला के नीचे दबकर उस तांत्रिक की मौत हो गई।

भटकती हैं नगरवासियों की आत्मा

लेकिन मौत से पहले ही उस तांत्रिक ने अपनी तंत्रविद्या के प्रभाव से नगर को ध्वस्त करने की जमीन तैयार कर दी। उसने नगर को विनाश का शाप दे दिया। कहा जाता है कि तांत्रिक की मौत के बाद राजकुमारी सहित भानगढ़ के किसी निवासी ने अगला सूरज नहीं देखा। पूरा नगर एक रात में ही विरान हो गया। यह सब कैसे हुआ इस बारे में कई तरह की बातें लोग बताते हैं। माना जाता है कि इस तरह अकाल मृत्यु के कारण आज भी वहां के निवासियों की आत्माएं यहां भटकती हैं।



शुक्रवार, 28 जून 2019

श्री ओम बन्ना मंदिर में भगवान की नहीं बल्कि बुलेट की होती है पूजा

जयपुर। यहां चमत्कारों पर विश्वास किया जाता रहा है, उन्हें पूजा जाता है। इतिहास में कई ऐसी कहानियां दर्ज हैं जो इस वैज्ञानिक युग में भी चमत्कारों पर विश्वास दिला जाती हैं। ऐसी ही एक कहानी है बुलेट मंदिर की।
अपनी मन्नतें लेकर भक्तों को मंदिरों में भगवान के दर्शन के लिए जाते को सभी ने देखा है लेकिन क्या कभी किसी ऐसे मंदिर के बारे में सुना है जहां भगवान नहीं बुलेट की पूजा होती हो। पाली-जोधपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित है ये दुनिया का सबसे अनोखा और एक मात्र बुलेट मंदिर। मान्यता है कि यहां मनोकामना मांगने से पूरी होती है। जी हां, एक ऐसी जगह है। राजस्थान के पाली जिले में. जहां के श्री ओम बन्ना मंदिर में भगवान की किसी मूर्ति नहीं बल्कि एक बुलेट मोटर साइकिल की पूजा होती है। ठाकुर ओम सिंह राठौड़ का जन्म पाली के चोटिला गांव में 5 मार्च 1965 में ठाकुर जोग सिंह राठौड़ के घर पर हुआ था। राजस्थान में राजपूतों को बन्ना सा बोलने का रिवाज है, इसलिए ओम सिंह राठौड़ को भी ओम बन्ना कहा जाता था।  जितना दिलचस्प इस मंदिर का नाम है, उतनी ही दिलचस्प इसके पीछे की कहानी भी है। ओम बन्ना अपने पिता की इकलौती संतान थे और पूरे परिवार के लाडले थे। बचपन से ही उन्हें बड़े प्यार से पाला गया। जो भी उनकी इच्छा होती उन्हें वह चीज दिला दी जाती। उन्हें बाइक चलाने का बड़ा शौक था इसलिए जैसे ही ओम बन्ना थोड़े बड़े हुए उन्होंने रॉयल एनफील्ड मोटरसाइकिल खरीद ली।कहा जाता है कि हमेशा की तरह ओम बन्ना अपनी बाइक पर सवार हो कर अपनी पत्नी के गांव गए थे। उनकी पत्नी गर्भवती थी इसलिए वह अपने घर आई हुई थीं। ओम बन्ना पत्नी से मिलने के बाद घर वापस लौट रहे थे। ओम बन्ना अपनी तेज रफ़्तार बाइक का मजा ले ही रहे थे कि तभी सामने एक मोड़ आ गया। उन्होंने कोशिश की अपनी बाइक संभालने की मगर वह कुछ न कर सके। अगले ही पल उनकी बाइक ज़मीन पर पड़ी थी और ओम बन्ना उससे थोड़ी दूरी पर गिरे हुए थे। ओम बन्ना की उस समय ही मौत हो गई थी।
अगली सुबह पुलिस घटनास्थल पहुंची. सीधा-सीधा समझ आ रहा था कि यह एक्सीडेंट का केस है। उन्होंने ओम बन्ना की लाश उनके घर पहुंचाई और बाइक को अपने साथ पुलिस स्टेशन ले गए। सब को लगा कि यह ओपन एंड शट केस है इसलिए किसी ने भी इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया और ओम बन्ना की बाइक पुलिस स्टेशन के बाहर रख दी गई। अगले दिन जैसे ही पुलिस वाले स्टेशन में वापस आए उन्होंने देखा कि ओम बन्ना की बाइक वहां पर है ही नहीं। कुछ देर बाद ही पुलिस को सूचना मिली कि एक 'RNJ 7773' नंबर की बाइक चोटिला गांव के पास जोधपुर पाली हाईवे पर लावारिस हालत में खड़ी हुई है।
उस रात बाइक पुलिस स्टेशन में ही रही मगर अगले दिन फिर पिछली वाली घटना घटी। अगले जैसे ही पुलिस वाले स्टेशन में आए उन्होंने देखा कि ओम बन्ना की बाइक फिर से गायब है। फिर थोड़ी देर बाद उन्हें खबर मिली कि ओम बन्ना की बाइक उनके दुर्घटनास्थल पर फिर से देखी गई है। उन्हें लगा कि शायद कोई उनके साथ मजाक कर रहा है। इस बार पुलिस वालों ने सोच लिया कि चोर को कोई मौका नहीं देना है बाइक चुराने का। इसलिए उन्होंने बाइक का सारा पेट्रोल निकाल दिया। इतना ही नहीं उन्होंने बाइक को चेन से भी बांध दिया ताकि कोई उसे लेकर न जा सके। पुलिस की कोशिशों के बाद भी अगले दिन जैसे ही वह पहुंचे उन्होंने देखा कि फिर से बाइक गायब है। इसके बाद कई बार उन्होंने बाइक को जब्त किया और हर बार वह फिर से दुर्घटनास्थल पर ही वापस मिलती थी। इस बात की खबर जैसे ही आस पास के गांव के लोगों को लगी उन्होंने इसे चमत्कार का नाम दे दिया। उनक मानना था कि इसमें ओम बन्ना की आत्मा बसती है। जब इस बात की खबर ओम बन्ना के पिता और उनके गांव वालों को लगी तो उन्होंने कहा कि इस सिलसिले को ख़त्म करने के लिए उन्हें दुर्घटनास्थल पर ओम बन्ना का एक स्मारक बनाना पड़ेगा। इसके बाद गांव वालों ने उस दुर्घटनास्थल के पास ओम बन्ना के नाम से एक स्मारक बना दिया और उनकी बाइक को वहां पर रख दिया।उस दिन के बाद से वह बाइक वहां से कहीं नहीं गई। लोगों ने इसे चमत्कार मान लिया। तब से वह एक स्मारक नहीं बल्कि एक मंदिर बन गया। इस मंदिर की खासियत यह है कि यहां पर किसी भगवान् की मूर्ती नहीं बल्कि ओम बन्ना के बाइक की पूजा होती है। उस दिन के बाद से आज तक यह मंदिर वैसे का वैसा ही है। आज भी लोग इसकी पूजा करने आते हैं। ओम बन्ना के इस मंदिर में उनकी रॉयल एनफील्ड बाइक रखी हुई है और पास में उनका एक चबूतरा बना हुआ है। इस मंदिर पर शराब की बोतलें प्रसाद के रूप में चढ़ाई जाती हैं। ऐसा कहा जाता है कि यहां पर निकलने वाले हर व्यक्ति को यहां पर शराब रखकर शीश झुकाना जरूरी होता है। कहते हैं कि अगर ऐसा किसी ने नहीं किया तो उसके साथ दुर्घटना होने की गुंजाइश होती है। हालांकि इन बातों को कोई पक्का सबूत तो नहीं है कि यह सच है भी कि नहीं। फिर भी कई लोगों का मानना है कि यह सच है, तो कई इसे अन्धविश्वास की संज्ञा भी देते हैं। ओम बन्ना और उनके मंदिर की यह कहानी वाकई में बहुत दिलचस्प है। जो भी इसके बारे में सुनता है वह आश्चर्यचकित हो जाता है।

गुरुवार, 30 नवंबर 2017

7 साल से अपने वारिस का इंतजार कर रही ये रियासत, खाली पड़ा है ताज


जयपुर। सात जनवरी, 2010 को बूंदी के महाराज कुमार रणजीत सिंह का निधन हुआ। उन्हें कोई संतान नहीं थी, न ही उन्होंने किसी को गोद लिया था। 21 जनवरी को पगड़ी दस्तूर होना था। बूंदी, अलवर ही नहीं सभी पूर्व राजघरानों को भी उत्सुकता थी पर एक राय नहीं बनी, तब से पगड़ी दस्तूर नहीं हुआ। अब तो लोकोक्ति बन गई है कि बूंदी की पाग खूंटी पर टंगी है। हाड़ा वंशजों के दिल में इस बात की कसक है।
छोटी काशी काे भी है पाग की चिंता
- राजे-रजवाड़े, राजघराने, रियासतें, राजतिलक बेशक अब प्रतीकभर हैं। संवैधानिक महत्व भले हो पर कई राजघराने अब भी दिलों पर राज करते हैं। राजतिलक जैसी परंपराओं का निर्वहन और पाग का सम्मान आज भी है। परंपराओं में जीने वाले छोटी काशी के लोगों के दिल में एक कसक है कि बूंदी की पाग सात साल से खूंटी पर टंगी है। संत-महंत तक सवाल करते हैं कि क्या हाड़ा वंश में कोई इसके काबिल नहीं? हाड़ाओं के दिल में भी यह टीस है। बाबा बजरंगदासजी (लाल लंगोट वाले) ने पिछले साल बूंदी आए मंत्री राजेंद्र राठौड़ से यही कहा था बूंदी की पाग कब तक खूंटी पर टंगी रहेगी? संत ब्रह्मलीन हुए तब भी लोग कहने लगे बूंदी अनाथ हो चुकी है।
विवाद इसलिए...
- राजघरानों में पाग और प्रॉपर्टी को लेकर विवाद नई बात नहीं, बूंदी राजघराना भी इससे अछूता नहीं। पूर्व महाराज रणजीतसिंह के कोई संतान नहीं थी, ना उन्होंने उत्तराधिकारी गोद लिया था। वे चचेरे भाई बलभद्रसिंह से नाराज थे। वसीयत में बलभद्रसिंह से अपने रिश्ते का जिक्र करते हुए लिखा कि उन्हें उनकी पार्थिव देह को हाथ नहीं लगाने दिया जाए। इच्छा के मुताबिक बलभद्रसिंह को मुखाग्नि नहीं दे सके। दूसरी वसीयत में रणजीतसिंह ने प्रॉपर्टी का हिस्सेदार अपनी बहन महेंद्रा कुमारी के पुत्र भंवर जितेंद्र दोस्त अविनाश चांदना को बताया। केस कोर्ट में है। बलभद्रसिंह बूंदी के पूर्व महाराज बहादुरसिंह के बड़े भाई केशरीसिंह के पुत्र हैं। महाराजा बहादुरसिंह के निधन के बाद उनके पुत्र रणजीतसिंह गद्दी पर बैठे। बलभद्रसिंह बहादुरसिंह के भतीजे और महाराजकुमार रणजीतसिंह के चचेरे भाई हैं। भंवर जितेंद्रसिंह महाराज रणजीतसिंह की बहन अलवर राजघराने की युवरानी महेंद्रा कुमारी के पुत्र हैं। वे बूंदी राजघराने के भांजे हैं और नरूका वंशज हैं जबकि पाग का दस्तूर हाड़ा वंशज को होता रहा है। बलभद्रसिंह का दावा है कि बूंदी राज परिवार की पाग के वे स्वाभाविक हकदार हैं। भान्जे भंवर जितेंद्र प्रॉपर्टी के मालिक हो सकते हैं पर पाग के नहीं।
पगड़ी चुकी थी, दस्तूर की तैयारी थी फिर ऐसा हुआ...धरी रह गई पाग
- सात जनवरी 2010 को महाराजकुमार रणजीतसिंह का निधन हुआ, 21 जनवरी को पगड़ी रस्म की तैयारी हो रही थी। वहां मौजूद लोगों के मुताबिक हिमाचल से भंवर जितेंद्रसिंह के ससुराल के लोग पाग लेकर बूंदी जा चुके थे। वहां मौजूद कोटा दरबार बृजराजसिंह ने उन्हें अंग्रेजी में कुछ ऐसा कुछ कहा कि वे पाग वापस ले गए। तब से पाग की रस्म नहीं हो सकी।

बुधवार, 22 नवंबर 2017

आखिर कहां की रहने वाली थी पद्मावती, क्या था गोरा और बादल से असल रिश्ता

जैसलमेर। पद्मावती जैसलमेर की राजकुमारी थी न कि श्रीलंका की। इसका दावा वरिष्ठ इतिहासकार नंदकिशोर शर्मा ने किया है। उन्होंने कहा पद्मावती को जैसलमेर की राजकुमारी हैं। इसके तथ्य भी दिए हैं। शर्मा का दावा है कि पद्मावती उर्फ पद्मिनी श्रीलंका की नहीं, जैसलमेर के निर्वासित महारावल पुण्यपाल की राजकुमारी थी। सिंहल लोद्रवा के महारावल बाछू के दूसरे पुत्र सिंहराव ने सिंध के रोहड़ी वर्तमान में पाकिस्तान से 8 कोस की दूरी पर सिंहरार नामक कस्बा को भाटियों ने आबाद किया था।
जैसलमेर के सेवग लक्ष्मीचंद की तवारिख पृष्ठ संख्या 26 के अनुसार सिंहरावों ने 24 गांव आबाद कर खेरात में सइयदों को दिया था। वह आज तक उनके पास है। सिंहराव भाटियों के इस कस्बे को सिहर कहा जाता था। सिहर ही सिंहल जो सिंघल के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस क्षेत्र पर भाटियों के पूर्वजों का अधिकार था। भाटी सिद्ध रावल देवराज ने यहां पर विक्रम संवत 909 में देरावलगढ़ और राजधानी बनाया था।
गोरा और बादल पद्मिनी के चचेरे नहीं बल्कि ममेरे भाई थे
- मलिक मोहम्मद जायसी ने भी सिंहल लिखा है। 1955 में राजऋषि उम्मेदसिंह राठौड़ ने लिखा है कि राणा रतनसिंह का विवाह सिंहल देश की राजकुमारी पद्मिनी के साथ हुआ था। चित्तौड़ की माटी पर सन 1302 में रतनसिंह का विवाह पद्मिनी के साथ हुआ। पद्मिनी की मां चौहान थी व पिता भाटी थे। गोरा और बादल उसके चचेरे नहीं, बल्कि ममेरे भाई थे।
- पद्मिनी के पिता ने मेवाड़ के चित्तौड़ राणा रतनसिंह के पिता समरसिंह की आज्ञा से डोला भेजकर रतनसिंह से पद्मिनी का विवाह किया था। पुण्यपाल निर्वासित थे।
- ऐसी स्थिति में परम पद्मिनी का विवाह करना बड़ा कठिन हो गया था। उस समय अलाउद्दीन खिलजी हिंदू राजकुमारियों व रानियों का अपहरण कर रहे थे। ऐसी स्थिति में पूंगल के सिंहल क्षेत्र के भाटियों ने डोला भेजकर पद्मिनी का विवाह 1302 ईस्वी में रतनसिंह से करवाया था।
इतिहासकारों का दावा:
- पद्मावती को श्रीलंका की राजकुमारी बताने, रतनसिंह का उनको देखकर पद्मिनी पर मोहित होने, फिर उनसे विवाह का प्रस्ताव करने आदि जो दृश्य संजय लीला भंसाली द्वारा पद्मावती फिल्म में फिल्माये है, वे सभी तथ्य गलत और इतिहास से परे हैं।
- यहां के इतिहासकारों के अनुसार पूंगल गढ़ की पद्मिनी पूंगल क्षेत्र के सिंहल क्षेत्र की रहने वाली भाटियों की राजकुमारी थी। पद्मिनी जिसका पूंगल क्षेत्र में जन्म हुआ था। इसी कारण लोग उसे पूंगल की पद्मिनी कहते हैं। राजस्थान में कई लोक गीतों में पद्मिनी की उपमाएं दी जाती है। यदि वह लंका की होती, तो उसे श्याम वर्णी या श्याम सुंदरी कहा जाता।
रानी पद्मिनी का जैसलमेर से था संबंध
- इतिहासकार बालकृष्ण जोशी के मुताबिक, इतिहास के आधार पर यह बात बिलकुल सही है कि चितौडग़ढ़ की रानी पद्मिनी का जैसलमेर से संबंध था। मैने अपनी पुस्तक ‘स्वर्ण दुर्ग की आत्मकथा’ में भी इस बात का उल्लेख किया है। जैसलमेर के संस्थापक रावल जैसल के वंशज थे पुण्यपाल जिनका विवाह सिरोही के चौहान परिवार में हुआ था।
- पुण्यपाल को जैसलमेर की राजगद्दी से पदच्युत कर दिया था। इसके बाद वे जगह जगह भटके उसके बाद में पूंगल पर अधिकार प्राप्त किया। इसके बाद पद्मिनी के जन्म के समय पुण्यपाल पूंगल के रावल थे। उन्हीं की बेटी पद्मिनी थी। जिनका विवाह 15 साल की आयु में चितौडग़ढ़ के रावल रतनसिंह से विवाह किया गया।
- चितौडग़ढ़ की रानी पद्मिनी जैसलमेर मूल के भाटियों की बेटी तथा सिंहल के पहले सामंत व बाद में राजा की दोहित्री थी। जिसे पूंगल की पद्मिनी के नाम से भी जाना जाता है।
- पद्मिनी बेहद गुणवान और सुंदर औरत थी। औरत की सुंदरता को चार वर्णों में विभाजित किया जाता है। जो औरत नाक, नक्श, रूप, गुण रूप होती है उसे भी पद्मिनी की ही संज्ञा दी जाती है। पद्मिनी की संज्ञा भी चितौडग़ढ़ की रानी के नाम के आधार पर ही दी जाती है।
इतिहास के कई दोहों में पद्मिनी का वर्णन
शिक्षाविद् हरिवल्लभ बोहरा का कहना है कि हम लोग यह बात बचपन से जनश्रुति के रूप में सुनते आ रहे है कि पद्मिनी जैसलमेर मूल की थी। इनके पिता निष्कासित होने के बाद पूंगल के राजा बने। जैसलमेर की तवारिख में भी इस बात का जिक्र है। जैसलमेर के इतिहास के कई दोहों में पद्मिनी का वर्णन है।



आखिर कैसी थी पद्मावती? जानिए चित्तौड़ की रानी के 9 गुणों के बारे में

जयपुर। रानी पद्मावती को लेकर अलग-अलग मत हैं। अभी तक यही माना जाता रहा है कि पद्मावती का उल्लेख सबसे मलिक मोहम्मद जायसी ने अपनी रचना पद‌्मावत में किया था। लेकिन, इतिहास में इसके अलावा भी कुछ और है। कई तथ्यों को खोजने के बाद इतिहासकार पद्मावती को कोरी कल्पना नहीं मान रहे हैं।
मीरा शोध संस्थान से जुड़े चितौड़गढ़ के प्रो. सत्यनारायण समदानी बताते हैं कि जायसी की रचना 1540 की है। जायसी सूफी विचारधारा के थे, जो अजमेर दरगाह आया करते थे। इसी दौरान उन्होंने कवि बैन की कथा को सुना, जिसमें पद्मावती का उल्लेख था। इसका मतलब साफ है कि जायसी से पहले कवि हेतमदान की गोरा बादल कविता से भी जायसी ने अंश लिए थे।
क्या हकीकत में थी रानी
छिताई चरित : जायसी की पद्‌मावत से 14 साल पहले लिखी
प्रो.समदानी बताते हैं कि छिताई चरित ग्वालियर के कवि नारायणदास की रचना थी। इस हस्तलिखित ग्रंथ के संपादक ग्वालियर के हरिहरनाथ द्विवेदी आैर इनके अलावा अगरचंद नाहटा ने भी इसका रचनाकाल 1540 से पहले का माना है। अलाउदीन खिलजी देवगिरी पर आक्रमण किया था। वह वहां की रानी को पाना चाहता था। इस ग्रंथ के एक काव्य अंश में उल्लेख बताया गया है कि देवगिरी पर आक्रमण के समय अलाउद्‌दीन राघव चेतन को कहा है कि वह कहता है कि मैंने चित्तौड़ में पद्मावती के होने की बात सुनी। उवहां के राजा रतनसिंह को बंदी बनााया, लेकिन बादल उसे छुड़ा ले गया।
जायसी ने भी नहीं माना प्रेम प्रसंग, लिखा
पद्मावती बहुत सुंदर थीं, खिलजी बहक गया... सूफीकवि मलिक मोहम्मद जायसी ने 1540 ईस्वी में पद्मावत काव्य लिखा। जिसका अधिकांश किताबों में जिक्र आता है, लेकिन घटनाचक्र के सवा दो सौ साल बाद बाद काव्य रूप में लिखे जाने से कई लोग इसमें सच्चाई के साथ कल्पना का समावेश मानते हैं। उसने लिखा कि पद्मावती सुंदर थी। अल्लाउद्दीन ने उनके बारे में सुना तो देखना चाहा। खिलजी सेना ने चित्तौड़ को घेर लिया। रतन सिंह के पास संदेश भिजवाया- पद्मावती से मिलवाओ तो बिना हमला किए चितौड़ छोड़ दूंगा। रतन सिंह ने पद्मावती को बताया। रानी सहमत नहीं थीं। अंत में जौहर कर लिया।
पदमावती के 9 गुण
बुद्धिमानी
पंडित राघव को देश निष्कासन का दंड दिया था। तब रानी पद्मिनी राघव को अपना कंगन देती हैं। क्योंकि राघव पंडित गुणी विद्वान अनेक विधाओं के स्वामी थे। उन्होंने गुणी ब्राह्मण का अपमान नहीं किया।
वीरांगना
पद्मिनी वीर क्षत्राणी थी। वे गोरा-बादल के वीरत्व से परिचित थीं। इसी से उन्हें प्रेरणा देकर उनके वीरत्व को जागृत कर पति की बंधनमुक्ति और अपने सतीत्व की रक्षा का भार उन्हें सौंपती है।
नेतृत्व
रानियां महलों से बाहर नहीं आती थीं। पद्मिनी दरबार में युद्ध रणनीति बनाने में शामिल हुईं। रतनसिंह बंदी बना लिए तो युद्ध का नेतृत्व किया गढ़ में किसी भी परिस्थिति में उत्सर्ग के लिए तैयार रहने को प्रेरित किया।
रणनीतिकार
खिलजी के रणथंभौर पर आक्रमण के बाद मेवाड़ पर हमले की आशंका भांपकर रतनसिंह ने सभी सामंतों को बुलाकर युद्व की तैयारी शुरू कर दी थी। रानी भी इस रणनीति में शामिल थीं।
सतीत्व की रक्षा
पद्मिनी हिंदू नारी के गौरव का प्रतीक है। रतनसिंह को बंदी अवस्था में देवपाल और अल्लाउद्दीन के भेजे दूत की परीक्षा की अग्नि में तपकर उसका सतीत्व अखंड हो गया।
आदर्श पत्नी
मलिक मोहम्मद जायसी ने रानी पद्मिनी की जीवन को आधार बनाकर पद्मावत महाकाव्य की रचना की। जायसी ने आदर्श पत्नी के रूप में स्थापित किया। पद्मिनी भावी पति रतनसिंह से भेंट होने से लेकर जीवन पर्यंत उनके प्रति समर्पित रही।
स्वाभिमानी
पद्मिनी स्वाभिमानी नारी हैं। संकट में वे घबराई नहीं। पति की बंधन अवस्था में जब चित्तौड़ के सामंत और कुंवर उसे सुल्तान को सौंपकर राजा को छुड़ाने की योजना बनाते हैं तो वह अपनी बुद्धि से सफल योजना बनाती हैं।
निर्णय क्षमता
वे रणनीतिक निर्णय भी करती थीं। जब सुल्तान राणा रतनसिंह को बंदी बना ले गया तो पद्मिनी ने ही अपने विश्वस्त गोरा बादल से राय की। फिर 1600 बंद पालकियों में योद्धा बैठे। खबर फैलाई कि पद्मिनी सखियों के साथ रही हैं। सुल्तान से प्रार्थना की वे रानी को रतनसिंह से अंतिम भेंट करने दें। इससे प्रसन्न होकर सुल्तान ने आज्ञा दे दी। सैनिक रतनसिंह को छुड़ा लिया।
पवित्रता

पद्मिनी स्वयं में कुशल रणनीतिकार, साहसी और रूपवती होने के साथ पतिव्रता थीं। उनके सारे फैसले कदम इसी से प्रेरित थे। इतिहासकारों के मुताबिक उनके साहस की कहानी यह है कि आक्रांता अलाऊदीन खिलजी के महल में आने से पहले जौहर की तैयारी कर ली।



  • रणनीतिकार
    खिलजी के रणथंभौर पर आक्रमण के बाद मेवाड़ पर हमले की आशंका भांपकर रतनसिंह ने सभी सामंतों को बुलाकर युद्व की तैयारी शुरू कर दी थी। रानी भी इस रणनीति में शामिल थीं।
    सतीत्व की रक्षा
    पद्मिनी हिंदू नारी के गौरव का प्रतीक है। रतनसिंह को बंदी अवस्था में देवपाल और अल्लाउद्दीन के भेजे दूत की परीक्षा की अग्नि में तपकर उसका सतीत्व अखंड हो गया।

मंगलवार, 21 नवंबर 2017

इस महल में रहती थीं रानी पद्मावती, सबसे खूबसूरत रानियों का था घर

जयपुर।चित्तौड़गढ़.पद्मावती फिल्म की शूटिंग से शुरू हुआ विवाद रिलीज डेट पास आते ही और ज्यादा बड़ गया है। करणी सेना ने फिल्म की एक्ट्रेस की नाक काटने पर पांच करोड़ के इनाम देने की बात कही है। राजस्थान समेत देश के कई शहरों में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। शुक्रवार को चित्तौड़गढ़ किले को भी बंद रखा गया। जानें चित्तौड़गढ़ महल में बने पद्मिनी महल के बारे में। जानिए पद्मिनी महल की कहानी...
- अतुल्य जैन धर्म एवं गढ़ चित्तौड़गढ़ के लेखक डॉ ए.एल.जैन ने बताया कि अभी बना पद्मिनी पैलेस अंदर से रेनोवेट किया गया है। जिसे ऑरिजनल स्वरूप को करीब 150 साल पहले मलिक मोहम्मद जायसी के काव्य के अनुसार बदल दिया गया।
- डॉक्टर ए.एल.जैन के अनुसार रानी पद्मावती इसी महल में रहती थी। उनके साथ इस महल में रियासत की सबसे खूबसूरत महिलाएं रहती थीं। जिनमें से पद्मावती भी एक थीं।
- इसके साथ ही ए.एल.जैन ने बताया कि इस महल में लगे कांच रेनोवेशन के दौरान ही लगाए गए हैं। क्योंकि रानी पद्मावती का अक्स दिखाने वाली कहानी के कोई प्रमाण नहीं मिलते।
- बताया जा रहा है कि रानी पद्मिनी महल का उल्लेख 13वीं शताब्दी में राजा रतन सिंह के दौर से ही होता है। इससे पहले इसका उल्लेख नहीं होता।
- इस महल की सुंदरता बढ़ाने के लिए इसे पानी के बीच बनाया गया था। जिससे रानी पद्मावती पानी में अपना अक्स देख सकें। जिसके आर्किटेक्ट में राजस्थानी और पर्शियन कारीगरी देखने के लिए मिलती है।
मंदिर भी बनाया
- असल में राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में बने एक मंदिर में पद्मावती यानी पद्मिनी की प्रतिमा स्थापित है।
- उसी के स्वरूप से रानी का रूप दिखाया गया है। उनके जीवन के बारे में प्रतिमा मुखर होकर बोलती नजर आती है।
आखिर कैसे बना चित्तौड़गढ़ किला और क्या है इसका इतिहास...
- 700 एकड़ में फैला ये किला जमीन से 180 मीटर की ऊंचाई पर पहाड़ पर बना हुआ है। इससे जुड़ा मिथ है कि भीम ने इसका निर्माण किया था। सन् 1303 में इस किले पर अलाउद्दीन खिलजी ने अपना साम्राज्य स्थापित किया।
- 1540 में प्रताप का जन्म हुआ, उसी समय महाराणा उदयसिंह ने खोए चित्तौड़ को जीता। इस जीत के साथ ही किले में एक विजय स्तंभ की स्थापना की गई।
- इससे पहले इस किले पर गुहिलोत, सिसोदियाज, सूर्यवंशी और चातारी राजपूतों का राज रहा। इस जीत में प्रताप की मां जयवंता बाई भी उदयसिंह के साथ थीं।

गुप्त सुरंग से इस मंदिर में आती थी रानी पद्मावती, दिखती थीं कुछ ऐसी

जयपुर। चित्तौड़गढ़ की रानी पद्मावती को लेकर विवाद पूरे देश में फैल चुका है। सभी धर्म के लोग पद्मावती फिल्म के विरोध में प्रदर्शन कर रहे हैं, लेकिन आज भी राजस्थान में उन्हें देवी की तरह पूजा जाता है। असल में राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में बने एक मंदिर में पद्मावती यानी पद्मिनी की प्रतिमा स्थापित है। इस मंदिर में देवी के स्वरूप में रानी का रूप दिखाया गया है। ये मुर्ति उनके जीवन के बारे में प्रतिमा मुखर होकर बोलती नजर आती है। इस मंदिर के पुजारी चंद्रशेखर ने बताया कि इस मंदिर में सन 1468 में राणा रायमल ने पद्मावती की मूर्ति की स्थापना करवाई थी। खुद चंद्रशेखर का परिवार 7 पीढ़ियों से इस मंदिर की पूजा कर रहा है।
- इसमें भगवान पाश्वनाथ और महादेव की मूर्ति भी स्थापित है। पुजारी चंद्रशेखर ने बताया कि मंदिर में बने गो मुख से 24 घंटे पानी गिरता है। जिसे उन्होंने कभी बंद होते नहीं देखा।
- इस मंदिर में ब्राह्मण समाज के लोग पूजा करने आते हैं।
मूर्ति में क्या है खास
- पुजारी चंद्रशेखर ने बताया कि इस मंदिर में पद्मावती की जो मूर्ति लगी है। उसमें मूर्ति बनाने वाले ने पद्मावती को कल्पना करते दिखाया गया है। चंद्रशेखर के अनुसार हाथ में आईना लिए मूर्ति ये सोच रही है कि किसी को इतना भी सुंदर मत बनाना कि उसकी वजह से राज्य तबाह हो जाए।
महल से सीधी आती थी सुरंग
- पुजारी चंद्रशेखर ने बताया कि इस मंदिर में 1.5 किलोमीटर की एक सुरंग भी है। जो रानी पद्मावती के पद्मिनी महल से सीधे इस मंदिर में पहुंचती है। जिसे फिलहाल बंद कर दिया गया है।
- कहा जाता है कि रानी पद्मावती सुबह स्नान के बाद सुरंग के जरिए सीधे इस मंदिर में पूजा करने पहुंचती थीं। सुरंग को खास इसलिए बनाया गया था जिससे कोई पद्मावती को आते-जाते ना देख सके।


गुरुवार, 4 मई 2017

जोधपुर को राजस्थान का अभिन्न अंग बनाने के लिए लोह पुरुष ने तान दी जोधपुर नरेश पर पिस्टल


जयपुर। 200 साल। अत्याचार। ब्रिटिश साम्राज्य। पूरे भारत में विरोध प्रदर्शन। अंग्रेजी हुकूमत यह मान चुकी थी अब यहां शासन करना आग से खेलने के बराबर है। लेकिन भारत छोडऩे से पहले अंग्रेजों ने कूटनीति अपनाई। भारत को दो हिस्सों में बांट डाला। वर्ष 1949। आजादी का जश्न। चारों ओर खुशी का माहौल। इन बीच एक अजीब सा सन्नाटा फैला था। आजाद होने के बावजूद अपनों के बीच में भी अजनबी जैसी स्थिति थी। अब रियासतों का एकीकरण कर एक राज्य बनाने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी। ताकि एक संपूर्ण भारत की स्थापना की जा सके।

ऐसे में राजस्थान राज्य की नींव रखी गई। जयपुर और जोधपुर को छोड़कर बाकी रियासतें राजस्थान में शामिल हो चुकी थी। या फिर हामी भर चुकी थी। बीकानेर और जैसलमेर रियासतें जोधपुर नरेश की हां पर टिकी हुई थी। जबकि जोधपुर नरेश महाराजा हनुवंत सिंह जिन्ना के संपर्क में थे। जिन्ना ने उन्हें प्रलोभन दिया अगर आप पाकिस्तान में शामिल होते हैं तो पंजाब-मारवाड़ के सूबे का प्रमुख बना दिए जाएंगे। उस समय जोधपुर से थार के रास्ते लाहौर तक एक रेल लाइन हुआ करती थी। जिसे सिंध और राजस्थान की रियासतों के बीच प्रमुख व्यापार हुआ करता था। जिन्ना ने रेल लाइन को जोधपुर के कब्जे का प्रलोभन भी दिया। हनुवंत सिंह जिन्ना की इस प्रलोभन में पूरी तरह से फंस गए थे। उन्होंने हामी भी भर दी।

इस बात की जानकारी सरदार बल्लभ भाई पटेल को लगी। उस समय पटेल जूनागढ़ (तत्कालीन बम्बई और वर्तमान में गुजरात) के मुस्लिम राजा को समझा रहे थे। वे हेलिकॉप्टर से जोधपुर के लिए रवाना हो गए। लेकिन सिरोही-आबू के पास उनका हेलिकॉप्टर खराब हो गया। ऐसे में उसी दिन जोधपुर पहुंचना मुश्किल था। क्योंकि सन साधनों की काफी कमी थी। स्थानीय साधनों से सफर कर रात में जोधपुर के उम्मेद भवन पहुंचे। यहां सरदार बल्लभ भाई पटेल को देखकर हनुवंत सिंह घबरा से गए। उन्होंने आसपास के सामंतों को बुला लिया। बातचीत के दौरान हनुवंत सिंह ने सरदार को धमकाने के लिए मेज पर ब्रिटिश पिस्टल रख दी। सरदार ने जोधपुर नरेश को मुस्लिम राष्ट्र में शामिल होने पर होने वाली सारी तकलीफों के बारे में बताया लेकिन हनुवंत सिंह नहीं माने। उलटे सरदार पर राठौड़ों को डराने का आरोप लगाकर आसपास बैठे सामंतों को उकसाने लगे।

एक बार स्थिति ऐसी आ गई कि आखिरकार सरदार ने पिस्टल उठा ली और हनुवंत की तरफ तानकर कहा कि राजस्थान में विलय पर हस्ताक्षर कीजिए नहीं तो आज हम दो सरदारों में से एक सरदार नहीं बचेगा। सचिव मेनन सहित उपस्थित सभी सामंत डर गए। ऐसे में हनुवंत सिंह को हस्ताक्षर करने पड़े। इस तरह जोधपुर सहित बीकानेर और जैसलमेर भी राजस्थान में शामिल हो गए। इस घटना के कारण सरदार पटेल ने वृहद राजस्थान के प्रथम महाराज प्रमुख का पद हनुवंत सिंह को न देकर उदयपुर के महाराणा भूपालसिंह को दिया।

बुधवार, 26 अप्रैल 2017

क्या आप जानते हैं कि एक लाख वर्ष पुरानी है राजस्थान की सभ्यता

पुरातत्वों और इतिहासकारों के अनुसार राजस्थान का इतिहास पूर्व पाषणकाल में ही शुरू हुआ, बनास नदी के किनारे और अरावली पहाड़ के गर्भ में बसा था यह क्षेत्र

जयपुर। राजस्थान। यहां की सभ्यता और संस्कृति काफी पुरानी ही नहीं बल्कि एक लाख वर्ष पहले इसका आगाज भी हो गया था। पुरातत्ववेताओं के अनुसार राजस्थान सभ्यता की शुरुआत पूर्व पाषणकाल में ही हो गई थी। आज से करीब एक लाख पहले मानव नदी किनारे या फिर पहाड़ की कदराहों में निवास करता था। इतिहासकारों के अनुसार ये मुख्य तय बनास नदी के किनारे या फिर अरावली के उस पार की नदियों के किनारे निवास करते थे। हालांकि भोजन उनके लिए बड़ी समस्या थी। ऐसे में वे एक जगह स्थिर नहीं रह पाते थे। वे पत्थर के औजारों की मदद से शिकार करते थे। इसका प्रमाण इन औजारों के कुछ नमूने बैराठ, रैध और भानगढ़ के आसपास पाए गए हैं।

क्या आदिकाल से ऐसा ही था राजस्थान: राजस्थान का इतिहास किसी रहस्य से कम नहीं है। पुरातत्ववेताओं और इतिहासकारों के अनुसार राजस्थान का उत्तर-पश्चिमी में मरुस्थल नहीं था जैसा आज है। इनका मनना है कि यहां अतिप्राचीनकाल में सरस्वती और दृशद्वती जैसी विशाल नदियां बहा करती थीं। ऐसे भी साक्ष्य मिले है। जो इतिहास के पन्नों पर एक पहचान रखती है। या फिर जिसकी सभ्यता आज भी किसी विकसित शहर से तुल्ला की जाती है। हड़प्पा और रंगमहल जैसी संस्कृतियां इन नदी घाटियों में फली-फूलीं हैं। यहां की गई खुदाइयों से खासकर कालीबंग के पास, पांच हजार साल पुरानी एक विकसित नगर सभ्यता का पता चला है। हड़प्पा और रंगमहल संस्कृतियां सैकडों किलोमीटर दक्षिण तक राजस्थान के एक बहुत बड़े इलाके में फैली हुई थीं।

गणराज्यों में बंटा हुआ था ईसा पूर्व चौथी सदी में: इस बात के प्रमाण मौजूद हैं कि ईसा पूर्व चौथी सदी और उसके पहले यह क्षेत्र कई छोटे-छोटे गणराज्यों में बंटा हुआ था। इनमें से दो गणराज्य मालवा और सिवि इतने शक्तिशाली थे कि उन्होंने सिकंदर जैसे महान शासक को पंजाब से सिंध की ओर लौटने के लिए बाध्य कर दिया था। उस समय उतरी बीकानेर पर एक गणराज्यीय योद्धा कबीले यौधेयत का अधिकार था। यह वही ब्रह्मावर्त है जिसकी महती चर्चा मनु ने की है। इसका उल्लेख महाभारत में भी मिलता है। महाभारत में उल्लेखित है मत्स्य पूर्वी राजस्थान और जयपुर के एक बड़े हिस्से पर शासन करते थे। जयपुर से 80 किमी उत्तर में बैराठ, जो तब विराटनगर कहलाता था, उनकी राजधानी थी। इस क्षेत्र की प्राचीनता का पता अशोक के दो शिलालेखों और चौथी पांचवी सदी के बौद्ध मठ के भनावशेषों से भी चलता है।

काफी समृद्ध इलका था राजस्थान
: भरतपुर, धौलपुर और करौली उस समय सूरसेन जनपद के अंश थे जिसकी राजधानी मथुरा थी। भरतपुर के नोह नामक स्थान में अनेक उतर-मौर्यकालीन मूर्तियां और बर्तन खुदाई में मिले हैं। शिलालेखों से ज्ञात होता है कि कुषाणकाल तथा कुषाणोतर तृतीय सदी में उतरी एवं मध्यवर्ती राजस्थान काफी समृद्ध इलाका था। राजस्थान के प्राचीन गणराज्यों ने अपने को पुनस्र्थापित किया और वे मालवा गणराज्य के हिस्से बन गए। मालवा गणराज्य हूणों के आक्रमण के पहले काफी स्वायत् और समृद्ध था। अंततघ् छठी सदी में तोरामण के नेतृतव में हूणों ने इस क्षेत्र में काफी लूट-पाट मचाई और मालवा पर अधिकार जमा लिया। लेकिन फिर यशोधर्मन ने हूणों को परास्त कर दिया और दक्षिण पूर्वी राजस्थान में गुप्तवंश का प्रभाव फिर कायम हो गया। सातवीं सदी में पुराने गणराज्य धीरे-धीरे अपने को स्वतंत्र राज्यों के रूप में स्थापित करने लगे। इनमें से मौर्यों के समय में चितौड़ गुबिलाओं के द्वारा मेवाड़ और गुर्जरों के अधीन पश्चिमी राजस्थान का गुर्जरात्र प्रमुख राज्य थे।

शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016

गोवर्धन पर्वत है शापित, दिनोंदिन घट रही ऊंचाई

जयपुर। कहते हैं जहां सत्य है वहीं ईश्वर है। ऐसा नहीं है कि ईश्वर से गलती नहीं होती है। वे भी कभी आवेश में आकर ऐसे कार्य करते हैं जिससे मानव जिंदगी एक अधर में लटक जाती है। आखिरकार आस्था से भरे मानव को ईश्वर के शरण में एक बार फिर जाना पड़ता है। गलती को सुधराने के लिए ईश्वर एक अनोखा ही रास्ता निकालते हैं। ऐसा ही कुछ रहस्यमय है गोवर्धन पर्वत की कहानी। कई पौराणिक मिथक है। कहा जाता है गोवर्धन पर्वत शापित है। यह पर्वत कभी विशाल हुआ करता था लेकिन पुलस्त्य ऋषि के शाप के कारण यह पर्वत अपनी विशलता खो चुका था।  नंद यानी भगवान कृष्ण ने भारी बारिश से लोगों को बचाने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपने कनिष्ठ अंगुली पर उठा लिया था।

गोवर्धन पर्वत को गिरिराज पर्वत भी कहा जाता है। पांच हजार साल पहले यह गोवर्धन पर्वत 30 हजार मीटर ऊंचा हुआ करता था। अब शायद 30 मीटर ही रह गया है। पुलस्त्य ऋषि के शाप के कारण यह पर्वत एक मुट्ठी प्रतिदिन कम होता जा रहा है। इसी पर्वत को भगवान कृष्ण ने अपनी बाये हाथ के कनिष्ठ अंगुली पर उठा लिया था। श्रीगोवर्धन पर्वत मथुरा से 22 किमी की दूरी पर स्थित है।

पौराणिक मान्यता अनुसार श्रीगिरिराजजी को पुलस्त्य ऋषि द्रौणाचल पर्वत से ब्रज में लाए थे। दूसरी मान्यता यह भी है कि जब रामसेतुबंध का कार्य चल रहा था तो हनुमानजी इस पर्वत को उतराखंड से ला रहे थे, लेकिन तभी देववाणी हुई की सेतुबंध का कार्य पूर्ण हो गया है, तो यह सुनकर हनुमानजी इस पर्वत को ब्रज में स्थापित कर दक्षिण की ओर पुन: लौट गए।

क्यों उठाया गोवर्धन पर्वत : इस पर्वत को भगवान कृष्ण ने अपनी चींटी अंगुली से उठा लिया था। कारण यह था कि मथुरा, गोकुल, वृंदावन आदि के लोगों को वह अति जलवृष्टि से बचाना चाहते थे। नगरवासियों ने इस पर्वत के नीचे इकठ्ठा होकर अपनी जान बचाई। अति जलवृष्टि इंद्र ने कराई थी। लोग इंद्र से डरते थे और डर के मारे सभी इंद्र की पूजा करते थे, तो कृष्ण ने कहा था कि आप डरना छोड़ दे...मैं हूं ना।

परिक्रमा का महत्व: सभी हिंदूजनों के लिए इस पर्वत की परिक्रमा का महत्व है। वल्लभ सम्प्रदाय के वैष्णवमार्गी लोग तो इसकी परिक्रमा अवश्य ही करते हैं क्योंकि वल्लभ संप्रदाय में भगवान कृष्ण के उस स्वरूप की आराधना की जाती है जिसमें उन्होंने बाएं हाथ से गोवर्धन पर्वत उठा रखा है और उनका दायां हाथ कमर पर है। इस पर्वत की परिक्रमा के लिए समूचे विश्व से कृष्णभक्त, वैष्णवजन और वल्लभ संप्रदाय के लोग आते हैं। यह पूरी परिक्रमा 7 कोस अर्थात लगभग 21 किलोमीटर है।

परिक्रमा मार्ग में पडऩे वाले प्रमुख स्थल आन्यौर, जातिपुरा, मुखार्विद मंदिर, राधाकुंड, कुसुम सरोवर, मानसी गंगा, गोविन्द कुंड, पूंछरी का लौठा, दानघाटी इत्यादि हैं। गोवर्धन में सुरभि गाय, ऐरावत हाथी तथा एक शिला पर भगवान कृष्ण के चरण चिह्न हैं।

परिक्रमा की शुरुआत वैष्णवजन जातिपुरा से और सामान्यजन मानसी गंगा से करते हैं और पुन: वहीं पहुंच जाते हैं। पूंछरी का लौठा में दर्शन करना आवश्यक माना गया है, क्योंकि यहां आने से इस बात की पुष्टि मानी जाती है कि आप यहां परिक्रमा करने आए हैं। यह अर्जी लगाने जैसा है। पूंछरी का लौठा क्षेत्र राजस्थान में आता है।

वैष्णवजन मानते हैं कि गिरिराज पर्वत के ऊपर गोविंदजी का मंदिर है। कहते हैं कि भगवान कृष्ण यहां शयन करते हैं। उक्त मंदिर में उनका शयनकक्ष है। यहीं मंदिर में स्थित गुफा है जिसके बारे में कहा जाता है कि यह राजस्थान स्थित श्रीनाथद्वारा तक जाती है।

गोवर्धन की परिक्रमा का पौराणिक महत्व है। प्रत्येक माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी से पूर्णिमा तक लाखों भक्त यहां की सप्तकोसी परिक्रमा करते हैं। प्रतिवर्ष गुरु पूर्णिमा पर यहां की परिक्रमा लगाने का विशेष महत्व है। श्रीगिरिराज पर्वत की तलहटी समस्त गौड़ीय सम्प्रदाय, अष्टछाप कवि एवं अनेक वैष्णव रसिक संतों की साधाना स्थली रही है।

अब बात करते हैं पर्वत की स्थिति की। क्या सचमुच ही पिछले पांच हजार वर्ष से यह स्वत: ही रोज एक मुठ्ठी खत्म हो रहा है या कि शहरीकरण और मौसम की मार ने इसे लगभग खत्म कर दिया। आज यह कछुए की पीठ जैसा भर रह गया है।

हालांकि स्थानीय सरकार ने इसके चारों और तारबंदी कर रखी है फिर भी 21 किलोमीटर के अंडाकार इस पर्वत को देखने पर ऐसा लगता है कि मानो बड़े-बड़े पत्‍थरों के बीच भूरी मिट्टी और कुछ घास जबरन भर दी गई हो। छोटी-मोटी झाडिय़ां भी दिखाई देती है।

पर्वत को चारों तरफ से गोवर्धन शहर और कुछ गांवों ने घेर रखा है। गौर से देखने पर पता चलता है कि पूरा शहर ही पर्वत पर बसा है, जिसमें दो हिस्से छूट गए है उसे ही गिर्राज (गिरिराज) पर्वत कहा जाता है। इसके पहले हिस्से में जातिपुरा, मुखार्विद मंदिर, पूंछरी का लौठा प्रमुख स्थान है तो दूसरे हिस्से में राधाकुंड, गोविंद कुंड और मानसी गंगा प्रमुख स्थान है।

बीच में शहर की मुख्य सड़क है उस सड़क पर एक भव्य मंदिर हैं, उस मंदिर में पर्वत की सिल्ला के दर्शन करने के बाद मंदिर के सामने के रास्ते से यात्रा प्रारंभ होती है और पुन: उसी मंदिर के पास आकर उसके पास पीछे के रास्ते से जाकर मानसी गंगा पर यात्रा समाप्त होती है।

मानसी गंगा के थोड़ा आगे चलो तो फिर से शहर की वही मुख्य सड़क दिखाई देती है। कुछ समझ में नहीं आता कि गोवर्धन के दोनों और सड़क है या कि सड़क के दोनों और गोवर्धन? ऐसा लगता है कि सड़क, आबादी और शासन की लापरवाही ने खत्म कर दिया है गोवर्धन पर्वत को।